वह सर्वमान्य है कि देश एक भौगोलिक शब्द, राज्य एक राजनीतिक संरचना का बोधक तथा राष्ट्र एक भावात्मक अभिव्यक्ति है। प्राचीन काल में भारत एक विस्तृत देश, विभिन्न प्रकार के राज्यों का समूह तथा एक सबल तथा संगठित राष्ट्र रहा है। भौगोलिक दृष्टि से इसकी सीमाएं उत्तर में हिमालय तथा कृष्णागिरि (वर्तमान काराकोरम), पश्चिम तथा दक्षिण में हिन्दू महासागर (वर्तमान हिन्द महासागर) रही हैं। समय-समय पर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जनपदों, राज्यों, साƒााज्यों, गणतंत्रों का उत्थान तथा पतन हुआ। इन सब प्रकार के राज्यों को जोड़ने वाली कड़ी राष्ट्र रहा। राष्ट्र की अवधारणा मुख्यत: समान जन, समान भाषा, समान परम्परा, धर्म, दर्शन, भूमि तथा संस्कृति से की जाती है। समान परम्परा तथा समान आकांक्षा को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। अत: भारत को मातृभूमि तथा भारतीयजनों को इसके पुत्र तथा भूमि के प्रति एकात्मक सम्बंधों को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। धर्म को राष्ट्र की आत्मा माना है। संस्कृत को राष्ट्रवाणी कहा गया है। ये सभी भारत को एक गौरवशाली राष्ट्र बनाने वाले तत्व रहे हैं। भारतीय इतिहासकार डा. ईश्वर शरण विश्वकर्मा ने भारत के राष्ट्रीय इतिहास को वस्तुत: भारत तथा भारती की पुरुषार्थ यात्रा का इतिहास कहा है।
भ्रामक शब्दावली
अंग्रेज, यूरोप के एक छोटे से देश से व्यापारी के रूप में भारत आए। उन्होंने भारत के कुछ भू-भाग पर ईस्ट इंडिया कम्पनी के द्वारा राज्य स्थापित किया। अपनी राजनीतिक सत्ता बनाए रखने के लिए अनर्गल तथा भ्रामक शब्दावली का प्रयोग किया। भारत जैसे विशाल देश एवं राष्ट्र को देखकर कभी उपमहाद्वीप तो कभी महाद्वीप कहा। इसे अनेक राष्ट्रों का समूह कहा। उदाहरण के लिए माउन्ट स्टुअर्ट ऐलीफिन्सटन ने इसे एक उपमहाद्वीप तथा दस राष्ट्रों का समूह कहा। जान मेलकाम ने इसे एक महाद्वीप कहा तथा इसमें राजपूत, मरहठे तथा सिख अलग-अलग राष्ट्र बतलाए। प्रसिद्ध ब्रिाटिश सुधारक जान ब्रााइट ने ब्रिाटिश संसद में भारत में बीस राष्ट्रों तथा बीस भाषाओं की बात कही।
कम्पनी राज की समाप्ति तथा भारत में सीधे ब्रिाटिश राज स्थापित हो जाने पर ब्रिाटिश लेखकों तथा कूटनीतिज्ञों ने भारत राष्ट्र के बारे में पुन: अपनी शब्दावली को पलटा। प्रशासकीय तथा राजनीतिक महत्वाकाक्षाओं तथा भारतीयों में हीन भावना तथा राष्ट्रीय आत्मविस्मृति हेतु राष्ट्रीयता की एक नवीन अवधारणा गढ़ डाली। उन्होंने प्रचार करना प्रारम्भ किया कि भारत में न कभी राष्ट्रवाद का विचार था और न कभी राष्ट्रीय भावना थी। अत: उन्होंने भ्रम फैलाया कि भारत कभी राष्ट्र ही नहीं था। डब्ल्यू डब्ल्यू हण्टर को इस भ्रामक धारणा का जनक कहा जाता है। उसने इस विवादास्पद अवधारणा को जन्म दिया कि भारत एक राष्ट्र नहीं है बल्कि अंग्रेजों की सहायता से एक राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में है। उसने इस मनगढ़ंत सिद्धांत में प्राचीन भारत का काल्पनिक चित्र भी प्रस्तुत किया। उसने भारतभूमि को मानव-विहीन बताया। यूरोप में प्रचलित प्रीमीटिव काल की भांति प्राचीन भारत को अशांति तथा अंधकार का काल बताया। उसने भारत में राष्ट्र के अस्तित्व को अस्वीकार किया।
अंग्रेजी मानसिकता
सर जान स्ट्रेर्ची ने 1884 में कैम्ब्रिाज विश्वविद्यालय के छात्रों के सम्मुख उसने अपना भाषण इस वाक्य से शुरू किया- भारत क्या है, इस भारत नाम के राष्ट्र का वास्तविक नाम क्या है?..... ऐसा कोई देश नहीं है। यह बहुत महत्वपूर्ण तथा बहुत आवश्यक तथ्य है जो भारत के बारे में आना चाहिए।" इसी भांति 1909 में ब्रिाटिश संसद के दोनों सदनों में एक स्मृतिपत्र प्रस्तुत किया गया जिसमें कहा गया कि "भारत एक अकेला देश नहीं है बल्कि देशों का एक समूह है।"
यह विचारणीय है कि ए.ओ. ह्रूम जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक थे, भारत देश तथा राष्ट्र के सन्दर्भ में उपरोक्त भ्रमपूर्ण किन्तु उद्देश्यपूर्ण चिंतन के समर्थक थे। उनकी प्रेरणा से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अनेक नेताओं ने "भारत एक राष्ट्र बन रहा है"- इस भ्रामक धारणा को स्वीकार किया। हेनरी काटन, जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे, ने राष्ट्र की इस यूरोपीय कल्पना को स्वीकार किया। उन्होंने अपनी पुस्तक (न्यू इंडियन इन ट्रांजिशन पृ. 53) में यह माना कि भारत में एक नए राष्ट्र का उदय हो रहा है। कांग्रेस के एक अन्य भारतीय अध्यक्ष श्री ए.सी. मजूमदार ने अपनी पुस्तक "इंडियन नेशनल इव्यूलुसन" में यह बात लिखी। सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने तो अपनी आत्मकथा का नाम ही "ए नेशन इन मेकिंग" रखा। कालान्तर में पं. नेहरू ने भी अपनी पुस्तक "द डिस्कवरी ऑफ इंडिया" लिखी।
पाकिस्तानी इतिहासकार सैयद सैफुद्दीन पीरजादा का कथन है कि सर सैयद अहमद खां पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अपने काल में भारत को एक महाद्वीप कहा (देखें फाउन्डेशन आफ पाकिस्तान पृ. 18)। उन्होंने 1888 के मेरठ में अपने भाषण में भारत में दो राष्ट्रों की बात कही तथा कांग्रेस को हिन्दुओं की संस्था कहना शुरू किया। खिलाफत आन्दोलन ने मुसलमानों में देश के बाहर की निष्ठा को प्रोत्साहन दिया। वस्तुत: यह आन्दोलन दुनिया का सबसे बड़ा साम्प्रदायिक जुनून था। 1927 में लीग के एक धड़े ने दो राष्ट्र की बात दोहराई, जिसका जिन्ना ने समर्थन किया। मोहम्मद इकबाल तथा कैम्ब्रिाज विश्वविद्यालय के चार छात्रों-चौधरी रहमत अली, मोहम्मद असमद खां, शेख मोहम्मद सादिक व इनायत उल्ला खां ने इसे व्यावहारिक रूप दिया तथा 1940 में पहली बार पाकिस्तान की मांग रखी। जिन्ना ने कहा कि पाकिस्तान का निर्माण तो तभी हो गया था जब पहले मुस्लिम ने भारत की धरती पर पांव रखा था। सामान्यत: मुसलमानों ने राष्ट्रवाद को अस्वीकार किया तथा इसे कुरान के विपरीत बतलाया। अन्ततोगत्वा भारत का विभाजन हो गया। अंग्रेजों का यह कथन कि भारत एक राष्ट्र बन रहा है, पुन: धोखा मात्र सिद्ध हुआ। कांग्रेस ने द्विराष्ट्रवाद के सिद्धान्त को स्वीकृति दी। 1971 में पुन: बंगलादेश के रूप में एक और "राष्ट्र" का जन्म हुआ।
"भारत" से चिढ़
भारत में स्वतंत्रता के पश्चात अंग्रेजों ने पुन: अपनी शब्दावली बदली तथा पुराना राग अलापना शुरू किया कि भारत एक उपमहाद्वीप है। अब इस शब्द से चिढ़ नए निर्मित, मजहब के आधार पर बने पाकिस्तान तथा चीन को हुई। विशेषकर पाकिस्तान का भारत महाद्वीप या भारत उपमहाद्वीप के साथ "भारत" शब्द उसे परेशान करने लगा। अत: पाकिस्तानी क्षेत्रों में उन्हें भारत के विरुद्ध प्रचार का एक साधन मिल गया। कुछ ने इसे पाकिस्तान उपमहाद्वीप, कुछ ने इण्डो-पाक उपमहाद्वीप तथा कुछ ने साउथ एशिया उपमहाद्वीप कहना शुरू किया। प्रसिद्ध पत्रकार पुष्प रंजन के शब्दों में "इस शब्द के बहाने पाकिस्तान राजनीतिक रूप में अति संवेदनशील होता गया। उनके सरकारी प्रस्तावों को देखने पर लगता है कि इस शब्द को उन्होंने अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय अस्मिता से जोड़ रखा है।" पाकिस्तान का विदेश विभाग इसे साउथ एशिया उपमहाद्वीप या केवल उपमहाद्वीप कहकर राजी हैं। पाकिस्तानी इतिहासकार इसे भारत-उपमहाद्वीप कहकर राजी नहीं हैं। पाकिस्तानी इतिहासकारों प्रो. अहमद हसन दानी, प्रो. खुर्शीद कमाल अजीज व प्रो. असलम सैयद आदि को उपमहाद्वीप के साथ "भारत" शब्द लगा होने से बैचेनी रही है। पाकिस्तान की भांति चीन भी अपनी विस्तारवादी नीति के कारण इस शब्द से नाखुश है।
उपरोक्त संक्षिप्त विवेचन से तीन बातें स्पष्ट रूप से उभरकर आती हैं। प्रथम, भारत अतीतकाल से एक प्रकृति प्रदत्त तथा भौगोलिक सीमाओं से आवद्ध सदैव एक विशाल देश रहा। दूसरे, भारत कभी भी राष्ट्रों का समूह नहीं रहा। यद्यपि समय-समय पर भारत में आन्तरिक राजनीतिक उथल-पुथल होती रही, परन्तु सभी ने इसे एक राष्ट्र माना। भारत ने राज्यों का राष्ट्र सिद्धांत को माना, न कि पाश्चात्य राष्ट्रों के राज्य को। तीसरे, भारत राष्ट्र ने कभी इसे भारत महाद्वीप या भारत उपमहाद्वीप या दक्षिण-एशिया महाद्वीप कहने की होड़ में भाग नहीं लिया। परन्तु अपने सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक सन्देश देकर विश्व का नेतृत्व किया। उसने "विश्व बन्धुत्व", "वसुधैव कुटुम्बकम" आदि उदात्त भावनाओं से विश्व को प्रेरित किया।द
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