सरोकार - मृदुला सिन्हा


न भूलें रिश्तों की सुगंध

आज शहरों में उच्च शिक्षा प्राप्त बहू-बेटियां जब एक ही बच्चा या एक भी नहीं जन्मने की मन:स्थिति में आकर जिद कर बैठी हैं तो मुझे कई प्रकार की बातें सताती हैं। एक बच्चा ड्राइंग रूम के गमले का फूल हो जाता है। समाज रूपी झाड़ियों में जाकर उसके मुर्झाने की संभावनाएं अधिक रहती हैं। दूसरी बात कि वह न छीन कर खाना जानता है, न बांटकर। परंतु एक बच्चे से समाज में एक और गहन समस्या उत्पन्न हो रही है। वह है चाचा और बुआ जैसे रिश्तों का समाप्त होना। बच्चों के लालन-पालन में माता-पिता का हाथ तो होता ही है पर चाचा और बुआ के सान्निध्य में पला बच्चा सर्वगुणसंपन्न होता है। वैसे बच्चों के जीवन में इन्द्रधनुषी भाव और व्यवहार होते हैं।

संयुक्त परिवारों में बच्चे चाचा और बुआ के हाथों ही पलते थे। मां के पास तो दूध पीने या सोने के लिए ही आते थे। बुआ के ब्याह कर ससुराल जाने पर भतीजा-भतीजियां अधिक उदास हो जाती हैं। बुआ के ससुराल से मायके आने पर तो घर में खुशियां ही खुशियां छा जाती हैं। बच्चों को मजा आ जाता है। बुआ बच्चों की पसंद की खाने-पीने और पहनने की चीजें भी लाती हैं। बच्चे आनंदित होते हैं। भतीजे-भतीजियां अपनी बुआओं से हक से मांगती भी हैं। उनकी माएं डाटेंगी-"क्यों तंग करते हो बुआ को! फिर आएगी भी नहीं।"

बुआ विफर पड़ेगी-"ऐसा क्यों कहती हैं भाभी! ये बच्चे मेरे भी तो हैं।"

परिवार में हर रिश्ते का महत्त्व है। एक भी रिश्ते के अभाव में घर सूना-सूना लगता है। जीवन में उसका अभाव खलता है। परंतु बुआ तो बुआ होती है। कहीं फुआ, कहीं बुआ, कहीं पीसी मां और कहीं आत्या के नाम से पुकारी जाती महिला की उपस्थिति की अलग तासीर होती है। हमारे घरों के मांगलिक अवसर पर तो बुआ (बहन) के बिना कई रस्म ही संपन्न नहीं होतीं। भाई मकान बनवाए तो बहन (बुआ) के लिए नेग निकालना पड़ता है। भतीजों के विवाह-शादी और उपनयन संस्कार में तो बुआ के बिना रस्म ही नहीं संपन्न होतीं। बिहार में बच्चे के जन्म और उपनयन संस्कार पर खूब गीत गाए जाते हैं। उन गीतों में बुआ और भतीजे-भतीजियों के साथ रिश्तों की तासीर की व्याख्या होती है। एक गीत में भतीजे के जन्म और उपनयन संस्कार पर बुआ कपड़े और गहने लेकर आती है। भरपूर नेग न मिलने के कारण बुआ दु:खी है। वह कहती है-

सौ लेके अइली, पचासो न पइली अब नहीं अयबो नइहरवा।

पर दूसरे ही पल उसे महसूस होता है कि उससे भूल हो गई। वह मायके नहीं आएगी, भाई-भाभी, भतीजे-भतीजियों से नहीं मिलेगी तो उसका जीवन कितना फीका-फीका हो जाएगा। वह कहती है-

जीओ मोरा भाई, जीओ रे भतीजवा फिर-फिर आयब यही अंगना, बबुए की बधाई।

घर में एक बार बुआ आ जाए फिर तो बच्चों के बल्ले-बल्ले। बाजार-हाट जाना हो, चाट खाने जाना हो, घर में कुछ पकवान बनाना हो बुआ हाजिर हो जाती है। अकसर देखा जाता है कि एक स्त्री अपने बच्चों की बात नहीं मानती, उसके कहे पर झट से उठकर कुछ स्वादिष्ट व्यंजन नहीं बनाती, पर भतीजे-भतीजी के कहने पर उसे आलस नहीं सताता। बड़े प्रेम से भतीजे-भतीजियों की फरमाइशें पूरी करती है। कभी-कभी तो देखने वालों को अनुभूति होती है कि अपने बच्चों से अधिक भाई-भाभी के बच्चों को प्यार करती है। बड़ा ही निष्पाप और नि:स्वार्थ रिश्ता है बुआ का। कभी-कभी भाई-बहनों और बहनों-बहनों में भी प्रतिस्पर्धा देखी जाती है। भाई-भाई में तो जमीन-जायदाद के लिए लड़ाइयां होती ही हैं। परंतु बुआ-भतीजे के रिश्ते में प्रतिस्पर्धा या स्वार्थ नहीं होता। प्रीत का ही लेन-देन होता है।

हर स्त्री चाहती है कि ब्याह कर ससुराल जाने के बाद भी मायके से उसका रिश्ता बना रहना चाहिए। माता-पिता के जीवन काल तक तो वह निÏश्चत रहती है। भाई-भाभी के काल में भी मायके में सम्मान चाहती है। परंतु मायके में सम्मान पाने की उसकी भूख समाप्त नहीं होती। वह अंतर्मन से चाहती है कि उसके भाई के भी बच्चे हों, ताकि उसका मायके जाने का सिलसिला कायम रहे। मायके में भतीजों की आर्थिक उन्नति पर बुआ फूली नहीं समाती। हर रिश्ते की तरह बुआ भी एक भाव है। यह सार्वदेशिक भाव है। बुआ, बिहारी हो या केरल की, उड़िया हो या तमिलनाडु की, बुआ, बुआ होती है। किसी गुजरात के नौजवान ने किसी बिहार के व्यक्ति से एक महिला का परिचय कराया-"मेरी बुआ है।" फिर तो सुनने वाला भी उन दोनों के प्रेम में पग जाता है। उसे अपनी बुआ स्मरण हो आती है। उनका संग-साथ की स्मृति उसे सहला जाती है। थोड़े समय के लिए वे स्मृतियां जीवन में शीतलता घोल जाती हैं। ऐसी ही होती हैं बुआएं और बुआ-भतीजे का रिश्ता।

पारिवारिक जीवन में ननद-भौजाइयों के बीच प्रतिद्वन्द्विता दिखाई जाती है। ननदों का भाभी से बराबरी का रिश्ता होता है। वे मायके से उचित सम्मान और लेन-देन की अपेक्षा रखती हैं। इसलिए दोनों के बीच थोड़ा-बहुत अन्दरूनी या बोलचाल में टकराव भी दिखता है। पर बुआ का अपने भतीजे-भतीजियों पर न्योछावर होने के व्यवहार से भाभियां भी कायल हो जाती हैं। रिश्ता मधुर हो जाता है। ग्रामीण संयुक्त परिवारों में अधिकांश भाभियों के बच्चे बुआओं के हाथ ही पले होते थे। बच्चे और बुआ भी आजीवन उस स्पर्श को नहीं भूलते थे। दोनों के मन में बार-बार मिलने की चाहत रहती थी। बुआएं जब भी मिलती हैं, बच्चों को उनका बचपन स्मरण दिला देती हैं। फिर क्या है, आनंदित कर जाता है उस समय बुआ-भतीजे का मिलन।

आज हमारे शहरी जीवन की आपाधापी और भीड़ के अकेलेपन में बुआ भी खोती जा रही है। जिन घरों में एक ही बच्चा है, बुआ और चाचा कहां मिलेंगे। ढूंढने से भी बुआ नहीं मिलेगी। फिर कैसा होगा नीरस जीवन। जीवन की खुशहाली लाने के लिए रिश्ते-नाते भी चाहिए। अकेला जीवन भयावह होता है। रिश्तों से भरे जीवन में सुख-दु:ख और कठिनाइयां बहुत आती हैं। पर सब मिलकर बांट लेते हैं, सह लेते हैं। बुआ तो सब सुनती है।

समाज में रिश्ते बनाते समय आज महिलाओं के लिए वस्तुओं की तरह "ऑल इन वन" एक रिश्ता निकला "आंटी"। बुआ, मौसी, चाची यहां तक कि नानी की उम्र की महिलाओं को भी "आंटी" कहकर पुकारते हैं। मेरी भतीजियां फुआ कहकर ही पुकारती हैं। उनके मित्रों की भी फुआ हूं। बड़ा आनंद आता है फुआ बनकर। इसी दिल्ली में श्यामसुन्दर जी का संस्कारी परिवार है। तीन बेटे पवन, प्रभात और पीयूष। अब आ गई बहूरानी सोनाली। मैंने श्यामसुन्दर जी को भाई मान लिया था। चारों बच्चे जब भी कभी मिलते या दूरभाष पर बातें करते हैं, एक मिनट में दस बार "बुआ जी" "बुआ जी" कहेंगे। काम की बात भी भूल जाती हूं। मन इतना शीतल हो जाता है। पिता की बहन बुआ जी के प्रति ऐसा ही सम्मान और प्रीत उभरती है। इन्हीं संबंधों के इन्द्रधनुषी भावों से जीवन संवरता, सरस होता है। तनावमुक्त होता है। मां तो मां है, बुआ भी कम शीतलता नहीं देती। दु:खहरनी, जीवन में अमृत घोल जाती हैं। ये बुआएं बरकरार रहनी चाहिए हमारे समाज में। कहावत है "मां-बेटी दो वंश, बुआ-भतीजी एक वंश" द

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