उत्सव अन्न है धान - मृदुला सिन्हा


मिथिलांचल में एक व्यवहार प्रचलित था कि जिस इलाके में धान की फसल नहीं होती, वहां बेटी नहीं ब्याहनी चाहिए। यदि किसी ने वैसे इलाके में बेटी ब्याह दी, कहा जाता था-"बेटी को कहां फेंक आए"। अर्थात जीवन जीने के लिए धान आवश्यक है।

उसी इलाके में कहावत थी -"धान के पान, मोरो पिया खइहें पान।" अर्थात यदि धान का ही पान है तो, मेरे पिया भी खाएंगे पान। यानी धान कोई महंगी वस्तु नहीं। दुर्लभ भी नहीं। कहावत भी उस समय बनी होगी जब किसान के घरों में पैसा नहीं होता था। कहावत में धान को गरीब का साथी बताया गया है। धान से ही पान मिलेगा तो, मेरा पिया भी पान खाएगा।

वेद में तो सभी अन्नों को धान कहा गया है। परंतु धान मात्र अन्न नहीं है। धान (चावल) की जरूरत तो सभी पूजा-पाठ, शादी-विवाह और जप-तप में होती है। धान से चावल निकलता है। जिसे हम भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं। परंतु पूजा-पाठ में वही चावल अक्षत् हो जाता है। उसमें टूटा चावल नहीं चलता। राज्याभिषेक और विभिन्न अवसरों पर अभिषेक करते हुए अक्षत् ही छींटकर आशीष दिया जाता है। उस अक्षत् में दूब भी मिला ली जाती है। इसलिए दुर्वाक्षत कहते हैं। विवाह के उपरांत बेटी विदा करते समय भी उसके आंचल में धान, हल्दी और दूब डाली जाती है।

धान रोपने में कई क्षेत्रों में महिलाएं ही दक्ष होती हैं। जिस दिन धान की रोपाई प्रारंभ होती है वह दिन उस घर में उत्सव का दिन होता है। कई गांवों में तो धान की रोपाई में अद्भुत समाजिकता दिखती थी। एक दिन एक किसान के खेत में रोपाई करते पूरा गांव लग जाता था। तो दूसरे दिन दूसरे किसान के खेत रोपे जाते थे। कटाई के समय भी यही व्यवस्था चलती थी। धान की फसल किसान के लिए आशा का संबल बनकर आती है। धान की अच्छी फसल होने पर कितनी सारी पारिवारिक समस्याएं सुलझ जाती हैं। व्रत-त्योहार, शादी-विवाह, अन्य संस्कार उत्सव सब धान की फसल पर निर्भर करते हैं। धान रोपने के बाद किसान आसमान में टकटकी लगाए रहता है। बादल को समय-समय पर बरसना चाहिए। पानी की भरपूर सिंचाई चाहिए। तभी धान की अच्छी फसल होती है।

धान की कटाई तो बहुत बड़ा उत्सव है। देश के सभी उन इलाकों में जहां धान की फसल अच्छी होती है, उत्सव मनाया जाता है। स्त्री-पुरुष का मन मगन रहता है -

"सब दु:ख भागल कि आइल अगहनमा, धनमा के लागल कटनिया भर लो कोठारी, देहरियो, भरल बा, भरल बाटे बाबा बखरिया अबकी बखारी में भरी-भरी धनमा, छूटी जइहें बंधक गहनमा"।

धान की पैदावार अच्छी हुई हो, फिर तो घर में सब मगन होंगे। बच्चे, बूढ़े और जवान। धान से पेट तो भरता ही है। धान से कपड़ा और मकान की भी व्यवस्था हो जाती है। अर्थात रोटी, कपड़ा और मकान की व्यवस्था धान से संभव है। धन शब्द से ही निकला है धान, धान से ही दाना निकलता है। जिसके अधिक अन्न हुआ उसके यहां ही धन हुआ। किसी संपन्न व्यक्ति के लिए धन-धान्य से परिपूर्ण कहा जाता है। अर्थात धान (अन्न) से जितनी वस्तुएं बनाई जाती हैं, धान्य उनके पास है।

भारत ही नहीं, संसार की भी अधिक आबादी चावल और चावल से बनी सामग्रियां खाने वाले ही हैं। हिंदू विवाह पद्धति का एक रस्म लाजा होम है। अर्थात खील (धान का लावा) अग्नि में डाली जाती है। विवाह निश्चित होने पर लड़का और लड़की वालों के घर से सवा-सवा सेर धान लाकर दोनों को मिला दिया जाता है। उस धान को लाल ही होना चाहिए। बिहार में इसे धनबट्टी कहते हैं। धनबट्टी हो जाने पर विवाह संबंध को निश्चित हुआ माना जाता है। दोनों परिवारों में एक-एक सुहागन उस धान को भूंजती है। उसे "लावाभूंजी" कहा जाता है। उसी लावा से "लाजा होम" होता है।

ये सारे उत्सव धान से संबंधित है। मानव जीवन को धन्य करने वाला है धान। सारे देश में धान की कटाई के बाद ही मकर संक्रांति मनाई जाती है। पंजाब में लोहड़ी, असम में भोगाली बीहू, केरल में पोंगल मानाया जाता है। पोंगल का हिंदी शब्दांतर है खिचड़ी। लाखों चूल्हों पर खिचड़ी पकती है।

स्त्री जीवन की किसी विचारक ने धान की पौघ से तुलना की है। एक खेत में बीज डाला जाता है। वहीं पौध निकलती है। उसके थोड़ा बड़ा होने पर उसे उखाड़ कर एक निश्चित दूरी पर दूसरे खेत में रोपते हैं, ऐसा ही तो जीवन है स्त्री का। दूसरे खेत में ही जाकर फूलती-फलती है धान की फसल। ससुराल जाकर ही फैलती और फलती है स्त्री जीवन की बेल।

मिट्टी को अपने अंदर समा लेता है धान। हमारे शुभ और पवित्र कार्यों में साथ-साथ रहता है धान। मेरी मान्यता है कि सीता जब धरती में समा गर्इं, वे धान की फसल बनकर ऊपर आ गर्इं, एक से असंख्य होकर। तबसे लेकर आज तक देश-विदेश की धरती पर धान की फसल उगती है। फिर बीज बनता है धान। बीज और फसल में सीता का अंश है। इसलिए सीता अक्षय है, धान भी अक्षय है।

सीता अष्टमी इन्हीं दिनों मनाई जाती है। सीता और धान के धरती से उपजने और फिर-फिर बीज बनने की कथा हमारे समाजिक जीवन की कथा है, धरोहर है। हमारी संस्कृति की सीता भी सूत्रधार है और धान भी। इसलिए धान मात्र अन्न नहीं, उत्सव सूत्र है। धान से हम और हमसे धान है।द

NEWS