कवित्वमय नरेन्द्र मोदी - शिवओम अम्बर


मुम्बई से प्रकाशित होने वाली हिन्दी की एक साहित्यिक त्रैमासिक "युगीन काव्या" के एक अंक को पढ़कर गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के कवित्वमय चित्त की उज्ज्वल झलक मिली। समकालीन साहित्यिक पत्रिकाओं के मध्य एक विशिष्ट स्थान रखने वाली इस त्रैमासिकी के सम्पादक श्री हस्तीमल हस्ती गजल विधा के सुवन्दित हस्ताक्षर हैं। उनके व्यक्तित्व की परिचायक कुछ पंक्तियां द्रष्टव्य हैं-

चिराग हो कि न हो दिल जला के रखते हैं, हम आंधियों में भी तेवर बला के रखते हैं। हमें पसन्द नहीं जंग में भी चालाकी, जिसे निशाने पे रखते हैं बताके रखते हैं।

ऐसे तेवर के कवि और एक बहुमान्य पत्रिका के सम्पादक श्री हस्तीमल अपने सम्पादकीय में बड़े ही भावोच्छल ढंग से श्री नरेन्द्र मोदी का उल्लेख करते हैं। प्रख्यात सन्त मोरारी बापू और श्री नरेन्द्र मोदी मुम्बई में हुए एक विशेष काव्य समारोह में आए थे। बापू ने अपने प्रवचन में भी श्रेष्ठ कविता पंक्तियों को उद्धृत करने की परम्परा डाल रखी है। इस आयोजन में भी उन्होंने अपने उद्बोधन में जीवन और प्रकृति से कविता के अनन्य सम्बंध को रेखांकित करते हुए कहा कि आकाश में सविता (सूर्य) है, धरती पर सरिता (नदी) है और इन दोनों के बीच पुल का काम करती है कविता।

हस्ती जो मोदी जी के विषय में लिखते हैं-

श्री नरेन्द्र मोदी का वक्तव्य भी काव्य-रस से पगा हुआ था। कथा एवं कविता गुजराती संस्कृति के प्राण हैं। "कविता कवि को जन्म देती है"-इस कथन की उनकी व्याख्या अद्भुत थी। यहां बता दें कि श्री नरेन्द्र मोदी राजनेता बाद में, पहले कवि हैं। उनके दो काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।

"युगीन काव्या" के इसी अंक (जुलाई-सितम्बर, 2009) में उन्होंने गुजराती पत्रिका "कविता" में प्रकाशित श्री नरेद्र मोदी की कविता "तस्वीरों के पार" का डा. हूबनाथ के द्वारा हिन्दी में अनूदित रूप भी प्रकाशित किया है। "पाञ्चजन्य" के सुधी पाठकों के समक्ष "युगीन काव्या" से लेकर यह रचना अविकल रूप में उद्धृत है-

मैं अपनी तस्वीरों में हूं भी और नहीं भी मैं अपने पोस्टर में हूं भी और नहीं भी इसमें न कोई विरोध न ही विरोधाभास तस्वीर आत्मा जैसी नहीं है वह तो पानी में भीगती है आग में जलती है वह भीगे या जले मुझे कुछ नहीं होता आप मुझे मेरी तस्वीर में या पोस्टर में खोजने का मिथ्या प्रयत्न न करें मैं तो निÏश्चत बैठा हूं अपने आत्मविश्वास में- अपनी वाणी, व्यवहार और कर्म में आप मुझे मेरे कर्मों से जानें कर्म ही मेरा जीवन-काव्य है लयताल है घर में गीतासार आंगन में कर्मधार आप सभी के लिए अकारण आद्र्र कोमल प्यार है आप मुझे तस्वीर में नहीं पसीने की खुशबू में खोजें योजनाओं के अम्बार की थकावट में मेरी आवाज की गूंज में पहचानें मेरी आंखों में आप ही की छवि है।

प्रस्तुत रचना कवि के अन्तर्जगत से परिचित कराते हुए हमें उसकी जीवन दृष्टि का भी बोध कराती है और हम स्वयं को एक ऐसे शब्द-साधक के साथ संवाद करते हुए पाते हैं जिसने सार्थकता के मंत्र के रूप में कर्म की अविरलता और निष्काम प्रीति की तरलता को वरेण्य माना है। श्री नरेन्द्र मोदी का यह कवि रूप हिन्दी के पाठकों के लिए अभी अपरिचित-सा है, अत: आवश्यकता है कि उनकी मराठी में प्रकाशित काव्यकृतियां हिन्दी में भी अनूदित हों और एक विराट साहित्य संसार की संवेदना का अंश बनें।

"युगीन काव्या" में श्री नरेन्द्र मोदी की कविता के प्रकाशन के उपरान्त पाठकीय पत्रों के रूप में प्रतिक्रियाओं का ज्वार सा आया। कुछ उनके इस रूप का दर्शन कर विस्मित भी थे और हर्षित भी, तो कुछ अपने पूर्वाग्रहों के कारण उनको देखना-सुनना ही अपराध मान रहे थे और उनकी सकारात्मक तथा सौहाद्र्रपूर्ण चर्चा के कारण पत्रिका पर ही प्रश्नचिह्न लगाने को तत्पर हो उठे थे!

हमारे देश में साहित्य भावकों का एक ऐसा वर्ग भी है जिसने अपनी मान्यताओं के चश्मे उतारकर सत्य का सहज साक्षात्कार करने से स्वयं को बचा रखा है। भारत विभाजन के मंत्र-प्रदाता इकबाल का गीत "सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा" तो उसके लिए कौमी तराने की हैसियत रखता है किन्तु सनातन सांस्कृतिक प्रतीक- सम्पदा से समृद्ध "वन्दे मातरम्" गीत में उसे साम्प्रदायिकता के दर्शन होते हैं और वह उसका निषेध करने को प्रतिबद्ध रहता है! मेरे जैसे लोग स्वयं को बड़ी विचित्र स्थिति में पाते हैं जिन्हें अटल जी की कविताएं भी भाती हैं और विश्वनाथ प्रताप सिंह की नई कविताएं भी लुभाती हैं!.... कविता कविता है, उसकी श्रेष्ठता सम्मानित होनी चाहिए। श्री नरेन्द्र मोदी का कवित्वमय अन्त:व्यक्तित्व हर सह्मदय के लिए वन्दनीय है, अभिनन्दनीय है।

सन्निपातग्रस्त सनसनी मानस-रोगों का वर्णन करते हुए गोस्वामी जी ने श्रीरामचरितमानस में आयुर्वेद की शब्दावली का प्रयोग करते हुए बताया है कि काम वात विकार है, क्रोध पित्त है और लोभ को कफ कहा जा सकता है। ये तीनों जब एक साथ प्रकुपित हो जाते हैं तथा व्यक्ति सन्निपात से ग्रस्त हो जाता है और उसका रोग से उबर पाना बहुत कठिन हो जाता है-

काम वात कफ लोभ अपारा, क्रोध पित्त नित छाती जारा। प्रीति करहिं जो तीनिहु भाई, उपजहुं सन्निपात दुखदाई।

पिछले दिनों हमने भारतीय टेनिस की सनसनी कही जाने वाली एक युवती को सन्निपातग्रस्त होते देखा है। काम से वशीभूत उसका व्यक्तित्व नितान्त संवेदनहीन होकर एक दूसरी युवती के साथ किए गए "अय्याश" क्रिकेटर के व्यवहार को नजरअन्दाज करके उसका पृष्ठपोषक बनकर खड़ा हो गया था। अपने ही नगर की दूसरी युवती के प्रति उसकी वाणी में क्रोध की झलक थी तो शत्रु देश के एक नागरिक की अंकशायिनी बनने का लोभ उसकी चंचल आंखों में पुन: पुन: चमक रहा था और वात-पित्त-कफ से एक साथ ग्रस्त वह विभ्रमित युवती जान-बूझकर कुछ खुले हुए तथ्य नहीं देख रही थी (जिन्हें अन्तत: उसके उच्छृंखल प्रेमी को स्वीकार करना पड़ा और जिसे वह अपनी आया अर्थात् बड़ी बहन बता रहा था, उसी को तलाक देना पड़ा।) और मुझे बार-बार गोस्वामी जी याद आ रहे थे-

मोह न अन्ध कीन्ह केहि केही, को जग काम नचाव न जेही। द

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