अक्सर नारी स्वतंत्रता पर देखने, पढ़ने और सुनने को मिलता रहता है। आखिर नारी स्वतंत्रता का अर्थ क्या है? क्या अपने दायित्वों से भागना और फैशन के नाम पर नग्नता ही स्वतंत्रता कहलाती है? नारी स्वतंत्रता के नाम पर सिर्फ उच्छृंखलता ही देखने को मिल रही है। इस तथाकथित स्वतंत्रता को पाने के लिए नारी न जाने क्या-क्या कीमत चुका रही है। नारी अपनी लज्जाशीलता और मर्यादा तक को दांव पर लगा रही है।
मेरे विचार से नारी स्वतंत्रता का अर्थ है "निर्णय लेने की स्वतंत्रता"। महिलाएं अपने बारे में, परिवार के बारे में, व्यवसाय के बारे में निर्णय लेने में स्वतंत्र हों, क्योंकि आजाद वही है जो आर्थिक तौर पर, भावनात्मक तौर पर और मानसिक तौर पर आजाद हो। भारत में तो प्राचीन काल से नारी को पद सम्मान प्राप्त है। अब तक के इतिहास पर नजर डालें तो महिलाओं की उपलब्ध्यिं से आसमान रोशन है। उनकी क्षमताओं पर शक करने की गलती शायद ही कोई कर सके। उदाहरण स्वरूप भक्ति आन्दोलन के दौरान अनेक ऐसी अनूठी महिलाएं उभरीं, जिन्होंने बहुत स्वतंत्र जीवन जिया ही नहीं, बल्कि पूरे सांस्कृतिक-आध्यात्मिक मूल्यों को एक नई क्रांतिकारी दिशा भी दी, मीराबाई तो उसकी जाज्वल्यमान प्रतीक हैं। आजादी के आन्दोलन में भी कमला देवी, दुर्गा भाभी, सरोजिनी नायडू, उन सैकड़ों- हजारों नारियों में से चन्द नाम हैं जो आजादी की लड़ाई में कूद पड़ी थीं। ये महिलाएं सचमुच आजाद नजर आती हैं।
मगर इक्कीसवीं सदी के आते-आते बढ़ते पश्चिमी प्रभाव के कारण महिलाओं ने अपनी आजादी के जश्न को "नग्नता" में बदल दिया। प्राचीन रूढ़ियों को तोड़ने की उधेड़बुन में आधुनिक नारी यह भूल गई कि परम्परा और रूढ़ि में अन्तर है। रूढ़ियां तोड़ी जा सकती हैं, पर परम्पराएं बदलीं जाती हैं।
ऊंची उड़ान भरने की आकांक्षा और आजादी की चाह ने नारी को बाजार की गिरफ्त में ला दिया है। बाजार महिलाओं की इच्छाओं और उड़ानों की कद्र नहीं करता, वह उनकी आजादी के नाम पर अपनी जरूरतें थोपता है। नया अवसर तलाशने और कुछ नया सोचने के बजाए, जो कुछ है उसे बेचने और भोगने को न सिर्फ उकसाता है, बल्कि बाध्य भी करता है। जो कुछ महिला की अस्मिता के विरुद्ध है बाजार उसे नए अवसर के रूप में प्रस्तुत करता है और महिमामंडित करता है जैसे फैशन शो आदि। यह स्त्री की आजादी का परचम नहीं है, बल्कि उसे गुलाम बनाने का नया उपक्रम है। जो उपक्रम स्त्री की देह पर आकर खत्म होता हो वह उसकी आजादी का मंत्र कैसे हो सकता है? अफसोस इस बात का है कि बाजार के इस प्रपंच को स्त्री समझ नहीं रही है और उसमें उलझती जा रही है।
स्त्री का हमेशा से संघर्ष रहा है कि उसे सिर्फ "देह" न समझा जाए। पर बाजार आज फिर से उसे उसी स्थिति में ले आया है जहां वह मात्र एक "शरीर" है। फैशन के नाम पर जो "नग्नता" परोसी जा रही है वह नारी के प्रति उपजे सौन्दर्यबोध को नष्ट करता है। नग्नता कभी सौन्दर्य का मापदंड नहीं बन सकती और न ही नारी का सौन्दर्य देह तक सीमित माना जाना चाहिए।
स्वयं को आजाद मानने वाली नारी बीच बाजार में खड़ी हुई अपने हाथ पैर, नैन नक्श दिखा कर सुन्दर होने का गुमान कर रही है, नौकरी बचाने, धन कमाने के लिए नाप तौल कर मुस्करा रही है, अपने महिलापन पर गर्व कर रही है। यह एक छलावे के अतिरिक्त और कुछ नहीं है, जिसे बाजार ने अपने आर्थिक लाभ के लिए स्त्री पर थोप दिया है।
आजादी वैचारिक हो। स्त्री का व्यक्तित्व सत्यम शिवम् सुन्दरम. की अवधारणा पर आधारित है। यदि स्त्री इन तत्वों को ही स्वयं से पृथक करना शुरू कर देती है तो वह अपने वास्तविक स्वरूप को खो देती है। सृष्टि की सृजनकर्ता यदि अपनी विजय पताका लहराना चाहे तो उसे कोई नहीं रोक सकता। उसकी अपनी एक पहचान हो। ऐसी पहचान जिस पर वह गर्व कर सके। नारी का मकसद सिर्फ आसमान में सुराख करना ही नहीं है। कोई पढ़ सके आपसे ज्ञान पाकर, कोई जीत जाए आपसे उत्साह पाकर, कोई खड़ा हो जाए आपसे सहारा पाकर तो क्या ये कम उपलब्धि है, कम संतुष्टि है।
स्त्री आधुनिक परिवेश में प्रयोगधर्मी और गतिशील बने, पर अपना माधुर्य, अपनी सरसता, अपनी संवेदनशीलता भी बनाए रखे। सबसे बड़ी बात यह है कि उसका स्त्रीत्व न खो जाए। वह आधुनिक होते हुए भी वैचारिक रास्ता चुने। स्त्री जीवन बहुत महत्वपूर्ण है। झूठी चमक दमक में उसे न गंवाएं। द
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