ये टूटे मंदिर नहीं दिखते सेकुलर तालिबानों को
16साल से कश्मीर घाटी और जम्मू में जारी जिहाद का वीभत्स स्वरूप पनुन कश्मीर की चित्र प्रदर्शनी में साफ तौर पर झलका। दिल्ली में सत्ता अधिष्ठान के गलियारों से मुश्किल से एक किलोमीटर दूर इंडिया हैबीटेट सेन्टर में 6 से 10 मई तक लगी इस चित्र प्रदर्शनी में कश्मीरी पंडितों की पीड़ा को जिस सच्चाई से झलकाया गया उसे देखने की दिल्ली के नेताओं को फुर्सत नहीं मिली। 8 मई की शाम प्रतिपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी जरूर इस प्रदर्शनी को देखने गए।
"साक्षात्कार"- यही था इस प्रदर्शनी का विषय - में जहां 1990 में घाटी से पलायन करके जम्मू के विभिन्न शरणार्थी शिविरों में रह रहे कश्मीरी पंडितों के दयनीय जीवन की झलक थी, तो घाटी के मंदिरों को खण्डहर बना दिए जाने के चित्र भी थे। वहां देवी-देवताओं, शिवलिंग और आदि शंकराचार्य की प्रतिमाओं को खण्डित किया गया, मंदिरों की इमारतें धराशायी की गईं, उनकी दीवारों पर अंग्रेजी और उर्दू में भद्दे शब्द लिखे गए। इतना ही नहीं, पंडित समाज कभी घाटी में वापस न लौटे इसलिए उनके खाली घरों व जमीनों पर कब्जा कर लिया गया या उन घरों की खिड़कियां, दरवाजे निकालकर बेच दिए गए। ये सब उन चित्रों में झलका। जान जोखिम में डालकर पनुन कश्मीर के अध्यक्ष डा. अजय च्रंगू और उनके साथियों ने तीन साल तक घाटी के छह जिलों का सर्वेक्षण करके ये सामग्री एकत्र की है।
कश्मीरी पंडित घाटी में अपने घरों में लौटना चाहते हैं लेकिन जिहादियों ने उनकी वापसी के सारे रास्ते बंद कर दिए हैं। हुर्रियत से बात करने की इच्छुक केन्द्र सरकार भी पंडितों की पीड़ा को अनदेखा करती रही है। प्रदर्शनी में जिहादियों की उन धमकियों की छाया प्रतियां भी लगाई गईं, जिनमें चेतावनी दी गई थी कि अगर पंडित लौटना चाहते हैं तो "कश्मीर की आजादी में उनका साथ देना होगा।" ये अपील कश्मीर के अखबारों में जारी की गई थी। इतना ही नहीं, कश्मीरी पंडितों को "कैंसर" की संज्ञा देते हुए इसकी "वापसी" को रोकने की अपीलें छपी थीं। प्रदर्शनी स्थल पर उपस्थित पनुन कश्मीर के प्रतिनिधि ने कहा कि यह प्रदर्शनी भारत के विभिन्न भागों में लगाई जानी चाहिए ताकि देशवासियों को कश्मीर के असली हालात पता चल सकें। लेकिन समस्या यह है कि उन्हें इसके लिए प्रायोजक नहीं मिल रहे और उनके पास इतना पैसा नहीं है।
उधर वडोदरा में दरगाह के मामले में केन्द्र सरकार ने तुरंत झुक कर सर्वोच्च न्यायालय से बाकी अतिक्रमण न तोड़ने पर स्थगनादेश ले लिया, लेकिन नरेन्द्र मोदी ने पहले की ही तरह इस बार भी दृढ़ता दिखाई और दंगाइयों से कठोरतापूर्वक निपटने का संदेश दिया। मोदी की दृढ़ता और फौलादी रवैये ने उनके कट्टर दुश्मन माने जाने वाले अखबारों और चैनलों को भी यह कहने पर विवश कर दिया कि मोदी ने इस बार दंगों पर तुरंत काबू पाया। परन्तु फिर भी सेकुलर तालिबान वडोदरा से लेकर कश्मीर घाटी तक हिन्दू मंदिरों के ध्वंस पर चुप रहे तथा तीस्ता और उनके पति जावेद मोदी को तालिबान कहते रहे, ताकि उनकी सेकुलर दुकान का काम चलता रहे। प्रतिनिधि
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