केन्द्र से प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रुपए की वित्तीय सहायता के बावजूद जम्मू-कश्मीर सरकार का ऋण तेजी के साथ बढ़ता जा रहा है और इन ऋणों पर सरकार को भारी ब्याज देना पड़ रहा है। सरकारी अनुमान के अनुसार इस ब्याज पर राज्य के कुल व्यय का प्रतिवर्ष 9 प्रतिशत खर्च तक पहुंच गया है। एक अनुमान के अनुसार यह ऋण 30,000 करोड़ रुपए से भी अधिक हो गया है। एक सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार 2008-09 के अंत में राज्य सरकार के ऋण 24,275 करोड़ रुपए थे। इस ऋण में आंतरिक ऋण 13336 करोड़ रुपए का था।
केन्द्र की ओर से विशेष दर्जा पाए जम्मू-कश्मीर को 90 प्रतिशत सहायता तथा केवल 10 प्रतिशत ऋण के रूप में दिया जाता है किन्तु इसके पश्चात भी केन्द्रीय सरकार का ऋण 4000 करोड़ रुपए से भी अधिक हो गया है। सन् 2009-10 में राज्य सरकार को इन ऋणों पर 2000 करोड़ रुपए से भी अधिक ब्याज देना पड़ा है।
उल्लेखनीय बात यह है कि सरकारी ऋणों या सरकार की नीतियों का सबसे अधिक लाभ जम्मू-कश्मीर बैंक को पहुंचा है। एक अनुमान के अनुसार इस बैंक को राज्य सरकार ने गत 10 वर्षों में 1600 करोड़ रुपए से भी अधिक राशि ब्याज के रूप में दी है।
राज्य सरकार की अपनी एक रपट के अनुसार गत 8 वर्षों में अर्थात् 2001 से लेकर 2009 तक इस बैंक से "ओवर ड्राफ्ट" प्राप्त करने के लिए 1908 करोड़ रुपए से भी अधिक राशि ब्याज के रूप में दी है।
जागरूक लोगों का आरोप है कि केन्द्र से प्रतिवर्ष भारी सहायता प्राप्त करने के पश्चात भी इस राज्य की वित्तीय स्थिति गंभीर होती जा रही है। सरकारी कर्मचारियों के आंदोलन के कारण सरकार ने जो वित्तीय तथ्य सामने लाए हैं वह चौंका देने वाले हैं। इन आंकड़ों के अनुसार राज्य की कुल आंतरिक आय प्रतिवर्ष 3600 करोड़ रुपए है जबकि सरकारी कर्मचारियों के वेतन का खर्चा ही 9000 करोड़ रुपए है। पेंशनरों की पेंशन का वार्षिक खर्चा 1800 करोड़ रुपए है और महंगाई भत्ते का खर्चा 725 करोड़ रुपए है। यह उल्लेखनीय है कि चार वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने इस राज्य के लिए 24000 करोड़ रुपए का एस विशेष पैकेज घोषित करते हुए दावा किया था कि जम्मू-कश्मीर को उदाहरणीय राज्य बना देंगे। लेकिन सरकार के आंकड़े कुछ और कहानी कह रहे हैं। द गोपाल सच्चर
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