यादगार अनुभव


मेरे विवाह को 20 वर्ष पूरे हो गए हैं। किन्तु अभी भी ससुराल पहुंचने के दिन को याद करती हूं तो मन में हलचल-सी हो जाती है। विवाह पश्चात् घर के सभी रीति-रिवाज, रस्में होते ही मेहमान अपने-अपने घर चले गये। मेरे जेठ तथा देवर भी एक दिन बाद अपने स्थानों पर चले गये। घर में सास, ससुर, मैं तथा पति ही थे। अचानक चाचीजी की तबियत बिगड़ने का फोन आया और सास-ससुर भी लखनऊ के लिए निकले। घर में अब मैं तथा पति ही रहे। मायके में संयुक्त बड़ा परिवार, बड़ा घर, आस-पड़ोस पहचान वाले। यहां अभी पति से ठीक से परिचय भी नहीं हो पाया था कि अकेले रहना पड़ा। शादी होकर 2-4 दिन ही हुए थे। अत: आस-पास भी कौन रहता है, इसकी जानकारी नहीं थी। सुबह नाश्ता करके पतिदेव बैंक चले गये। घर में मैं अकेली। दोपहर 2-3 बजे तक जैसे-तैसे समय कटा। अब मुझे रोना आने लगा। उसी समय घर में काम वाली बाई आयी। उसे देख कर पता नहीं क्यों मैं उसके गले पड़कर रो पड़ी। वह भी घबरा गई। पुचकारते हुए मुझे समझाने लगी, "बहू बाई इत्ते अच्छे हैं ये लोग तुम्हारा खूब ध्यान रखेंगे, रोवी ना।" और सही में जब तक सासू मां वापस नहीं आयीं तब तक रोज पास की जितनी भाभी, चाची थीं सब बीच-बीच में चक्कर लगा जातीं, क्योंकि सासू मां ने सबको बता कर रखा था। घर के तो ठीक, मोहल्ले के भी सभी मेरे रिश्तेदार बन गये। मुझे मायका याद तक नहीं आया। सभी से मेरा परिचय भी हो गया। अब सोचती हूं, तो लगता है सासू मां ने जिम्मेदारी समझाने के लिए ही यह निर्णय तो नहीं लिया था? जो भी हो, यह मेरे जीवन का यादगार अनुभव है।

-भाग्यश्री नातू महाराष्ट्र मार्ग, बेनीगंज, छत्तरपुर-471001 (म.प्र.)

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