शराबलाबी ने एथनाल का प्रयोग रुकवाया


-राम नाईक, पूर्व पेट्रोलियम मंत्री

पेट्रोलियम के क्षेत्र में एथनॉल और बायोडीजल ये दो अलग-अलग तत्व हैं। गन्ने से चीनी बनने की प्रक्रिया में जो अवशेष बचता है, जिसे शीरा कहते हैं, उससे एथनॉल प्राप्त किया जा जाता है। हमने पेट्रोल में प्रति लीटर 5 प्रतिशत एथनाल मिलाने का निर्णय किया था। पहले चरण में प्रमुख गन्ना उत्पादक आठ राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु तथा आंध्रप्रदेश में एथनाल मिलाने का प्रयोग किया गया जो बेहद सफल रहा। अगस्त, 2004 में दूसरे चरण में देश के सभी राज्यों में 5 प्रतिशत एथनाल मिलाया जाना था तथा तीसरे चरण में एथनाल की मात्रा 10 प्रतिशत तक ले जानी थी। परन्तु दुर्भाग्य से दूसरा चरण प्रारंभ होने से पूर्ण हमारी सरकार चली गयी और यह प्रक्रिया रुक गई। तब तक हम इन 8 राज्यों में 8 प्रतिशत एथनाल का सफलतापूर्वक मिश्रण कर रहे थे। लेकिन सरकार बदली और एक बार फिर शराब लाबी हावी हो गयी, जिसने इसकी प्रगति रोक दी, क्योंकि शराब भी शीरे से प्राप्त होती है और एथनाल भी। एथनाल बनने से शीरा उन्हें महंगा मिलने लगा, इसीलिए वे इसका शुरू से ही विरोध करते थे। यह शराब लाबी पहले की सरकारों पर भी दबाव रखती थी। जबकि ब्रााजील में 70 वर्ष हो गए एथनाल मिलाते हुए और वे 23 प्रतिशत तक पेट्रोल में इसे मिलाते हैं। राजग सरकार आने से पूर्व किसी सरकार ने एथनाल मिलाने का निर्णय नहीं लिया, शायद शराब लाबी के दबाव में। हमारी सरकार जाने के बाद दूसरे चरण में सारे देश में पेट्रोल में 5 प्रतिशत एथनाल मिलाने की प्रक्रिया को भी यह कहकर टाल दिया गया कि गन्ने का उत्पादन कम हुआ है और पर्याप्त मात्रा में एथनाल नहीं मिल रहा है।

हमें कुल आवश्यकता का 70 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करना पड़ता है, जिससे पेट्रोल-डीजल के अन्य ज्वलनशील पदार्थ बनते हैं। पिछले वर्ष ही हमने 1 लाख 35 हजार करोड़ रुपए का कच्चा तेल आयात किया। अन्तरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का दाम लगातार बढ़ता जा रहा है। यदि हमें शीरे जैसे अवशेष से एथनाल प्राप्त कर उसे 20 प्रतिशत तक पेट्रोल में मिलाएंगे तो हमारी पेट्रोलियम पदार्थों के श्रेत्र में पर निर्भरता कुछ कम होगी, विदेशी मुद्रा बचेगी, किसानों को गन्ने का अच्छा मूल्य मिलेगा। एक निश्चित मात्रा में एथनाल के मिश्रण से इंजन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि यह पर्यावरण के लिए भी लाभकारी है। जब यह बात इस सरकार को समझ में आयी तो 2 साल बाद फिर से पेट्रोलियम कम्पनियों ने निविदाएं निकाली हैं कि हम एथनाल खरीदेंगे।

विश्व के कई देश सूरजमुखी आदि खाद्य तेलों में से ही बायोडीजल निकालते हैं, पर हमारे देश में खाद्य तेल पर्याप्त मात्रा में नहीं होता। इसलिए नीम, रतनजोत, अरंडी, करंज आदि के बीज से निकलने वाले अखाद्य तेलों का डीजल में सफलतापूर्व मिश्रण किया जा सकता है। इसीलिए मैंने पेट्रोलियम मंत्री रहते इस विषय पर विशेष ध्यान दिया। इंडियन आयल कारपोरेशन की नोएडा इकाई ने जब प्रयोगशाला में शोध करके यह सिद्ध किया कि बायोडीजल की योजना हिन्दुस्थान में कारगर हो सकती है तो हमने बायोडीजल आयात कर सबसे पहले हरियाणा, भारतीय रेल और मुम्बई बेस्ट की बसों में प्रयोग किया। जब हमें उत्साहवर्धक परिणाम मिले तो भारत में ही बायोडीजल के निर्माण की कार्ययोजना तैयार की। चूंकि रतनजोत के लिए कम उपजाऊ, बंजर जमीन भी उपयोगी होती है और अधिक सिंचाई की आवश्यकता भी नहीं होती, इसलिए हमने इंडियन आयल कारपोरेशन और भारतीय रेल के बीच एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कराए, जिसमें भारतीय रेल की खाली पड़ी जमीन पर रतनजोत (जट्रोफा) का उत्पादन कर बायोडीजल प्राप्त किया जा रहा है। राज्यों को भी यह बताया गया कि यदि इस प्रकार तेल प्राप्त किया गया तो भारतीय तेल कम्पनियां उसे खरीदेंगी।

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