सन् 1999 की दीपावली की बात है। भारतीय समाज प्रकाश के दीये जलाकर तमस के
अंधेरे को भगाने की कामना कर रहा था। तभी राजधानी दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में रोमन कैथोलिक चर्च के पोप जान पाल द्वितीय अपने अनुयायियों को बता रहे थे कि ईसा की पहली सहस्राब्दी में हम यूरोपीय महाद्वीप को चर्च की गोद में लाये, दूसरी सहस्राब्दी में उत्तर और दक्षिणी महाद्वीपों व अफ्रीका पर चर्च का वर्चस्व स्थापित किया और अब तीसरी सहस्राब्दी में भारत सहित एशिया महाद्वीप की बारी है। इसलिए भारत के मतांतरण पर पूरी ताकत लगा दो। पोप दावा कर रहे थे कि ईसा और चर्च की शरण में आकर ही मानव की पापों से मुक्ति व उद्धार संभव है।
जब पोप साहब भारत की धरती पर खड़े होकर यह गर्वोक्ति कर रहे थे, उसी समय अमरीका और यूरोप के हजार डेढ़ हजार साल पहले मतांतरित ईसाइयों के वंशज पोप के दरबार में गुहार लगा रहे थे कि हमें अपने बिशपों-पादरियों के यौन शोषण से बचाओ, तुम्हारा चर्च ऊपर से नीचे तक पाप में डूबा हुआ है। अनेक प्रतिस्पर्धी चर्चों में रोमन कैथोलिक चर्च संख्या बल और प्रभाव में सबसे आगे है। उसके भीतर यह पापाचार कब से फैला हुआ है, इसका निश्चयात्मक उत्तर कठिन है। किंतु बीसवीं शताब्दी के सन् 1963 में इस पापाचार के विरुद्ध विद्रोह के स्वर विद्यमान थे, इसके पुष्ट प्रमाण उपलब्ध हैं। 27 अगस्त, 1963 को अमरीका में न्यू मैक्सिको स्थित "सर्वेन्ट्स आफ दि होली पोर्सलीट" नामक कैथोलिक प्रतिष्ठान के प्रमुख ने किशोरों के यौन शोषण में लिप्त पादरियों को सुधारने में असफल होने पर तत्कालीन पोप जॉन पाल षष्ठम् को पत्र लिखा कि इन पादरियों को बर्खास्त और निष्कासित किया जाए। उस पत्र से विदित होता है कि पादरियों द्वारा यह व्यभिचार दशाब्दियों से चल रहा था और वेटिकन को इसकी जानकारी थी। उस पत्र के लेखक फादर गेराल्ड फिट्ज गेराल्ड ने एक दिन पहले अपनी शिकायत लेकर पोप से भेंट की थी और अगले दिन अपनी शिकायत को पत्र में निबद्ध करना आवश्यक समझा।
किंतु फादर फिट्ज गेराल्ड की यह लिखित शिकायत भी अनसुनी रही। तब से अब तक पोप की गद्दी पर तीन नये चेहरे बैठ चुके हैं-जॉन पाल षष्ठम्, जान पाल द्वितीय (26 वर्ष) और 2005 से बेनेडिक्ट सोलह। पर अमरीका और यूरोपीय देशों से चर्च में व्याप्त इस भ्रष्टाचार के विरुद्ध लगातार शिकायतें आने पर भी वेटिकन और पोप ने उनके बारे में मौन साधा हुआ है। किशोर बालक-बालिकाओं के यौन शोषण का यह पापाचार एकाध देश या दो चार पादरियों तक सीमित नहीं है पूरा रोमन कैथोलिक चर्च ही उसमें लिप्त लगता है। यही कारण है कि चर्च की अस्तित्व रक्षा के हित में प्रत्येक पोप इन शिकायतों को अनसुना कर देता है। पादरियों के पापाचार के शिकार लोगों की संख्या कितनी बड़ी है इसका अनुमान इससे लग सकता है कि अमरीका और प्रत्येक यूरोपीय देश में इसके विरुद्ध मंच गठित हो गये हैं और उनकी सार्वजनिक अपील पर हजारों भुक्तभोगी अब खुलकर सामने आ रहे हैं। नीदरलैंड में 1995 में ही "हेल्प एंड लॉ लाइन" बन गयी थी। अमरीका में "सर्वाइवर्स नेटवर्क फार एब्यूज्ड बाई चर्च" नामक मंच बना है। इन मंचों के बनने से पीड़ितों में साहस आया है। वे पहले अपने को अकेला समझ कर चुप रहते थे। अब अपने जैसों की भारी भीड़ के वे अंग हैं। नीदरलैंड में पहले मुश्किल से 10 भुक्तभोगी सामने आये, पर इस एक मार्च से उनकी संख्या 1300 पार हो गई है। 30 मार्च को जर्मनी में सहायता केन्द्र खुलने की घोषणा होते ही तीन दिन में 2700 शिकायतें आ गयीं। वर्तमान पोप बेनेडिक्ट के बेवेरिका स्थित उनके गांव के चर्च में व्याप्त दुराचार पर 173 पृष्ठ लम्बी रपट तैयार हो गयी।
पापाचारियों को संरक्षण
अब यह पुष्ट धारणा बनी है कि पिछले पोप जॉन पाल द्वितीय ने जानबूझकर पापाचार की इन शिकायतों की जांच नहीं होने दी और चुप्पी साधे रखी। उनके पोप काल में वर्तमान पोप बेनेडिक्ट सोलह अपने पूर्व नाम कार्डीनल जोसेफ रेटजिन्टट के नाम से जाने जाते थे और वेटिकन में उस कमेटी के प्रमुख थे जिसके जिम्मे ऐसी शिकायतों की जांच करने का दायित्व था। अभी 1986 में उनके द्वारा हस्ताक्षरित एक पत्र प्रकाश में आया है जिसमें यौन शोषण की एक शिकायत पर जांच को उन्होंने यह कहकर बंद कर दिया कि इससे कैथोलिक चर्च के व्यापक हितों की हानि होगी। पापाचार को रोकने से अधिक महत्वपूर्ण वेटिकन के हित क्या हो सकते हैं? चर्च ने यौनाचार और सम्भोग को ही पाप माना है। उसकी दृष्टि में मनुष्य का जन्म ही पाप कर्म में से होता है। इस पाप कर्म से बाहर निकलने पर ही मनुष्य का उद्धार संभव है। यदि चर्च सचमुच यह विश्वास करता है तो चर्च को ऐसे पापाचारी पादरियों से मुक्त करना उसकी पहली चिंता होनी चाहिए। पर वेटिकन किन्हीं अन्य हितों की रक्षा के लिए इन पापाचारियों को संरक्षण दे रहा है और नये-नये क्षेत्रों में मतांतरण की फसल काटने में जुटा हुआ है।
वेटिकन ने इन शिकायतों के बारे में सरल रास्ता अपनाया है कि जिस पादरी के विरुद्ध पापाचार की शिकायत हो उसका स्थान बदल दो या दायित्व बदल दो। ऐसे दो उदाहरण अभी भारत में ही सामने आये हैं। एक भारतीय पादरी जोसेफ पलनीवेल जयपाल को अमरीका की क्रुकटन डायसिस में बिशप बनाकर भेजा गया। वहां 14 वर्षीय किशोरी के साथ यौनाचार का उसका पाप प्रकाश में आया। उसे भारत भेज दिया गया। वह आज भी उटकमंड डायसिस में चर्च द्वारा संचालित विद्यालयों के लिए शिक्षकों की चयन प्रक्रिया का अंग है। मुम्बई से प्रकाशित सीबीपीआई के मुखपत्र "एक्जामिनर" में फादर ग्रेसियास ने उसके बचाव में वक्तव्य दिया। अमरीका में उसके विरुद्ध केस दायर हुआ है। उसे अमरीका की अदालत में पेश होने की मांग है पर आरोपी फादर जयपाल ने सार्वजनिक वक्तव्य दिया है कि वह अमरीका नहीं जाएंगे। अदालत के सामने पेश नहीं होंगे। मद्रास के आर्च बिशप फादर एम.चिनप्पा ने उटकमंड के बिशप से कहा कि जयपाल के विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए। किंतु उटकमंड के बिशप अठलप्पन अमलराज ने कहा कि वेटिकन के भारत स्थित राजदूत का निर्देश मिलने पर ही कोई कार्रवाई की जा सकती है। अमरीका से 21 दिसम्बर 2006 को वेटिकन के पास लिखित रूप से प्रार्थना भेजी गयी कि फादर जयपाल को न्यायालय का सामना करने के लिए अमरीका भेजा जाए पर वेटिकन मौन है।
अमरीका में एक अन्य भारतीय पादरी का पापाचार भी प्रकाश में आया है। फ्रांसिस एक्स नामक इस भारतीय पादरी को न्यूयार्क के एक कैथोलिक चर्च ब्राकलिन में एक 12 वर्षीय कन्या के साथ व्यभिचार के आरोप में न्यायालय ने 2003 में चार माह की सजा दी। सजा पूरी होने पर वह भारत लौट आया और तमिलनाडु में कोट्टर डायसिस में वह अभी भी बिशप के कार्यालय में काम कर रहा है। ऐसे कितने व्यभिचारी पादरी भारत के चर्चों में भरे होंगे कौन कह सकता है।
विद्रोह शुरू
जान पाल द्वितीय के एक आस्ट्रियन मित्र हन्स हरयन ग्रोअर ने बीसियों वर्षों तक 2000 से अधिक किशोरों के साथ व्यभिचार किया। 1995 में उसका पापाचार प्रकाश में आया। वेटिकन में कान्ग्रीगेशन फार दि डाक्ट्रिन आफ फेथ के प्रमुख के नाते वर्तमान पोप ने उसकी जांच आरंभ की परंतु तत्कालीन पोप ने उसे रुकवा दिया। पिछले हफ्ते वियना के सेंट स्टीफेन केथेड्रल में ग्रोअर के उत्तराधिकारी कार्डीनल क्रिस्टोफ शोनबन ने एक विशेष प्रार्थना में ग्रोअर के पाप को स्वीकार किया। पोलैंड में आर्च बिशप जुलियज पायेट्ज ने प्रशिक्षार्थी पादरियों के साथ पापाचार किया। 2000 में ही पोप को इसकी लिखित शिकायत की गयी। पर वे चुप रहे। 2002 में सार्वजनिक भंडाफोड़ होने पर पायेट्ज ने त्यागपत्र दिया। अमरीका में विस्कोंसिन में चर्च द्वारा चालित एक मूक बधिर विद्यालय के 2000 बच्चों के साथ फादर लारेंज मरफी वर्षों तक दुराचार करता रहा। 1998 में एक मैक्सिकन पादरी मारसियाल मोसिम्मेल दोगलियाडो के विरुद्ध यौन शोषण के आरोप लगे पर पोप जॉन पाल द्वितीय ने 2004 में उसे वेटिकन में सम्मानित किया। माईकेल ट्फस्र्ट (54 वर्ष) ने रहस्योद्घाटन किया कि वह सत्तर के दशक से ही इस पापाचार के विरुद्ध शिकायत करता आ रहा था। अंतत: चर्च ने 2004 में उसे अपना मुंह बंद रखने के लिए 3000 पौंड की रिश्वत भेंट की। वेटिकन में तीन पूर्व पोपों के निजी सचिव रहे जोन मागी को 1987 में क्लोयने का बिशप घोषित किया गया। पिछले महीने ही उसके विरुद्ध आरोप प्रकाशित होने पर उसे त्यागपत्र देने के लिए बाध्य किया गया।
पापाचार के आरोपों और अपराधियों की सूची इतनी लम्बी है कि उसे दोहराना व्यर्थ है। इस पापाचार में वेटिकन की संलिप्तता इतनी स्पष्ट है कि अब निराश श्रद्धालु विद्रोह करने पर उतारू हो गए हैं। मार्च 2010 में आस्ट्रिया में बीस हजार कैथोलिकों ने चर्च छोड़ने की घोषणा कर दी है। चर्च आफ इंग्लैंड के प्रमुख कैंटरबरी के आर्चबिशप रोवान विलियम्स ने आयरलैंड के कैथोलिक चर्च की पहली बार सार्वजनिक आलोचना करते हुए कहा कि पादरियों के इस व्यभिचार को रोकने में असमर्थ होने के कारण आयरलैंड के रोमन कैथोलिक चर्च की विश्वसनीयता समाप्त हो गयी है। पोप बेनेडिक्ट सोलह की सितम्बर 2010 में इंग्लैंड और स्काटलैंड की प्रस्तावित यात्रा के विरोध में 10000 नागरिकों के हस्ताक्षरों से युक्त विरोध पत्र डाउनिंग स्ट्रीट की वेबसाइट पर प्रचारित हुआ है। एक ताजे सर्वेक्षण के अनुसार अमरीका में वर्तमान पोप की लोकप्रियता दो वर्ष में 63 प्रतिशत से घटकर 40 प्रतिशत रह गयी है। ब्रिाटेन में वेटिकन एक राज्य का दर्जा दिये जाने पर भी आपत्ति उठायी जा रही है। वेटिकन को एक राज्य है या केवल एक उपासना पंथ का मुख्यालय? यह प्रश्न उठने लगा है। पोप को एक पांथिक नेता के साथ-साथ राज्याध्यक्ष का सम्मान क्यों दिया जाता है? क्यों वेटिकन को संयुक्त राष्ट्र संघ में पर्यवेक्षक का दर्जा दिया गया है? क्यों वेटिकन को प्रत्येक देश में अपने राजदूत नियुक्त करने का अधिकार मिला है? क्या वेटिकन किसी भी देश के कानून से ऊपर है?
वेटिकन का आरोप
चारों ओर से उमड़ती आंधी के विरुद्ध वेटिकन का आरोप है कि हमारे विरुद्ध अपप्रचार की यह आंधी अमरीका की यहूदी लाबी और विश्व इस्लामवाद ने खड़ी की है। ईसाइयों का एक वर्ग पोप का इसलिए विरोध कर रहा है क्योंकि उन्होंने भ्रूणहत्या व समलैंगिक यौनाचार के विरुद्ध कड़ी भूमिका अपनायी है। किंतु यदि चर्च सचमुच समलैंगिक यौनाचार के विरुद्ध है तो अनेक देशों के अनेक पादरियों के बारे में अनेक वर्षों से आ रही शिकायतों की उसने जांच क्यों नहीं होने दी? पापाचारी पादरियों की सार्वजनिक भत्र्सना क्यों नहीं की? उन्हें चर्च से निष्कासित क्यों नहीं किया? गरीब और पिछड़े वर्गों का मतांतरण करने के पूर्व अपने घर का शुद्धिकरण करना आवश्यक क्यों नहीं समझा? अब जब पानी सिर से ऊपर चला गया तब वेटिकन ने पहली बार कुछ विधि निषेध जारी किये हैं और भारत में सीबीसीआई 25 अप्रैल को एक उच्चस्तरीय सम्मेलन बुला रही है।
यूरोप और अमरीका से उखड़ने के बाद अब चर्च भारत जैसे देश में गरीब और अबोध जनजातियों व दलित वर्गों के मतांतरण पर पूरी शक्ति लगा रहा है। इसके लिए राज्यशक्ति का भी उपयोग कर रहा है। अभी पिछले महीने हैदराबाद यात्रा के समय पता चला कि दिवंगत मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी ने एक विवाहित ब्रााहृण अनिल कुमार के ईसाई बनाकर अपनी पुत्री का विवाह उनसे कर दिया। बताया गया कि समुद्र तटवर्ती जिलों में मतांतरण का अभियान तेजी से चलाया जा रहा है। तमिलनाडु में पोप के दबाव के कारण तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता को उपासना स्वातंत्र्य एक्ट को रद्द करना पड़ा। उड़ीसा में स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या से प्रगट हुआ कि चर्च मतांतरण में बाधक तत्वों को हटाने के लिए माओवादी मुखौटे का इस्तेमाल कर रहा है। अमरीका के उपासना स्वातंत्र्य आयोग और यूरोपीय संघ के जांच दल के माध्यम से वह भारत में विदेशी हस्तक्षेप आमंत्रित कर रहा है। कहने को तो कैथोलिक चर्च भारत में 25000 स्कूल और कालेज चलाता है। पर 400-500 साल पहले ईसाई बनाये गये भारतीयों को चर्च आज भी दलित श्रेणी में ही रखता है, उनके आर्थिक भरण पोषण के लिए आरक्षण की बैसाखी की मांग कर रहा है। उनका वोट बैंक की तरह इस्तेमाल कर रहा है।
यदि वेटिकन में थोड़ी भी आध्यात्मिक चेतना शेष है तो उसे मतांतरण को बंद करके पहले आत्म-शुद्धि का प्रयास करना चाहिए। अपने को राज्य के बजाय धर्म संस्थान की भूमिका तक सीमित रखना चाहिए। नैतिक आचरण का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। इससे भी अधिक अच्छा होगा कि वह विश्व भर में फैले अपने विशाल संगठन तंत्र को भंग कर आध्यात्मिक विकास का मार्ग खोजने के लिए स्वतंत्र छोड़ दे। द
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