सूचना-अधिकार में संशोधन का अनुरोध क्यों? न्यायपालिका में पारदर्शिता जरूरी


भारत के मुख्य न्यायाधीश ने सूचना अधिकार कानून में संशोधन का अनुरोध किया है। प्रधानमंत्री को लिखे एक पत्र में उन्होंने सूचना अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 8 में संशोधन करके अदालतों से सम्बन्धित सूचनाओं को इस कानून की परिधि से बाहर करने का आग्रह किया है। उनका तर्क है कि इस कानून से न्यायिक स्वतंत्रता का क्षरण हो रहा है। उन्हें आशंका है कि कुछ लोगों की ताकझांक से तमाम संवेदनशील सूचनाएं आम जनता को मिल सकती हैं जिससे न्यायपालिका को स्वतंत्रतापूर्वक काम करने में मुश्किल होगी।

पारदर्शिता की संस्कृति

सूचना-अधिकार कानून के अस्तित्व में आने से करीब दो दशक पहले सर्वोच्च न्यायालय ने खुले लोकतंत्र का आवाहन किया था। एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ में न्यायमूर्ति पी.एन.भगवती ने कहा था कि पारदर्शी सरकार वर्तमान समय की नयी लोकतांत्रिक संस्कृति है जिस ओर पूरा विश्व प्रयाण कर रहा है तथा हमारा देश इसका अपवाद नहीं हो सकता। इस सिद्धान्त को आगे बढ़ाते हुए हमारी अदालतों ने कई ऐतिहासिक फैसले दिए। सूचना के अधिकार को मूल अधिकार का दर्जा दिया। इसी सिद्धान्त पर चलकर जनप्रतिनिधियों की सम्पत्ति, उनके आपराधिक रिकार्ड तथा उनके बारे में अन्य सूचनाएं मांगी गयीं। यहां तक कि जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन करना पड़ा। सर्वोच्च न्यायालय के इन्हीं प्रयासों का परिणाम रहा कि सूचना अधिकार अधिनियम 2005 वर्तमान रूप में हमारे सामने है और धीरे-धीरे वह सामाजिक सशक्तीकरण का मजबूत माध्यम बनता जा रहा है। यह बात आम आदमी के गले नहीं उतरती कि जो कानून सरकारी गोपनीयता के अंधेरे को दूर कर पारदर्शिता की संस्कृति विकसित करने में सहायक हो रहा हो वह न्यायपालिका की स्वायत्तता में बाधक कैसे हो सकता है?

सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 8 में इस अधिकार के अपवादों का वर्णन है। इसमें उन परिस्थितियों का वर्णन है जब सूचना का अधिकार लागू नहीं होगा। इसमें उन परिस्थितियों को समेटने की कोशिश की गयी है जिनमें सूचना का अधिकार लोकहित के विरुद्ध हो सकता है। उदाहरण के लिए, राष्ट्र की सम्प्रभुता, एकता या अखण्डता से जुड़े मामले, अदालती अवमानना या संसदीय विशेषाधिकार हनन से सम्बन्धित सूचनाएं, विदेशी सरकारों द्वारा दी गयी सूचनाएं या किसी मामले की जांच से जुड़ी सूचनाएं, वाणिज्यिक गोपनीयता या मंत्रिमण्डल की कार्यवाही इत्यादि। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति के.जी.बालकृष्णन का सुझाव है कि शीर्ष न्यायालय तथा उसके न्यायाधीशों से जुड़ी कुछ सूचनाओं को भी धारा-8 में वर्णित अपवादों में जोड़ दिया जाय ताकि उनकी स्वायत्तता से छेड़छाड़ न की जा सके।

न्यायालय की विश्वसनीयता

न्यायालय एक लोकतांत्रिक संस्था है। उसकी विश्वसनीयता ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है। जन विश्वास उसकी सबसे बड़ी संजीवनी है। अदालतें कोई ऐसा काम नहीं निष्पादित करतीं जो राष्ट्र की एकता या अखंडता को प्रभावित करता हो। उनका कोई कार्य इतना संवेदनशील नहीं होता जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ हो। वे तो आम आदमी के विश्वास को हासिल करने तथा उसे बनाए रखने के लिए खुली अदालत में कार्यवाही व खुली अदालत में निर्णय देने की परम्परा के संवाहक हैं। वे व्यक्तिनिष्ठा की विरोधी तथा वस्तुनिष्ठता की पक्षधर होती हैं। उन्होंने पिछले अनेक वर्षों में अपने फैसलों के कारण तथा उनका आधार बताने की संस्कृति विकसित करके जनविश्वास हासिल किया है। ऐसी परिस्थितियों में यह समझ पाना कठिन है वे सिद्धान्त जो पारदर्शिता के आधार पर राज्य की दूसरी संस्थाओं के आचरण के मानक हैं, न्यायपालिका के हित के प्रतिकूल कैसे हो सकते हैं?

पिछले कुछ दशकों में अदालतों की अपने को सामान्य कानूनी उपबन्धों से परे रखने की प्रवृत्ति बढ़ी है जिसके अच्छे परिणाम नहीं रहे हैं। के.वीरस्वामी के मुकदमे में 25 जुलाई 1991 को सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश की अनुमति के बगैर किसी जज के विरुद्ध कोई एफ.आई.आर. दर्ज नहीं होगी। इसके पीछे तर्क यह दिया गया था कि न्यायाधीश को अनावश्यक कानूनी पचड़ों से बचाने और उन्हें स्वतंत्रतापूर्वक काम करने देने के लिए यह जरूरी है। संयोगवश उसके बाद ऐसे कई प्रकरण आए जिनमें अदालत की प्रतिष्ठा को गम्भीर क्षति पहुंची। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश रामास्वामी के ऊपर महाभियोग की कार्यवाही चली और राजनीतिक कारणों से वे किसी तरह उससे बच पाए। इस समय कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सौमित्र सेन और कर्नाटक उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दिनकरन के साथ भी वैसी ही स्थिति बन चुकी है। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति वाई.के.सब्बरवाल के विरुद्ध मामला मुख्य सतर्कता आयुक्त के पास भेजा गया जिन्होंने जांच के बाद आवश्यक कार्रवाई के लिए उसे कानून मंत्रालय के पास भेज दिया। इसी बीच वे सेवानिवृत्त हो गए और मामला ठंडे बस्ते में चला गया। इसी तरह गाजियाबाद जिला अदालत के कर्मचारियों की भविष्य निधि से 23 करोड़ रु. की धनराशि के गबन का मामला लम्बे समय तक सुर्खियों में रहा। आरोप था कि इसमें सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के 10 न्यायाधीशों सहित कुल 30 न्यायाधीशों की संलिप्तता थी। सी.बी.आई. जांच के आदेश दिए गए, किन्तु उन्हें पूछताछ करने की छूट नहीं दी गयी। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में एक न्यायाधीश को दूसरे के धोखे में (नाम की समानता के कारण) 15 लाख रु. की रकम पहुंचाने का मामला जोर-शोर से उठा किन्तु अब उसका भी कुछ पता नहीं। ऐसे में यदि आम आदमी के मन में यह बात घर कर जाय कि न्यायाधीश केवल "पर उपदेश कुशल बहुतेरे" के सिद्धान्त पर चलते हैं और वे कानून को अपने ऊपर नहीं लागू करना चाहते, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं। यदि ऐसा हुआ तो यह न्यायपालिका के लिए बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा।

बीते कुछ समय में न्यायपालिका में अपने वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों की अवमानना के प्रकरण बढ़ने लगे हैं। आम आदमी को यह देखकर आश्चर्य होता है कि यदि महाराष्ट्र विधान सभा में अबू आजमी के साथ दुव्र्यवहार करने वाले विधायकों को चार घन्टे के अन्दर विधानसभा से निलम्बित कर दिया जाता है या प्रश्न पूछने के बदले धन लेने वाले सांसदों को 24 घन्टे के अन्दर लोक सभा से निष्कासित कर दिया जाता है तो गम्भीर आरोपों से जुड़े न्यायाधीशों के ऊपर कार्रवाई क्यों नहीं हो सकती?

इसलिए सूचना अधिकार में न्यायपालिका के लिए किया गया कोई भी संशोधन आम जनता को अच्छा संदेश नहीं देगा। हमें इससे बचने की जरूरत है। कानून के शासन में भरोसा रखने वाले राज्य के रूप में हमें इस पर सावधानी बरतनी चाहिए। द

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