देखो भई कुल्लू का दशहरा - नरेन्द्र कुमार


हिमाचल प्रदेश में कुल्लू का दशहरा, चम्बा की मिंजर, मण्डी की शिवरात्रि, रामपुर का लवी मेला व सुजानपुर का होली मेला प्रसिद्ध है। यहां ऐसे कुछ मेलों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है।

कुल्लू का दशहरा

कुल्लू का दशहरा अपने आप में निराला उत्सव है। देश भर में मनाया जाने वाला दशहरा पर्व जहां आसुरी शक्तियों पर दैवी शक्तियों की विजय के प्रतीक स्वरूप मनाया जाता है, वहीं कुल्लू दशहरे की पृष्ठभूमि बिल्कुल भिन्न है। कुल्लू में तो दशहरा एक लोकोत्सव है, स्थानीय देवी-देवताओं का महासंगम है। इस लोकोत्सव का दशहरे के साथ मात्र इतना संयोग है कि यहां का दशहरा भी देश के अन्य भागों में मनाए जाने वाले दशहरे के दिन शुरू होता है। यहां का दशहरा इतिहास व "मिथक" का एक ऐसा सुन्दर समन्वय है जिसे हर रुचि, रीति, प्रकृति और व्यवहार के लोग बड़े शौक से मनाते हैं।

कुल्लू के दशहरा उत्सव की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि श्री रामचंद्र जी के अयोध्या से कुल्लू आने पर आधारित है। कुल्लू में दशहरे का शुभारंभ 17वीं शताब्दी में हुआ। श्री रामचन्द्र तथा सीता जी की मूर्तियां, जिनके बारे में कहा जाता है कि इन्हें श्री रामचन्द्र जी ने अश्वमेध यज्ञ के लिए बनवाया था, राजा जगत सिंह के रोग निवारण के लिए अयोध्या से कुल्लू लाई गर्इं। वर्ष 1651 में मकड़ाहर, उसके बाद 1653 में मणिकर्ण मंदिर में मूर्तियां रखने के बाद 1660 में कुल्लू के रघुनाथ मंदिर में विधि विधान से मूर्तियों को स्थापित किया गया। इसके बाद राजा इन्हें राजपाट सौंप कर स्वयं प्रतिनिधि सेवक के रूप में कार्य करने लगा तथा राजा रोग मुक्त हो गया। रघुनाथ जी के सम्मान में ही राजा जगत सिंह द्वारा वर्ष 1660 में दशहरे की परम्परा आरंभ हुई। कुल्लू क्षेत्र में 365 देवी-देवता हैं। मान्यता है कि ये देवी-देवता भी रघुनाथ जी को अपना इष्ट मानते हैं। इस कारण कुल्लू दशहरा में इन देवी-देवताओं की भी झांकी निकाली जाती है। दशहरा उत्सव ढालपुर मैदान में मनाया जाता है। जिस दिन भारत भर में आश्विन शुक्ल पक्ष दशमी तिथि को दशहरा का समापन होता है उस दिन कुल्लू का दशहरा आरंभ होता है।

पहले पूर्णिमा के दिन लंका दहन होता था, लेकिन अब यह सात दिन तक मनाया जाता है। भारतवर्ष के अन्य भागों में जहां विजयादशमी के दिन रावण, कुंभकरण, मेघनाथ आदि के पुतले जलाकर यह त्योहार सम्पन्न किया जाता है, वहीं कुल्लू में यह पर्व रामचंद्र जी की विजय-यात्रा से प्रारंभ होता है। दशहरे के लिए राजा देवी हिडिंबा(मनाली) को विशेष निमंत्रण भेजता है। पहले इस दिन आदि ब्राह्मा, नारद, दुर्वासा, बिजली महादेव, वीरनाथ (गौहरी) आदि देवता रघुनाथ मंदिर में आते थे, लेकिन अब केवल गौहरी देवता ही प्रथम नवरात्र को मंदिर में आते हैं। विजयादशमी के दिन प्रात: काल से ही देवी-देवताओं के रथ रंग-बिरंगे परिधानों से सुसज्जित होकर रघुनाथ मंदिर पहुंचते हैं और लोग रघुनाथ जी की वंदना करते हैं। राजमहल में जाकर "ठारह करडू" की परौल (डयोढी) की वंदना करते हैं। पहले इस त्योहार में 365 देवता रथ यात्रा में सम्मिलित होते थे। इस दिन प्रात:काल देवी हिडिंबा के रथ (पालकी) को लेकर लोग रामशिला पहुंच जाते हैं। पहले देवी हिडिंबा के रथ को रघुनाथ मंदिर में लाते हैं। राजपुरोहित राजा से ध्वजा पंखे, अन्य निशान तथा अस्त्र-शस्त्रों की पूजा करवाता है, फिर दुंदभी (नोपत) और अश्व की पूजा की जाती है। राजा अपने महल को जाते हुए देवी "महोग्र तारा" के मंदिर में वंदना करता है। राजमहल में भी रघुनाथ जी की मूर्तियां हैं। यहां भी शस्त्रास्त्रों की पूजा की जाती है। देवी हिडिंबा राजा को आशीर्वाद देती हैं। अपराह्य तीन बजे के लगभग भगवान जी को पुष्पमालाओं से सुसज्जित पालकी में विराजते हैं। इसी के साथ भगवान विजय-यात्रा के लिए चल पड़ते हैं।

वाद्य-यंत्रों की मधुर ध्वनि से सारा वातावरण गूंज उठता है। पूजा एवं आरती के पश्चात् राजा, परिवार के अन्य सदस्य, पुजारी, पुरोहित, अन्य सेवक, कुछ देवता रथ की चार परिक्रमा करते हैं। राजा रस्सों को हाथ लगाता है। उसके पश्चात् हजारों की संख्या में लोग "श्री रामचंद्र की जय", "सीता माता की जय", "हनुमान जी की जय" आदि जयघोष करते हुए रथ को मैदान के मध्य तक ले जाते हैं।

कुल्लू दशहरा विशुद्ध रूप से सांस्कृतिक लोकोत्सव है। लगभग चार सौ वर्षों से निर्बाध रूप से मनाए जा रहे इस उत्सव का मुख्य आकर्षण "कुल्लुवी नाटी" है। एक ओर पूरे सात दिन धार्मिक आयोजन होते हैं, वहीं कला केन्द्र में लोकनृत्य होते रहते हैं। हिमाचल प्रदेश का यह सबसे बड़ा मेला है। इसे अब अन्तरराष्ट्रीय लोकनृत्य समारोह की मान्यता मिली हुई है।

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