कांग्रेस के आंतरिक विरोधाभास खतरनाक
दंतेवाड़ा नरसंहार के बाद सरकार सकते में है, उससे कोई जवाब देते नहीं बन रहा। सबसे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति तो यह है कि इस गंभीर राष्ट्रीय समस्या पर राजनीतिक दायरों से परे विपक्ष सरकार को सब प्रकार से सहयोग देने को तैयार है और कह रहा है कि सरकार पूरी ताकत के साथ लड़ाई जारी रखे। लेकिन सरकार, विशेषकर उसका नेतृत्व करने वाली सोनिया पार्टी में ही एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए घमासान मचा है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने गृहमंत्री पी. चिदम्बरम पर निशाना साधते हुए उनकी कार्यशैली पर ही सवाल खड़े कर दिए। कांग्रेस आलाकमान इसे उनकी निजी राय बताकर पार्टी की राय का हिस्सा नहीं मान रही और हिदायत दे रही है कि उन्हें ऐसी बातें सार्वजनिक रूप में नहीं बल्कि पार्टी मंच पर उठानी चाहिए। लेकिन प्रश्न यह है कि दिग्विजय सिंह गाहे-बगाहे ऐसी बातें क्या अपने मन से बोलते हैं या पार्टी आलाकमान के किसी गुप्त एजेंडे के अनुसार अपनी भूमिका तय करते हैं? पिछले दिनों दिल्ली के बाटला हाउस कांड से जुड़े एक आतंकवादी के पकड़े जाने पर उसके गांव संजरपुर जाकर उन्होंने जो बयान दिया, उससे उत्पन्न विवाद पर भी कांग्रेस ने उसे उनकी निजी राय बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया था, परंतु दिग्विजय सिंह यहीं नहीं रुके उन्होंने राहुल गांधी को संजरपुर ले जाने की घोषणा कर दी। लेकिन सोनिया गांधी ने इसकी भी अनदेखी कर दी, शायद पार्टी इस एजेंडे पर चल रही हो कि दिग्विजय सिंह का उछाला हुआ बयान उत्तर प्रदेश विधानसभा के आगामी चुनावों में कांग्रेस की झोली में मुस्लिम वोटों की झड़ी लगा सकता है। अन्यथा क्या कारण है कि पार्टी का एक महासचिव अपनी मनमर्जी से एक के बाद एक बयान देता रहे और पार्टी उसे उसकी निजी राय बताकर पल्ला झाड़ती रहे। जबकि दिग्विजय आलाकमान के बेहद नजदीक माने जाते हैं।
कहीं ऐसा तो नहीं कि कांग्रेस में चिदम्बरम के खिलाफ कुछ पक रहा हो, उसे आलाकमान की शह मिली हो और दिग्विजय सिंह उसे हवा दे रहे हों? जब सोनिया गांधी ऊल -जलूल बयानबाजी के लिए सत्यव्रत चतुर्वेदी को "सजा" दे सकती हैं तो दिग्विजय तो बार-बार वैसा कर रहे हैं। लोकसभा में दंतेवाड़ा घटना पर दिनभर चली चर्चा का जवाब देते हुए गृहमंत्री कहते हैं कि माओवादियों को मात देने के लिए सामूहिक कोशिश की जरूरत है, लेकिन विडम्बना यह है कि सरकार में ही एका नहीं है। विपक्ष का यह आरोप गंभीर है कि सरकार में बैठे कुछ नेता "आधे माओवादी" हैं। ममता बनर्जी केवल चुनावी चश्मे से नक्सली समस्या को देख रही हैं और उन्हें लालगढ़ में तो क्या, पूरे पश्चिम बंगाल में माओवादी नजर नहीं आ रहे। वहां चल रहे नक्सल विरोधी अभियान को वह "जनता के खिलाफ साजिश" बताती हैं। वैसे भी गंभीर राष्ट्रीय संकटों से निपटने में कांग्रेस का इतिहास दागदार है। गत आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव में जीत के लिए नक्सलियों से साठ-गांठ के आरोप कांग्रेस पर लग चुके हैं, जब भाजपा की ओर से लोकसभा में यह मुद्दा उठाया गया तो कांग्रेसी तिलमिला गए। जिहादी आतंकवाद पर भी कड़ी नीति बनाकर उससे सख्ती से निपटने से कांग्रेस व उसके नेतृत्व वाली संप्रग सरकार इसलिए बचती रही है कि वह वोट की राजनीति करते हुए मुस्लिमों को नाराज नहीं करना चाहती। जब नीयत ठीक न हो, पार्टी व गठबंधन भी एक राय न होकर विभाजित हो तब "दुश्मन नं. 1" से लड़ाई कैसे जीती जा सकती है? पार्टी के नेता और गठबंधन के लोग ही जब सरकार की नीति को चुनौती दे रहे हों तो बात और गंभीर हो जाती है। विपक्ष तो साथ खड़ा है, पर कांग्रेस को यह समझना चाहिए कि पार्टी और सरकार के अंतर्विरोध देश के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं, क्योंकि इनके चलते नक्सलियों के खुले युद्ध की चुनौती से पार नहीं पाया जा सकता और यह देश के लिए बेहद विनाशकारी साबित होगा।
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