कसाब का कड़वा सच - शिवओम अम्बर


आप चाहें तो इसे एक भावुक चित्त की विक्षोभमयी प्रतिक्रिया कह सकते हैं। किन्तु मुझे कसाब को मिली फांसी की सजा पर बेहद उछलकूद मचा रहा मीडिया अत्यधिक बचकाना लगा। और इसे अपनी विजय मानकर जश्न मना रहे मुम्बई के नागरिक विभ्रमित और जरूरत से ज्यादा भोले प्रतीत हो रहे हैं! एक खूंखार आतंकवादी के लिए मात्र एक छोटी अदालत ने मृत्यु दण्ड घोषित किया है और इस बीच उसे वातानुकूलित कारागृह में विशेष सुरक्षा-व्यवस्था के साथ रखने पर चालीस करोड़ से अधिक रुपए बहाए जा चुके हैं। अभी इस मामले को उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय के सोपानों पर भी संचरण करना है। हमारी न्यायिक प्रक्रिया के परम्परागत चरित्र को देखते हुए इस प्रक्रिया में एक दशक से लेकर पांच दशक का समय भी लग सकता है! यदि न्यायाधीशों के उत्साहवश निर्णय शीघ्र हो भी गया तो घातक अपराधी को महामहिम राष्ट्रपति के समक्ष अनुग्रह- याचना करने का अधिकार तो है ही। और इस याचिका पर निर्णय तो अनिश्चित काल तक के लिए स्थगित होता रह सकता है! प्रसन्नता आखिर किस सन्दर्भ में प्रकट की जा रही है?

अभिव्यक्ति मुद्राएं

कितने हैं दल पूछो मत, कैसी हलचल पूछो मत। ऊपर पूजाघर, भीतर पूरा जंगल पूछो मत।

-डा. रामसनेहीलाल यायावर

धन की राहें ढूंढ लीं, सत्ता की गलियां ढूंढ लीं, डूब मरने के लिए लोगों ने नदियां ढूंढ लीं। तुमने जिन आंखों में कुछ लिक्खा हुआ पाया नहीं, हमने उनमें ढेर सारी पांडुलिपियां ढूंढ लीं।

-एहतराम इस्लाम

हटके चलते हैं जो लकीरों से, लोग डरते हैं उन फकीरों से।

-नरेन्द्र

इसी सन्दर्भ में मैं एक समाचार चैनल पर प्रसारित अजमल कसाब के पूर्व अधिवक्ता अब्बास काजमी के द्वारा मामले से सम्बंधित प्रतिक्रियात्मक टिप्पणियों को रेखांकित करना चाहूंगा। जिस लगाव और भावात्मकता के साथ वह कसाब की तरफदारी कर रहे थे, ऐसा लग ही नहीं रहा था कि वह उसी हिन्दुस्थान के बाशिन्दे हैं जो इस दहशतगर्त की गोलियों की बौछार से रक्तरंजित हुआ है! उनके वक्तव्यों में बार-बार आ रहा था- "अगर वह गुनहगार है तो....।" अर्थात् उन्हें समस्त भारतीय विवेचना पर सन्देह था। न्याय पीठ पर भी शक था, जो एक कमसिन उम्र को अपराधी घोषित कर रही थी! उन्होंने संभावना व्यक्त की कि यदि सही ढंग से मामले की पैरवी हुई तो अजमल कसाब को बेगुनाह भी करार दिया जा सकता है। उन्होंने अपने लहजे में व्यंग्य की तिक्तता घोलते हुए कहा कि इस बात को मत भूलिए कि अजमल के साथ आरोपित हुए दो अन्य लोगों के विरुद्ध प्रस्तुत किए गए तमाम तकों को न्यायालय कचरे के डिब्बे में डालकर उन्हें मुक्त कर चुका है!.... उन्हें अजमल के द्वारा मारे गए बेगुनाह लोगों की रक्तरंजित तस्वीरों के परिपाश्र्व में यह कहते हुए कोई संकोच नहीं हुआ कि विश्व के तमाम सभ्य देशों से मृत्युदण्ड समाप्त किया जा चुका है। आपको किसी की जिन्दगी लेने का कोई हक नहीं है, उसको अकेले निरुद्ध रखना ही पर्याप्त कठोर सजा है!

भारतीय मीडिया में पिछले दिनों यही प्रकरण छाया रहा और कहीं-कहीं प्रकरण के खलनायक के प्रति भारी सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए उसे नायक बनाने की दुष्चेष्टा भी हुई। कहा गया कि जरा उस नौजवान की गरीबी का भी ख्याल करिए जो कुछ हजार रुपयों के लिए परदेश में अपनी जान हथेली पर लेकर चला आया!

क्या आपको ऐसे देश का नागरिक होने पर शर्मिन्दगी का अहसास नहीं होता जहां राष्ट्रघातकों को सहानुभूति का पात्र मानने वालों का भी एक अच्छा खासा वर्ग पूरी दमदारी के साथ उपस्थित है?

प्रशंसनीय पंच-प

मध्य प्रदेश में अब प्राथमिक तथा माध्यमिक शिक्षा में अगले शिक्षा-सत्र से "पंच प" को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। ये हैं-परिवार, परिवेश, परम्परा, पराक्रम और पहचान। प्रयास यह है कि हर बच्चे को अपनी, अपनों की और अपनी समृद्ध परम्परा की पर्याप्त जानकारी सहज रूप में प्राप्त हो जाए। उसे अपने बारे में, अपने माता-पिता, भाई-बहन, दादा-दादी के बारे में पता हो। अपने परिवार के साथ-साथ वह अपने परिपाश्र्व के प्रति भी सजग और सचेत हो। उसे अपने परिवेश की, अपने प्रतिवेशियों की पर्याप्त जानकारी हो और वह उनके साथ अपनी सम्बद्धता का अनुभव करे। यह एक महत्वपूर्ण पहल है। आज तो महानगरों में परिवार का अर्थ मात्र "हम दो, हमारे दो" तक सीमित रह गया है और आत्मकेन्द्रित होकर जीने की इस प्रवृत्ति का विस्तार नगरों, कस्बों और ग्रामों तक होता जा रहा है। कुछ कविता-पंक्तियां याद आर्इं-

भूल गया ये नगर अतिथि के स्वागत का संस्कार, हम दो और हमारे दो में सिमट गया परिवार। कोलाहल में सहमी-सहमी रहती है सरगम, फूहड़ अट्टहास ने फाड़े गीतों के परचम। कृत्रिम मुस्कानों को ओढ़े हैं रिश्ते-नाते, चीत्कारों में बदले हम कजरी गाते-गाते। रोज सुबह से शाम तलक है अन्धी भागमभाग। नहीं बोलता अब मुंडेर पर बैठ कहीं भी काग!

ऐसे माहौल में यह एक स्वास्तिकर समाचार है कि मध्य प्रदेश के बच्चे अपनी तीन पीढ़ियों के साथ भावनात्मक सम्बद्धता रखने की शिक्षा प्राप्त करेंगे। उन्हें अपने पिता-दादा-परदादा-मामा-नाना-परनाना और परनानी तक के नाम ज्ञात होंगे! उन्हें अपने ग्राम और शहर का नाम ही नहीं, नामकरण के कारण, उस क्षेत्र के प्रमुख त्योहार, परम्पराओं, मान्यताओं, सांस्कृतिक विशिष्टताओं, स्वतंत्रता सेनानियों, शहीद स्मारकों आदि की पर्याप्त जानकारी होगी। वे अपनी परम्परा से, अपने पूर्वजों से, उनके पराक्रम से तथा उनकी विशिष्टताओं से स्वयं को सम्बद्ध और समृद्ध महसूस करेंगे और इस प्रकार क्षेत्र-विशेष की सांस्कृतिक सुरभि से समन्वित होकर एक विराट राष्ट्र के वैभवपूर्ण व्यक्तित्व के स्वप्नद्रष्टा तथा स्रष्टा बनेंगे।

शिक्षा क्षेत्र में मध्य प्रदेश के शिक्षा मंत्रालय के मनीषियों का यह कदम सराहनीय है, अनुकरणीय है। अच्छा होता यदि केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय में बैठे मैकाले के मानसपुत्रों को भी ऐसी राष्ट्रीय भावदृष्टि प्राप्त हो जाती और समग्र राष्ट्र मध्य प्रदेश के द्वारा रचे गए मानक को स्वीकार करता। किन्तु इस देश में शायद हर स्तर पर ऐसा संभव नहीं होगा क्योंकि केन्द्रीय सत्ता के शीर्ष पुरुष राष्ट्र को एक अखण्ड सांस्कृतिक इकाई नहीं मानते, मात्र राज्यों का समूह मानते हैं और आत्मगौरव की वर्तनी तो वे पढ़ ही नहीं पाते! ग़्

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