सरकार को हिन्दुओं की पीड़ा क्यों नहीं दिखती?
जब भी कश्मीर पर चर्चा होती है तो सेकुलर तालिबान सलाह और उपदेश देने लग जाते हैं। पनुन कश्मीर ने पिछले दिनों दिल्ली के इंडिया हैबीटेट सेंटर में एक गोष्ठी की, जिसमें फारुख अब्दुल्ला ने आना मंजूर किया था लेकिन ऐन वक्त पर टाल गए। यह गोष्ठी पनुन कश्मीर द्वारा दिल्ली में कश्मीरी हिन्दुओं पर हमलों की चित्र प्रदर्शनी के संदर्भ में आयोजित की गई थी जिसका विषय था "कश्मीरी पंडितों की घरवापसी"। अंतत: गोष्ठी में जनता पार्टी के अध्यक्ष डा. सुब्राह्मण्यम स्वामी, राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक श्री गोविंदाचार्य, सी.आई.आई. के इंटरनेशनल डिवीजन में सलाहकार श्रीमती पामेला भगत और जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में अन्तरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान के प्रो. कमल मित्र चिनाय तथा पनुन कश्मीर के अध्यक्ष श्री अजय च्रंगू शामिल हुए। गोष्ठी में जहां डा. सुब्राह्मण्यम स्वामी ने कहा कि कश्मीर मूलत: शत प्रतिशत हिन्दू क्षेत्र था, परंतु केवल मतांतरण के कारण वहां पर मुस्लिम जनसंख्या बढ़ी। आज भी जम्मू और लद्दाख को छोड़कर केवल घाटी ही मुस्लिम बहुल है, जहां हिन्दुओं के निष्कासन और उनकी संख्या में कमी की वजह धारा 370 है। अगर धारा 370 नहीं होती तो कश्मीर घाटी भी हिन्दू- विहीन नहीं होती, क्योंकि तब देश के विभिन्न हिस्सों से हिन्दू वहां आकर बस सकते थे। लेकिन जब प्रो. चिनाय ने कश्मीरी हिन्दुओं के संदर्भ में सेकुलर उपदेश देने शुरू किए तो लोग भड़क उठे। परंतु प्रो. चिनाय ने माना कि कश्मीरी हिन्दुओं का घाटी से निष्कासन सेकुलरवाद पर एक कलंक है। प्रो. चिनाय ने कश्मीरी हिन्दुओं के संदर्भ में कहा कि धारा 370 हटाने की कोई आवश्यकता नहीं और कश्मीरी पंडित आज भी सुरक्षित वापस लौट सकते हैं तो सभा भवन में हंगामा शुरू हो गया। प्रो. चिनाय को अनेक तीखे प्रश्नों का सामना करना पड़ा। पनुन कश्मीर के अध्यक्ष डा. अजय च्रंगू ने कहा कि भारत में सेकुलरवाद का अर्थ मुस्लिम साम्प्रदायिकता से समझौता हो गया है। जब तक मुस्लिम समाज में बसी साम्प्रदायिक मजहबी भावना समाप्त नहीं होती, तब तक कश्मीर समस्या का हल और पंडितों की वापसी नहीं हो सकती। भारत के विरुद्ध एक गहरा इस्लामी षडंत्र चल रहा है। श्री गोविंदाचार्य ने कहा कि हिंसा की भाषा समझने वालों के साथ अहिंसा की बात नहीं की जा सकती। कश्मीरी पंडितों की वापसी के रास्ते के अवरोध वीरता और बलिदान से हटेंगे। उन्होंने कहा कि दुनियाभर में इस्लाम के जिहादी स्वरूप के कारण समस्या है और इसका सामना वैश्विक स्तर पर होना चाहिए। यह सभ्यतामूलक संघर्ष है। श्रीमती पामेला भगत ने अपने वक्तव्य में हिंसाग्रस्त समाज में महिलाओं की दयनीय स्थिति का वर्णन किया। संगोष्ठी में बड़ी संख्या में उपस्थित कश्मीरी पंडितों ने कहा कि जब तक कट्टर इस्लामी भावना मौजूद है पंडितों की वापसी असंभव है। सरकार अलगाववादियों व जिहादियों के प्रति नरम रूख अपनाए हुए है। उसे कश्मीरी पंडितों की पीड़ा दिखाई क्यों नहीं देती? गोष्ठी का संचालन श्रीमती सुमन खन्ना अग्रवाल ने किया। प्रतिनिधि
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