समन्दर की लहरों-सा क्षणजीवी है आधुनिक फैशन
फैशन और संस्कृति में टकराव उस मोड़ पर उत्पन्न होता है जहां जीवन मूल्यों को चुनौती मिलने लगती है। छाल लपेटने से लेकर सुन्दरतम वस्त्रों तक सभ्यता ने आकर्षक पड़ाव पार किये हैं। फैशन के नाम पर अत्यन्त सूक्ष्म कपड़ों की वकालत नहीं की जा सकती।
अजंता-एलोरा का नारी चित्रांकन हो, रवि वर्मा की चित्रकृतियां या महाकवि कालिदास की रूप व्यंजना- सभी ने स्त्री की कायिक भंगिमाओं, वस्त्राभूषणों और केश सज्जा को युगानुरूप उकेरा है, पर सभी में एक उन्नत सौंदर्य सृष्टि प्रमुख है।
आशय यह कि फैशन तब भी होता था, आज भी होता है किन्तु आज का फैशन समन्दर की लहरों-सा क्षणजीवी है, उसमें सदी की बेचैन और बेचेहरा तस्वीर साफ झलकती है। वह अक्सर अभद्रता और अश्लीलता तक पहुंच जाता है। उत्तेजक और फूहड़ फैशन व्यक्ति के चाल-चलन से जोड़ा जाता।
नाभिदर्शना बालिश्त भर का टॉप, ब्लाउज के नाम पर दो डोरियां, सौंदर्य प्रतियोगिताओं में बिकनी या फैशन शो में रंगबिरंगे चीथड़े, क्या यह लिबास को उत्तेजना से जोड़ने का पराक्रम नहीं है? "रीमिक्स एलबमों" में नारी देह का अत्यल्प वस्त्रों में प्रदर्शन- किसी कोण से सभ्यता की सरहद में नहीं आता। इसी विशेष वर्ग का सस्ता अनुकरण मध्यम और निम्न वर्ग करता है।
भारत में स्त्री के परिधान सदैव उष्ण जलवायु और पुरुष प्रधान सामाजिक संरचना से नियंत्रित होते रहे हैं। समय के साथ रूप-वेष-केश सज्जा में फैशन का पुट न स्त्री सम्मान विरोधी है न बिगड़ जाने का सबूत, हां वह सुरुचिपूर्ण और सलज्ज हो, अभद्र नहीं।
रही बेटे-बेटियों के लिए अलग-अलग मानदण्डों की बात, तो स्पष्ट है कि दैहिक संरचना, मनोविज्ञान और हजारों सालों से चली आ रही मान्यताओं के चलते लड़की का देर रात तक घर से बाहर रहना तर्कसंगत नहीं। सच तो यह है कि लड़कों का भी बहुत रात तक घर से बाहर रहना बहुत अच्छा नहीं माना जाता।
इन्दिरा किसलय
बल्लालेश्वर अपार्टमेंट,
रेणुका विहार
रामेश्वरी रिंग रोड, नागपुर-27 (महाराष्ट्र)
फैशन नहीं, श्रृंगार है हमारी परंपरा
फैशन करना चाहिए या नहीं, यह बात फैशन की सीमा पर निर्भर करती है। क्योंकि अति तो हर चीज की बुरी होती है। वास्तव में फैशन पश्चिमी देशों की देन है, यह हमारे देश की परंपरा नहीं है। हमारे देश में श्रंृगार की परंपरा रही है परंतु उसका स्वरूप अलग था। हमारे देश की स्त्रियां केवल अपने पति को रिझाने के लिए ही श्रृंगार किया करती थीं। इसलिए कुंवारी लड़कियों और विधवाओं द्वारा श्रंृगार अनुचित माना जाता था। परंतु आज तो इसका रूप ही बदला गया है। क्या बच्चे, क्या बूढ़े, सभी फैशन करने में ही अपनी शान समझते हैं। वे यह भूल गए हैं कि फैशन की हमारे जीवन में उतनी ही जरूरत है जितनी कि सब्जी में गरम मसाले की। सब्जी में यदि गरम मसाला नहीं पड़ा हो तो कोई बात नहीं, हम खा सकते हैं, यदि थोड़ा पड़ा हो तो सब्जी का स्वाद बढ़ जाएगा लेकिन यदि अधिक पड़ जाए तो सब्जी कड़वी हो ही जाएगी। आज फैशन जिस प्रकार से बढ़ रहा है उससे वह दिन दूर नहीं जब लोग सभ्यता, संस्कृति, रिश्ते, लज्जा जैसे शब्दों को भूल जाएंगे। बड़े महानगरों से लेकर छोटे कस्बों तक फैशन का जादू मकड़े की जाल की तरह फैलता जा रहा है। मेरे विचार में इसका सबसे बड़ा कारण टेलीविजन है। डीडी 1 हो या अन्य चैनल, इनके द्वारा प्रसारित लगभग सभी धारावाहिकों में फैशन की बहार छाई रहती है। फैशन के अलग से चैनल भी हैं जो फैशन कम और फूहड़ता अधिक दिखाते हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियां फैशन प्रतियोगिता करवाती हैं। इन प्रतियोगिताओं में करोड़ों रुपए खर्च करके केवल देह की नुमाइश ही तो की जाती है। फैशन के बहाने किए जाने वाले अंग प्रदर्शन से स्त्रियों और समाज का भला तो क्या होगा, उल्टे स्त्रियों के प्रति समाज की मानसिकता में गिरावट ही आ रही है। इसलिए फैशन एक सीमा में ही अच्छा माना जा सकता है। फैशन में शालीनता होनी चाहिए, न कि फूहड़ता।
ममता रानी
डी-76, प्रथम तल,
पश्चिमी पटेल नगर
नई दिल्ली-110008
सभ्यता और संस्कृति के अनुसार हो फैशन
परिवर्तन प्रकृति का नियम है, इसी नियम के चलते हमारी भाषा, खान-पान, सोचने के ढंग में भी परिवर्तन हुआ है। साथ ही साथ परिवर्तन हुआ है हमारे पहनावे में। इसीलिए सभ्य परिवर्तित फैशन भी गतिशील समाज का एक मान्य हिस्सा है। हमारे भारतीय समाज में "परिवर्तन" का सदैव स्वागत हुआ है। यह मानव का स्वभाव है कि उसे नये ढंग सदैव अच्छे लगते हैं, इसी कारण एक दायरे में रहकर समाज परिवर्तन को नि:संकोच अपनाता आया है। जो व्यक्ति समाज के परिवर्तन और गति से मिलकर नहीं चलता उसको समाज मीलों पीछे छोड़ देता है। फैशन भी एक बहाव ही है और नारी सौन्दर्य का निखार इसी बहाव से है। पर कुछ संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों ने फैशन और अश्लीलता को एक दूसरे का पर्याय मान लिया है, जबकि यह ठीक नहीं है। फैशन का अर्थ है- ऐसा बदलाव जो समाज के अधिकांश लोगों को स्वीकार्य हो और सुन्दर लगता हो। परन्तु प्रत्येक समाज में फैशन और अश्लीलता के मायने भी अलग-अलग होते हैं। यही कारण है कि जो रंग-ढंग पश्चिम में फैशन माने जाते हैं वे ही तरीके हमारे यहां अश्लीलता की श्रेणी में रखे जाते हैं। क्योंकि हमारी संस्कृति और सभ्यता के अलग मापदण्ड हैं। किसी भी दूसरी जीवन शैली का अंधानुकरण ठीक नहीं है क्योंकि निश्चित रूप उनके सांस्कृतिक प्रतिमान हमारे सांस्कृतिक प्रतिमान नहीं हो सकते और इसी कारण हमारा फैशन और उनका फैशन अलग-अलग ही होगा, होना भी चाहिए। संक्षेप में कहा जाए तो सभ्यता और संस्कृति के अनुसार बदलने वाले रंग-ढंग, सुन्दर दिखने के लिए अपनाए गये नए शालीन तरीके ही फैशन हैं। ऐसा फैशन कभी गलत नहीं है, यह तो एक ऐसा सिलसिला है जो चलता आया है और चलता ही रहेगा।
संजना उपाध्याय
द्वारा राजीव कुमार उपाध्याय
ग्राम व पोस्ट- सोराना, जिला-
सहारनपुर-247232 (उत्तर प्रदेश)
NEWS