-ए. सूर्य प्रकाश
वरिष्ठ विश्लेषक
चार राज्यों और एक केन्द्र शासित प्रदेश में विधानसभा चुनावों के परिणाम लगभग वैसे ही रहे हैं जैसी कि उम्मीद की जा रही थी। केरल और प. बंगाल में वाम लोकतांत्रिक मोर्चे की जीत हुई। तमिलनाडु में द्रमुक-कांग्रेस गठबंधन को बहुमत मिला। पाण्डिचेरी में भी कांग्रेस गठबंधन चुनाव जीता तो असम में कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरा है। पहले बात करते हैं केरल की। 2004 के लोकसभा चुनाव में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा की बुरी तरह हार हुई थी। तब ही लग गया था कि विधानसभा चुनाव में वहां जनता वाम लोकतांत्रिक मोर्चे को जिताएगी।
प. बंगाल में भी वाम मोर्चा सातवीं बार जीत गया। वहां जब तक सभी विपक्षी दल एक महाजोट नहीं बनाएंगे तब तक कम्युनिस्टों को चुनौती नहीं दी जा सकती। 1977 के आम चुनाव की याद कीजिए। आपातकाल के समय जेल में बंद विपक्षी नेताओं ने जेल से बाहर आकर एक बड़ा गठबंधन बनाया, कांग्रेस को चुनौती दी। कांग्रेस वह चुनाव हार गई। इसी तरह प. बंगाल में वामपंथियों को हराने के लिए महाजोट बनाना ही पड़ेगा।
प. बंगाल में प्रत्येक चुनाव में वाम मोर्चे को लगभग 45-48 प्रतिशत वोट मिलते हैं यानी 55 प्रतिशत वोट विपक्षी दलों को मिलते हैं। अगर ये विपक्षी वोट मिल जाएं तो कम्युनिस्टों को हरा सकते हैं। भले वहां की जनता कम्युनिस्टों की सरकार से नाराज हो, पर कोई विकल्प नहीं है इसलिए वाम मोर्चा जीतता है। बंगाल की जनता के मन में भी बदलाव की इच्छा तो है पर उसके सामने कोई विकल्प नहीं होगा तो फिर जो परिणाम आया है वही आएगा। 5 चरण में मतदान कराने के अलावा इस बार चुनाव आयोग ने काफी सख्त कदम उठाए तब भी कम्युनिस्ट चुनाव जीते। इससे यही अर्थ निकलता है कि "साइंटिफिक रिगिंग" के नाम पर अगर कम्युनिस्ट 5-7 प्रतिशत वोट भले अधिक ले जाते थे, पर इस बार जो हुआ उस पर क्या कहेंगे? मुझे लगता है कि विपक्षी दलों को कामरेडों के जमीनी स्तर से ऊपर तक के अनुशासन से कुछ सबक लेना चाहिए। कम्युनिस्टों को केवल बुरा-भला कहते रहने से काम नहीं चलेगा।
तमिलनाडु में सन् 2004 के आम चुनावों में जनता ने द्रमुक और कांग्रेस को अच्छा समर्थन दिया था। इसके बाद जयललिता ने अपने से दूर गए वोटों को फिर पाने का काफी प्रयास किया, वाइको को भी अपने साथ जोड़ा। इसके बावजूद अन्नाद्रमुक को इन चुनावों में सफलता नहीं मिली। और पाण्डिचेरी में लगभग तमिलनाडु के माहौल की छाया रहती है।
असम में आश्चर्यजनक स्थिति बनी है। चुनाव से पहले वहां एक अलग आकलन था। लगता था कि सत्ताविरोधी रुख होगा पर कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है। कांग्रेस के सामने विरोधी दलों को एकजुट होकर मैदान में उतरना था, लेकिन सब दल अलग-अलग लड़े। इस बार अगप भी दो टुकड़ों में बंट गई, मुस्लिमों का एक अलग दल बन गया था। वहां मतों के बंटने का लाभ कांग्रेस को मिला।
कुल मिलाकर कह सकते हैं कि चुनाव से पहले ही यह आभास हो चला था कि कांग्रेसनीत सरकार और उसे समर्थन दे रहे कम्युनिस्टों को विधानसभा चुनावों में हराने की कोई रणनीति नहीं थी। केन्द्र में प्रमुख विपक्षी दल भाजपा और राजग के घटक दलों की किसी भी राज्य में ऐसी स्थिति बनती नहीं दिखी कि वे कांग्रेस या कम्युनिस्टों को प्रभावी चुनौती दे पाते।
इसके अलावा कुछ और पहलुओं पर गौर करना जरूरी है। 1999 में एक वोट से भाजपानीत गठबंधन सरकार के गिर जाने के बाद चुनाव हुए। भाजपा ने द्रमुक को साथ मिलाया। लेकिन द्रमुक के नेता करुणानिधि के साथ भाजपा अपने सम्बंध कायम नहीं रख सकी और बाद में अन्नाद्रमुक का हाथ थाम लिया। द्रमुक के साथ रिश्ता न रखने से नाराज करुणानिधि ने कांग्रेस का साथ दिया। दक्षिण भारत के राज्यों में भाजपा को 10-12 प्रतिशत मत मिलने लगे थे, लेकिन इन मतों को अपने पास बनाए रखने के लिए भाजपा ने क्या किया?
मुझे लगता है कि आज ऐसी स्थिति बन गई है कि प्रमुख विपक्षी दल भाजपा को बुनियादी तौर पर गंभीर विचार करना होगा कि कैसे एक दमदार एकजुट विपक्ष की नींव डाली जाए। (आलोक गोस्वामी से बातचीत पर आधारित)
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