विरोधाभासी बयानबाजी छोड़ें, एकजुट होकर अपनाएं सामूहिक रणनीति नरेन्द्र सहगल


मानवता के दुश्मन, असभ्यता के जीते-जागते प्रतिबिम्ब और जंगली जानवरों से भी बदतर नक्सलियों/माओवादियों द्वारा दंतेवाड़ा के जंगल में सीआरपीएफ के 76 जवानों की लाशें बिछा देने के महाजघन्य कृत्य को किसका दुर्भाग्य कहा जाएगा? सीमा और समाज के के रक्षक सुरक्षा बलों का, मानवाधिकारों के भौंपू बुद्धिजीवियों का, मरने वालों के बच्चों-माताओं-बहनों का, समस्त देश के सभ्य नागरिकों का या फिर उन राजनेताओं का, जो पिछले चालीस वर्षों से व्याप्त नक्सली खतरे से निपटने की ठोस रणनीति ही नहीं बना सके?

विनाशकारी भूल

जवानों के लहू से लाल हुई दंतेवाड़ा की धरती से कई सवाल उठ रहे हैं। इस खून-खराबे ने जहां एक ओर सरकारी सुरक्षा तंत्र को हिला कर रख दिया है वहीं दूसरी ओर मजबूत सुरक्षा के सरकारी दावों की भी धज्जियां उड़ा दी हैं। स्वयं देश के गृहमंत्री ने घड़ियाली आंसू बहाते हुए स्वीकार किया है कि "छत्तीसगढ़ पुलिस और अद्र्धसैनिक बलों के संयुक्त अभियान के दौरान कहीं कोई बहुत विनाशकारी भूल हुई है-इससे सुरक्षाकर्मी हमलावरों के जाल में फंस गए।" भारत के गृहमंत्री पी. चिदम्बरम को देश की जनता के समक्ष इस बात का जवाब देना होगा कि यह बहुत बड़ी विनाशकारी भूल सरकार की अनिश्चित रणनीति का परिणाम है अथवा देशद्रोहियों की बढ़ती जा रही ताकत का सबूत है? सुरक्षाकर्मियों की जिंदगी से खिलवाड़ करने वाले इस खूनी हादसे से उठे सवालों को भूल स्वीकारने और त्यागपत्र देने की राजनीतिक नौटंकी के शब्दजाल से नहीं छिपाया जा सकता।

देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, वायु सेनाध्यक्ष, रक्षामंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने दंतेवाड़ा में घटित नरसंहार के तुरंत बाद जिस तरह से गैर जिम्मेदाराना बयान दागे हैं, उनसे सुरक्षा बलों का मनोबल टूटने का खतरा तो है ही, इन नेताओं के आत्मविश्वास पर भय और भीरुता का शिकंजा भी कसता हुआ नजर आता है। इनकी इस तरह की स्वीकारोक्तियां ही इनके मानस में गहराई तक जड़ें जमा चुकी संशयात्मक निर्णायक क्षमता के उदाहरण हैं। गृहमंत्री महादेय ने 76 जवानों की शहादत को सुरक्षा बलों की विनाशकारी भूल बताकर जिम्मेदारी का ठीकरा सीआरपीएफ के सिर पर फोड़ते हुए जो विरोधाभासी बयान दिए हैं उनसे गृह मंत्रालय की ढुलमुल और डावांडोल कार्य पद्धति का परिचय मिलता है। गृहमंत्री महोदय ने एक जुबान से यह कहा कि, "अगर यह युद्ध का ऐलान है तो सरकार इसका मुंहतोड़ जवाब देगी" और दूसरी जुबान से यह भी कह दिया कि "इस लड़ाई में अब तक हमारे पास वायुसेना या किसी तरह के हवाई जहाज के इस्तेमाल की इजाजत नहीं है।" इस प्रकार के बचकाने वक्तव्य देकर गृहमंत्री महोदय देश की जनता और सुरक्षा बलों को आखिर क्या संदेश देना चाहते हैं?

संशयात्मक रणनीति

इसी तरह प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह ने भी अभी अमरीका जाने से पूर्व बुलाई एक महत्वपूर्ण बैठक में स्वीकार किया था कि सरकार अभी तक यह तय नहीं कर पाई कि माओवादियों/नक्सलियों से किस प्रकार निपटा जाए। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में गृहमंत्री पी.चिदम्बरम, वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी, रक्षा मंत्री ए.के.एंटोनी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन उपस्थित थे। सभी लोगों ने आग लगने के बाद कुआं खोदने की रणनीति का परिचय देते हुए सरकार की लचर राजनीतिक मनोवृत्ति को छिपाने की विफल कोशिश की। इस बैठक में यह फैसला ही नहीं हो सका कि माओवादियों से वार्ता करें, उनसे मुकाबला करने के लिए वायु सेना का सीधा इस्तेमाल करें अथवा युद्ध का जवाब युद्ध से दें। वास्तव में देशद्रोहियों से निपटने के लिए क्या किया जाए? इस बात का सटीक फैसला पिछले छह दशकों से लटकता चला आ रहा है। दंतेवाड़ा की घटना ने सो रही सरकार को एक बार फिर जगाने का काम किया है।

सरकार की कुंभकरणी नींद और फिर अचानक हड़बड़ाकर उठने के बाद मंत्रियों द्वारा दिए जाने वाले अधकचरे और गैर जिम्मेदाराना वक्तव्यों का असर उन सुरक्षाधिकारियों पर भी पड़ने लगता है जिन्हें ऐसे अवसरों पर गंभीर रहकर केवल मात्र अपने कर्तव्य पर अडिग रहना चाहिए। दंतेवाड़ा हादसे के तुरंत बाद जब समाचार पत्रों में हवाई सेना के इस्तेमाल पर चर्चा छिड़ी तो देश के वायु सेनाध्यक्ष एयर चीफ मार्शल पी.वी. नायक ने अनाधिकार चेष्टा करते हुए एक बयान दाग दिया, "वायु सेना, थल सेना और नौसेना के पास जो हथियार हैं, वे सीमापार के शत्रुओं के लिए हैं, जबकि नक्सली देश के भीतर के लोग हैं। उनके खिलाफ देश की सीमा के भीतर सेना का इस्तेमाल ठीक नहीं।"

भारत जैसे विशाल देश की वायु सेना के प्रमुख यह तो जानते ही होंगे कि अपने ही नागरिकों के विद्रोह को कुचलने के लिए देश के कई प्रांतों में सेना का सहारा लिया गया है। नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और पंजाब में विदेश प्रेरित आतंकवाद को समाप्त करने के लिए थल सेना एवं वायुसेना के हेलीकाप्टरों का इस्तेमाल हो चुका है। जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को समाप्त करने के काम में सेना अपना कर्तव्य निभा रही है। अत: वायुसेना, थल सेना और नौसेना के इस्तेमाल का फैसला नागरिकों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर लेने की जरूरत है, न कि परम्परा और इजाजत को आधार बनाकर। पुरानी लकीरें पीटते रहेंगे तो नए खतरों का सामना नहीं कर सकेंगे। देश और समाज की सुरक्षा पर आए प्रत्येक प्रकार के खतरों के समय राष्ट्रीय स्तर के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन व्यक्तियों को अपने-अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा में रहकर ही बोलना चाहिए।

लड़खड़ाता गृह मंत्रालय

लगता है कि दंतेवाड़ा नरसंहार के बाद जिम्मेदार लोगों द्वारा की गर्इं टिप्पणियों से हुए नुकसान को भांप लिया गया है। प्रधानमंत्री के निर्देशानुसार, केबिनेट सचिव के.एम.चंद्रशेखर ने सभी मंत्रियों और जिम्मेदार लोगों को पत्र लिखकर आंतरिक सुरक्षा जैसे मामलों पर चुप रहने के आदेश दिए हैं। इस प्रकार के मसलों पर अब केवल गृह मंत्रालय ही बोलेगा। यहां भी एक खतरा मौजूद है। अगर बिना पृष्ठभूमि और परिणाम का जायजा लिए आतंकियों एवं अलगाववादियों को वार्ता की मेज पर आमंत्रित करने वाले पी.चिदम्बरम जैसे गृहमंत्री हुए तो गृह मंत्रालय की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिन्ह लग जाएगा। कश्मीर में खूनी उत्पात मचाने वाले आतंकियों और उनके संरक्षक अलगाववादी संगठनों के साथ खामोश वार्तालाप की खतरनाक राजनीति करने, लालगढ़ में हुए माओवादी कत्लेआम के समय अपने को निर्दोष बताने वाले और अब दंतेवाड़ा घटना को सुरक्षा बलों की विनाशकारी भूल करार देने वाले गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की गीदड़ भभकियों पर क्या केबिनेट सचिव का पत्र लगाम लगा पाएगा?

वस्तुत: चीन प्रेरित माओवादी आतंकवाद को कुचलने के लिए एक सामूहिक राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। यह इच्छाशक्ति अथवा ठोस संयुक्त रणनीति राजनेताओं के विरोधाभासी विचारों, उच्च पदों पर बैठे जिम्मेदार लोगों के गैर जिम्मेदार बयानों और दलगत राजनीति से प्रेरित तथाकथित टिप्पणीकारों के वक्तव्यों की चीर-फाड़ से नहीं बनेगी। दंतेवाड़ा घटना के बाद जिन गैर राजनीतिक रक्षा विशेषज्ञों ने नक्सलवाद एवं सीआरपीएफ की सैन्य क्षमता का समीक्षात्मक मूल्यांकन किया है, उनके सुझावों के आधार पर सामूहिक रणनीति बनानी चाहिए अन्यथा एक-दूसरे के ऊपर जिम्मेदारी के ठीकरे फूटते रहेंगे।

रक्षा विशेषज्ञों की सुनें

"इंडियन मिलिट्री रिव्यू" के प्रबंध निदेशक सेवानिवृत्त मेजर जनरल आर.के.अरोड़ा के अनुसार, यदि दंतेवाड़ा सैनिक अभियान में जुटे जवानों को गुरिल्ला युद्ध का प्रशिक्षण दिया होता तो वे पलटवार कर सकते थे। हमलावरों द्वारा तीन ओर से घिरे इलाके में जाने के लिए पहले स्काउट या अग्रिम दल भेजकर दुश्मन की ताकत का जायजा लिया जाता है। दंतेवाड़ा में यह कवायद नहीं की गई। सीमा सुरक्षा बल के पूर्व महानिदेशक प्रकाश सिंह का मानना है कि दंतेवाड़ा सैन्य अभियान के समय सीआरपीएफ एवं प्रांत की पुलिस में तालमेल नहीं था। इतना बड़ा हादसा लापरवाही और जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास से हुआ है। छत्तीसगढ़ के पूर्व सुरक्षा सलाहकार और पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक के.पी.एस.गिल कहते हैं कि सरकार की नक्सल विरोधी रणनीति शत्रु की युद्धक क्षमता के मद्देनजर बननी चाहिए। नक्सली आतंकवाद साधारण नहीं है। यह भारत पर युद्ध की घोषणा है। सीआरपीएफ का अपना कोई खुफिया तंत्र न होने से इसे राज्य के खुफिया तंत्र पर निर्भर रहना पड़ता है।

रक्षा विशेषज्ञों ने रहस्योद्घाटन किया है कि दंतेवाड़ा में नक्सली हमले का निशाना बनी सीआरपीएफ की 62वीं बटालियन के 35 जवानों को ही नक्सल विरोधी कार्रवाई का प्रशिक्षण प्राप्त था। शेष जवानों को बिना प्रशिक्षण के ही हमलावरों की मांद में धकेल दिया गया था। यह नक्सली अथवा माओवादी कई वर्षों से जंगलों के भीतरी इलाकों में शासन कर रहे हैं। इनके पास अत्याधुनिक हथियारों की कमी नहीं है। गुरिल्ला युद्ध में पूरी तरह पारंगत नक्सली लोभ-लालच या भय से स्थानीय ग्रामीणों को इस्तेमाल करने का भी प्रयास करते है। यही वजह है कि स्थानीय भौगोलिक जानकारी से अनभिज्ञ बाहर से आए सुरक्षा कर्मियों को नुकसान उठाना पड़ता है।

र्इंट का जवाब पत्थर से

नक्सलवादियों अथवा माओवादियों को "गरीब किसानों/मजदूरों की आवाज" बताने वाले ऐसे वामपंथी संगठनों को भी कटघरे में खड़ा करने की आवश्यकता है जो इस प्रकार के खूनी हादसों की आग में अपने राजनीतिक स्वार्थों की रोटियां सेकते हैं। नक्सली आतंकवाद का असर केवल प.बंगाल, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार और आंध्र प्रदेश के जनजातीय इलाकों तक सीमित नहीं है। अगर भारत सरकार ने युद्ध स्तर पर इस देशद्रोह को समाप्त करने के लिए कोई सामूहिक सैन्य रणनीति नहीं बनाई तो इस खतरे की लपेट में अधिकांश भारत आ सकता है। नक्सली कमांडर ऐसी धमकियां दे भी रहे हैं। विदेशी धन और हथियारों के बल पर और भारत के भीतर मौजूद वामपंथी संगठनों की दबी जुबान के समर्थन से शक्तिशाली हुआ यह राष्ट्रद्रोह यदि सख्ती से कुचला नहीं गया तो देश की अखंडता, एकता और सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी।

भारत की सरकार, सेना, राजनीतिक दलों, बुद्धिजीवियों और समस्त जनता को एक स्वर से इस माओवादी युद्ध के खिलाफ युद्ध की घोषणा करनी चाहिए। समाजघातक राष्ट्रद्रोहियों ने भारत के राष्ट्रीय स्वाभिमान को ललकारा है। विशाल देश के विशाल सुरक्षातंत्र को चुनौती दी है। देश की अंतरराष्ट्रीय छवि को बिगाड़ने की कोशिश की गई है। लातों के भूतों ने बातों के सभी प्रस्ताव ठुकरा दिए हैं। भारत के सैन्य सामथ्र्य को मिली इस चुनौती को स्वीकारते हुए र्इंट का जवाब पत्थर से देने की हुंकार भरें। द

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