राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक प. पू. श्री गुरुजी ने समय-समय पर अनेक विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। वे विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने पहले थे। इन विचारों से हम अपनी समस्याओं का समाधान ढूंढ सकते हैं और सुपथ पर चलने की प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं। इसी उद्देश्य से उनकी विचार-गंगा का यह अनुपम प्रवाह श्री गुरुजी जन्म शताब्दी के विशेष सन्दर्भ में नियमित स्तम्भ के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। -सं
जनतांत्रिक विधान का शत्रु "कम्युनिज्म"
हमारे देश में जनतंत्र की गंभीर असफलताओं के पीछे कम्युनिज्म की बढ़ती हुई विभीषिका है, जो जनतांत्रिक विधान की मानी हुई शत्रु है। जनता के समक्ष की गई अपनी आर्थिक अपील में कम्युनिस्टों से कहीं पिछड़ न जाएं, इस प्रयास में हमारे नेतागण कम्युनिस्टों की ही भाषा तथा कार्यक्रमों को अपनाकर कम्युनिज्म को अधिक सम्माननीय बना रहे हैं। यदि नेतागण यह समझते हैं कि इस प्रकार के चातुर्य से वे कम्युनिस्टों के पाले की हवा खींच लेंगे, तो यह उनकी बहुत बड़ी भूल है। वे यह अनुभव करते हैं कि आर्थिक विकास ही कम्युनिज्म से रक्षा का एकमेव उपाय है। हमें देशभक्ति, चरित्र एवं ज्ञान जैसी उच्चतर भावनाओं के लिए आह्वान कहीं भी सुनने को नहीं मिलता और न कहीं सांस्कृतिक, बौद्धिक तथा नैतिक विकास पर ही बल दिया जाता है। इसी प्रकार के दुर्बल एवं विफल मस्तिष्कों में कम्युनिज्म के बीज जल्दी जड़ पकड़ते हैं। (साभार: श्री गुरुजी समग्र : खंड 11, पृष्ठ 207)
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