गुम हुआ जाता है कुछ रेशमी उजालों की तरह, वक्त ठहरा हुआ है उलझे हुए सवालों की तरह।
अजब भूख है जो सदियों को निगल गई फिर भी, जिन्दगी लगती है भूखे को निवालों की तरह।
कोई चुभन है जो कि रह-रह कर टीस देती है, कुछ बिखरा हुआ है टूटे प्यालों की तरह।
हर मोड़ पे मिलते हैं अपने भी, बेगाने भी, सोच में मिलते नहीं कभी हम-ख्यालों की तरह।
बन्द दरवाजों को चांदनी नहीं खोल पाएगी, अंधेरे लटके हैं जंग खाये तालों की तरह।
रुख हवाओं का बदलने को तो बदल सकता है, लोग उलझे हुए हैं मगर मकड़-जालों की तरह।
NEWS