उत्तर प्रदेश में नक्सलियों की ताकत और दायरा लगातार बढ़ रहा है, क्योंकि उनके पास धन और आधुनिक हथियारों की कमी नहीं है। पुलिस-प्रशासन द्वारा बनायी गयी कोई भी रणनीति अब तक नक्सलियों के बढ़ते प्रभाव को रोक नहीं सकी है। उत्तर प्रदेश में सरकारी तौर पर सबसे पहले 1990 में नक्सलियों का प्रभाव स्वीकार किया गया था। तब बिहार से सटे पूर्वाञ्चल के तीन जनपदों मिर्जापुर, सोनभद्र और चन्दौली को "रेड जोन" से चिन्हित किया गया था, जबकि मऊ और आजमगढ़ को "यलो जोन" माना गया था। सत्ता में बैठे लोग नक्सलियों के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए कितने गम्भीर रहे हैं इसका आकलन इस तथ्य से किया जा सकता है कि इस बीच पूर्वी उत्तर प्रदेश के वाराणसी, गाजीपुर और कुशीनगर जनपद के कई गांवों में नक्सली अपनी पैठ बनाने में सफल रहे।
वर्ष 2000 के बाद नक्सलियों की ताकत इतनी बढ़ी कि वह सीधे-सीधे पुलिस प्रशासन पर हमला बोलने लेने लगे। 21 नवम्बर, 2001 को नक्सलियों ने मिर्जापुर के खोराडीह में पी.ए.सी. कैम्प पर हमला करके जवानों को बंधक बनाया तथा 11 एस.एल.आर. रायफलें, एक एल.एम.जी., एक कार्बाइन तथा भारी मात्रा में कारतूस लूट ले गए। छिटपुट घटनाओं के अलावा दूसरी बड़ी घटना में 20 नवम्बर, 2004 को नौगढ़ (चन्दौली) में पी.ए.सी. के ट्रक को बारूदी सुरंग से उड़ाकर 15 जवानों को मार डाला था।
इन दो बड़ी घटनाओं के बाद हालांकि कोई बड़ी घटना नहीं हुई है लेकिन न तो नक्सलियों का प्रभाव कम हुआ और न उनका आतंक। वर्ष 2010 में नक्सलियों का प्रभाव पूर्वी उ.प्र. के बलिया, गोरखपुर, चित्रकूट, बांदा से होता हुआ इलाहाबाद और कानपुर तक पहुंच गया है। इस तथ्य की पुष्टि पुलिस द्वारा फरवरी में पकड़े कुछ नक्सली नेताओं और उनके समर्थकों से मिले अभिलेखों से हुई है। सरकारी आकड़ों में "रेड जोन" के जिले चन्दौली, मिर्जापुर तथा सोनभद्र के 26 खानों के 607 गांव इन नक्सलियों के प्रभाव में है तो "यलो जोन" के गाजीपुर बलिया, मऊ, देवरिया तथा कुशीनगर में 112 गांव आंशिक रूप से प्रभावित माने जा रहे हैं।
दरअसल नक्सलियों ने अपनी ताकत बढ़ाने के लिए जो रणनीति बनायी है पुलिस उसको तोड़ नहीं पा रही है। नक्सली गरीब तथा बेरोजगार युवकों को एक बड़ी राशि देने का आश्वासन देकर गिरोह में शामिल करते हैं फिर उन्हें 6 माह का प्रशिक्षण, फिर उनकी क्षमता परख कर जिम्मेदारी देते हैं। लेकिन गिरोह में आने के बाद पैसा कम ही लोगों को मिलता है, उनकी आवश्यकताएं जरूर पूरी की जाती हैं। इसी से जुड़ा प्रश्न है कि आखिर यह धन कहां से आ रहा है? तो नक्सलियों ने इसके लिए विधिवत् धन वसूली का अभियान चल रखा है जिसको उन लोगों ने "लेबी" नाम दिया है। इस क्षेत्र के बालू, पत्थर, कोयला के कारोबारियों, ठेकेदारों तथा बड़े-बड़े पूंजीपतियों से नक्सली रकम वसूल रहे हैं। "लेबी" देने वाले इसकी चर्चा किसी से नहीं करते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि "लेबी" न देने का मतलब है मौत या कारोबार चौपट।
नक्सलियों के पास विस्फोटक तो खदान क्षेत्र से सहज उपलब्ध हैं। पूरे क्षेत्र में अमोनियम नाइट्रेट खुलेआम बिक रहा है जबकि हथियार नेपाल से बिहार और फिर इन क्षेत्रों में पहुंच रहे हैं। नक्सलियों की मजबूत आर्थिक स्थिति तथा उपलब्ध हथियारों ने उसे पुलिस पर भारी बना दिया है। पिछले डेढ़-दो वर्षों में पुलिस के चार मुखबिर, तीन नक्सली, जो आन्दोलन से अलग होकर अन्य कार्य कर रहे थे तथा डेढ़ दर्जन सामान्य लोग मारे जा चुके हैं। द
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