रतनजोत और करंज से वाहन और उद्योगों के लिए ईंधन


तेज चाल, देश मालामाल

राजनीतिक कुहासे में अक्सर भारत के बढ़ने की खबरें दबी- ढकी रह जाती हैं। वैकल्पिक ईंधन की खोज भी ऐसा क्षेत्र है जिसमें भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के नाम पर ही अमरीका से परमाणु संधि की जाती है जिसके बारे में काफी आलोचना भी हो रही है। राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम एवं रा.स्व.संघ के सरसंघचालक श्री कुप् सी. सुदर्शन देश के उन अग्रणी चिंतको में हैं जिन्होंने स्वदेशी तकनीक से ही वैकल्पिक ईंधन खोजने के मार्ग को प्रोत्साहित किया है। इस तकनीक से न सिर्फ स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा मिलेगा और हमारी ऊर्जा आवश्यकता पूरी होगी वरन् सामान्य जन को भी आर्थिक लाभ होगा। यानी कुल मिलाकर देश मालामाल होगा। प्रस्तुत है इस महत्वपूर्ण विषय पर पाञ्चजन्य के दिल्ली ब्यूरो के साथ महाराष्ट्र, गुजरात एवं राजस्थान के संवाददाताओं द्वारा भेजी गई रपटों पर आधारित एक विशेष आयोजन, जिसके संयोजन में आलोक गोस्वामी, जितेन्द्र तिवारी व प्रवीण दीक्षित ने सहयोग किया। -सं.

वह दिन किसी आश्चर्य से कम नहीं होगा जब भारत की सड़कों पर सभी गाड़ियां पेट्रोल-डीजल की बजाय बायोडीजल से चलने लगेंगी और वह भी बहुत कम कीमत पर। वर्तमान में लगभग 46 रुपए प्रति लीटर पेट्रोल (जिसके भविष्य में बढ़ते जाने की ही आशंका है) और लगभग 32 रुपए प्रति लीटर डीजल की तुलना में यह आधे से भी कम कीमत यानी करीब 20 रूपये प्रति लीटर मिलेगा। बायोडीजल के विकास के लिए विभिन्न राज्यों में सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर प्रयास चल रहे हैं। पुणे में मिंट बायोफ्यूल्स है तो नागपुर की प्रो. अलका झड़गांकर ने तरल हाइड्रोकार्बन बनाया है, जो वैकल्पिक ईंधन बन सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री कुप्. सी. सुदर्शन भी कई बार बेहतर भविष्य और सीमित प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भरता कम करने के लिए रतनजोत (जट्रोफा) और करंज की खेती करने का आह्वान कर चुके हैं। हालांकि भारत में रतनजोत की खेती करने और उससे बायोडीजल का उत्पादन अपने प्रायोगिक चरण में ही है लेकिन यू.के. की गाड़ियों में शत-प्रतिशत बायोडीजल का प्रयोग किया जा रहा है। इसके अलावा कैलिफोर्निया एवं वाशिंगटन में भी जैव ईंधन का बखूबी प्रयोग किया जा रहा है। दुनियाभर में बायोडीजल के क्षेत्र में क्रांतिकारी प्रयास किए जा रहे हैं। जर्मनी में तो एक बड़ा संयंत्र स्थापित हो चुका है और भारत में संयंत्र के प्रारूप का सफल परीक्षण हो चुका है। उम्मीद है कि आने वाले कुछ सालों में यहां बड़े पैमाने पर बायोडीजल का उत्पादन संभव होगा। यह रतनजोत क्या है? इसकी खेती कैसे होती है? इससे बायोडीजल कैसे बनता है? आदि कुछ सवाल ऐसे हैं जिनके बारे में लोग जानने को उत्सुक हैं। आइए, एक-एक कर इन बिन्दुओं पर चर्चा करते हैं।

क्या है रतनजोत?

रतनजोत या अंग्रेजी में जट्रोफा, एक फलदार पौधा होता है जिसकी ऊंचाई अधिक नहीं होती। आंकड़ों के अनुसार एक बार लगाए रतनजोत पौधे से पचास वर्ष तक फसल प्राप्त की जा सकती है। रतनजोत में गुच्छे के रूप में फल आते हैं जिनके अंदर बैगनी रंग के बीज होते हैं। इन्हीं बीजों से बायोडीजल प्राप्त किया जाता है।

बायोडीजल उत्पादन विधि

रतनजोत के अखरोट जैसे फल के बीजों से प्राप्त होने वाले तेल का शुद्धिकरण करने के बाद जो तरल ईधन मिलता है, वह बायोडीजल कहलाता है। इसको बनाने का तरीका बहुत जटिल नहीं है। जट्रोफा के बीजों को सबसे पहले तेल निष्कर्षण यंत्र (एक्सपेलर) में पीसा जाता है, जिससे कच्चा तेल व भूसा प्राप्त होता है। भूसा व खली पिसाई के दौरान अलग-अलग हो जाती है जबकि इससे प्राप्त कच्चा तेल दूसरी ओर एकत्र कर लिया जाता है। इस कच्चे तेल को 60 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान तक गर्म किया जाता है। यह प्रक्रिया "ट्रांसस्टेरिफिकेशन" कहलाती है। इस प्रक्रिया में 20 प्रतिशत मेथेनॉल और 1 प्रतिशत सोडियम हाइड्रोक्साइड मिलाया जाता है जिससे ट्राइग्लिसराइड्स, मिथाइलस्टरस में बदल जाते हैं। लेकिन मिश्रण से प्राप्त उत्पाद में बायोडीजल के साथ ग्लिसराल सह उत्पाद के रूप में होता है। इसे अलग करने के लिए बायोडीजल शुद्धिकरण प्रक्रिया की जाती है और तब शुद्ध बायोडीजल अलग हो जाता है और कच्चा ग्लिसरीन अलग।

बायोडीजल उत्पादन में लागत

उपरोक्त प्रक्रिया से एक लीटर बायोडीजल प्राप्त करने के लिए 4 किलो रतनजोत बीजों का प्रयोग किया जाता है। 6 रुपये प्रतिकिलो की दर से इन बीजों की कीमत 24 रुपये होती है। बीजों से तेल निकालने में 50 पैसे प्रति किलो की लागत आती है। इस प्रकार चार किलो बीजों से तेल निकालने में बीज की कीमत मिलाकर कुल लागत 26 रुपये आती है। लेकिन तेल निकालने के बाद अवशेष के रूप में चार किलो बीजों से 3 किलो खली मिलती है जिसकी कीमत 2 रुपये प्रति किलो के हिसाब से 6 रुपये होती है। इस खली का उपयोग पशु चारे और जैविक खाद के तौर पर किया जा सकता है। इस तरह प्रति लीटर तेल की कीमत 20 रुपये हुई। तेल से बायोडीजल बनाने में प्रसंस्करण लागत में 6.50 रुपये का खर्च आता है। इसमें मेथेनाल, सोडियम हाइड्राक्साइड, सल्फ्यूरिक एसिड, विद्युत, भाप व श्रमिक खर्च भी शामिल है। यह कीमत जोड़ने पर प्रतिलीटर बायोडीजल की कीमत 26.50 रुपये होगी लेकिन बायोडीजल बनाते समय 200 ग्राम कच्चा ग्लिसराल प्राप्त होता है जिसकी कीमत 35 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से 7 रुपये होती है। अंतिम रूप से प्रति लीटर बायोडीजल की उत्पादन लागत केवल 19.50 रुपये आती है। इस प्रकार बायोडीजल सस्ता तो होता ही है, सुलभ और पर्यावरण के अनुकूल भी है।

जट्रोफा की खेजी के लिए राज्यवार संभावित बंजरभूमि क्षेत्र

राज्य 

जट्रोफा खेती के लिए उपलब्ध बंजरभूमि क्षेत्र (वर्ग कि.मी.) 



आंध्र प्रदेश 

38454.44 



अरुणाचल प्रदेश 

9891.35 



असम 

10211.19 



बिहार/झारखंड 

14717.18 



गोवा 

346.08 



गुजरात 

12265.36 



हरियाणा 

2297.29 



हिमाचल प्रदेश 

14451.76 



जम्मू व कश्मीर 

- 



कर्नाटक 

11621.15 



केरल 

1231.41 



मध्य प्रदेश/छत्तीसगढ़ 

61456.38 



महाराष्ट्र 

44732.22 



मणिपुर 

12844.05 



मेघालय 

3406.29 



मिजोरम 

4469.88 



नागालैण्ड 

3709.40 



उड़ीसा 

16767.48 



पंजाब 

556.04 



राजस्थान 

54622.75 



सिक्किम 

2276.16 



त्रिपुरा 

1322.83 



तमिलनाडु 

13496.56 



उत्तर प्रदेश/उत्तरांचल 

10357.85 



प. बंगाल 

1985.05 



संघ राज्य क्षेत्र -

स्रोत : भारत की बंजरभूमि संबंधी एटलस - 2005, भूमि

संसाधन विभाग, ग्रामीण विकास मंत्रालय

छत्तीसगढ़ में पहल

छत्तीसगढ़ योजना आयोग के उपाध्यक्ष डा. दीनानाथ तिवारी बायोडीजल के क्षेत्र में विशेष दिलचस्पी के साथ काम कर रहे हैं। उनके अनुसार बायोडीजल के उत्पादन के लिए अधिक प्रयास होने चाहिए। विदेशों में बायोडीजल का प्रयोग व्यापक स्तर पर हो रहा है जबकि भारत में रतनजोत को अभी प्रायोगिक तौर पर ही उगाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ ही एकमात्र ऐसा राज्य है जहां बायोडीजल का प्रयोग व्यापक स्तर पर किया जा रहा है। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की कार भी बायोडीजल से चलाई जा रही है। कबीरधाम के पास पांच गांवों में बायोडीजल से बिजली का उत्पादन भी किया जा रहा है। इसके अलावा रायपुर में 3 हजार लीटर बायोडीजल प्रतिदिन निर्मित करने के लिए संयंत्र की स्थापना की जा चुकी है। पंचायत स्तर पर भी अनेक बायोडीजल संयंत्रों की स्थापना की गई है जिनकी क्षमता 100 लीटर प्रतिदिन है। राज्य में रतनजोत की खेती को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2005-06 में किसानों को 6 करोड़ रतनजोत पौधों का वितरण किया गया, जिन्हें बंजर जमीन पर रोपा गया। इस वर्ष राज्य ने 16 करोड़ रतनजोत पौधों को रोपने का लक्ष्य निर्धारित किया है। वन विभाग, वन विकास निगम और कृषि विभाग ने भी संयुक्त रूप से मिलकर रतनजोत की खेती के प्रयास शुरू किए हैं। संबंधित विभागों का लक्ष्य खाली पड़ी जमीन पर रतनजोत की खेती करना है। छत्तीसगढ़ सरकार ने रतनजोत वृक्षारोपण एवं बायोडीजल संयंत्रों की स्थापना के लिए भूमि को अनुबंध पर देने के लिए शासकीय अधिसूचना भी जारी की है। बायोडीजल की गुणवत्ता नियंत्रित करने के लिए रायपुर में सभी सुविधाओं से युक्त प्रयोगशाला की स्थापना संबंधी कार्रवाई चल रही है। 149 निजी निवेशकों से भी रतनजोत वृक्षारोपण एवं बायोडीजल संयंत्रों की स्थापना के लिए राज्य सरकार ने आवेदन प्राप्त किए हैं। इसके तहत लगभग 2.87 लाख हेक्टेयर बंजर भूमि का आवंटन किया जाएगा।

गुजरात का प्रयास

गुजरात में हाल ही में अंकलेश्वर स्थित कंपनी "गुजरात ओइलो कैम लिमिटेड" (जीओसीएल) ने इंडियन आयल कारपोरेशन को बायोडीजल उपलब्ध कराया है। इसके साथ ही यह कंपनी बायोडीजल का व्यावसायिक उत्पादन करने वाली पहली भारतीय कंपनी बन गई। इंडियन आयल कारपोरेशन (आईओसी) और जीओसीएल ने संयुक्त रूप से बायोडीजल के क्षेत्र में भारतीय रेलवे एवं हरियाणा रोडवेज के साथ प्रायोगिक तौर पर गुजरात में 450 किलोलीटर (4 लाख 50 हजार लीटर) क्षमता का एक संयंत्र भी स्थापित किया था। यही नहीं रतनजोत की खेती के लिए भारतीय रेलवे के साथ पूरी योजना के लिए गुजरात के सुंदरनगर जिले को चिन्हित किया गया है जहां 70 हेक्टेयर भूमि पर रतनजोत की खेती की जाएगी। इसके अलावा जर्मनी की भारत स्थित कंपनी डायमलर क्रिसलर ने गुजरात में बायोडीजल उत्पादन के लिए एक सहकारी इकाई की शुरूआत भी की है। कंपनी द्वारा 10 हेक्टेयर में लगाए गए रतनजोत पौधों से 1000 लीटर बायोडीजल का उत्पादन किया जा चुका है।

डूंगरपुर (राजस्थान) में रतनजोत की खेती

अरावली पर्वतमाला के विस्तृत भाग में बसे डूंगरपुर (राजस्थान) जिले में बंजर पड़ी भूमि पर जट्रोफा उत्पादन का प्रयास किया गया है। इस जिले का क्षेत्रफल 3855 वर्ग किमी है जिसमें 96560 हेक्टेयर भू-भाग बंजर है। कुछ समय पूर्व यू.एन.डी.पी. व सी.आई.आई. के अन्तर्गत टीटागढ़ बायोटेक लि. द्वारा जिले में जट्रोफा करकस के पौधारोपण संबंधी प्रस्ताव भी प्रस्तुत किए गए थे लेकिन बाद में यह कार्य आगे नहीं बढ़ सका। डूंगरपुर जिला अकालग्रस्त जिलों की श्रेणी में आता है। इसके चलते अकाल राहत कार्यों के तहत ग्रामीणों को रोजगार प्रदान करने के उद्देश्य से जट्रोफा उत्पादन की योजना बनाई गई। इसके लिए प्रति ग्राम पंचायत 28 हेक्टेयर भूमि का रतनजोत खेती के लिए चिन्हीकरण किया गया। इस प्रकार संपूर्ण जिले की 236 ग्राम पंचायतों में कृषि विभाग द्वारा 6580 हेक्टेयर भूमि में प्रथम वर्ष में रतनजोत हेतु पौधारोपण किया गया। जट्रोफा खेती से जिले में रोजगार के साधनों में तो वृद्धि होगी ही, बायोडीजल उत्पादन में भी जिले का विशेष स्थान रहेगा।

मिजोरम में बायोडीजल उत्पादन

बायोडीजल उत्पादन के लिए मिजोरम सर्वाधिक अनुकूल राज्य हो सकता है। इसके लिए मिजोरम सरकार ने एक क्षेत्र चिन्हित किया है ताकि राज्य को "भारत के हरित तेल क्षेत्र" के रूप में विकसित किया जा सके। मिजोरम उत्तर-पूर्व में बायोडीजल का वृहद उत्पादन करने हेतु रतनजोत पौधरोपण योजना लागू करने वाला पहला राज्य होगा। पूरी योजना "राष्ट्रीय तिलहन एवं वनस्पति तेल विकास निगम" (एनओवीओडी) के संरक्षण में संपन्न होगी। राज्य के कृषि मंत्री एच. राम्मावी के अनुसार "जट्रोफा केवल रोजगार के साधनों में ही वृद्धि नहीं करेगा बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करेगा और दो से चार वर्षों में मिजोरम बायोडीजल निर्यात करने की स्थिति में होगा।" कृषि विभाग का इस राज्य को देश का सर्वाधिक जट्रोफा उत्पादक राज्य बनाने का लक्ष्य है। कृषि विभाग ने "गोदरेज इंडिया लि." के साथ 250 करोड़ रुपये का एक समझौता किया है।

बायोडीजल के संबंध में राष्ट्रीय अभियान

कच्चे तेल का मूल्य लगभग 70 डालर प्रति बैरल पहुंचने, राष्ट्रीय ऊर्जा मांग में वृद्धि होने और तेल आयात पर निर्भरता बढ़ने से ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु घरेलू विकल्प विकसित करना आवश्यक हो गया है। बायोईंधन के विकास तथा इस संदर्भ में पेट्रोलियम-डीजल के विकल्प के रूप में बायोडीजल का महत्व काफी बढ़ गया है और इसे व्यापक तौर पर स्वीकार किया गया है। गत 28 अप्रैल को कृषि भवन दिल्ली में हुई पत्रकार वार्ता में बायोडीजल के क्षेत्र में देश भर में चल रहे प्रकल्पों की जानकारी दी गई। इसके अनुसार मुख्यत: निम्नलिखित बिंदु रखे गए।

छत्तीसगढ़ राज्य योजना आयोग के उपाध्यक्ष डा. डी.एन. तिवारी की अध्यक्षता में बायो ईंधन के विकास के संबंध में एक समिति गठित की गई थी, जिसने अपनी रपट अप्रैल 2003 में प्रस्तुत की थी। रपट में बंजर भूमि पर जट्रोफा के पौधारोपण पर विशेष ध्यान देते हुए बायोडीजल के संबंध में एक राष्ट्रीय अभियान शुरु करने की संस्तुति की गई थी।

बायोडीजल का प्रयोग कोई नई संकल्पना नहीं है। यूरोप, अमरीका, ब्रााजील और मलेशिया जैसे एशियाई देशों में यह पहले से ही प्रचलित है।

वर्तमान में, यूरोप में बायोडीजल तौरिया व सूर्यमुखी के बीजों से जबकि अमरीका में सोयाबीन से प्राप्त तेलों से उत्पादित किया जा रहा है। मलेशिया बायोडीजल उत्पादन के लिए "पाम आयल" का प्रयोग करता है।

ग्रामीण विकास मंत्रालय की पौधरोपण, प्रसंस्करण, तेल निष्कर्षण और "ट्रांसस्ट्रेरीफिकेशन" में प्रत्यक्ष भूमिका होगी।

तेल कंपनियों ने पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस मंत्रालय के नियमों के अंतर्गत बायोडीजल को 25 रुपये प्रति लीटर की दर से खरीदने की नीति घोषित की है, जिसे बीज मूल्य 5 रुपये प्रतिकिलो के आधार पर सह-उत्पादों से मिलने वाले लाभ के कुछ पूर्वानुमानों पर निर्धारित किया गया है।

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