काठ के घोड़े


रामचन्द्र सरोज

जगह खाली नहीं है अब भी

काठ के घोड़े खड़े हैं यहां-वहां

और हम देख रहे हैं एक सपना

दिग्विजय का यहां भी,

अर्ध गोलाकार लकड़ी पर

टिके हैं पांव, पीठ पर कसी है जीन

कान खड़े हैं सन्नद्ध

यदि उछलकर बैठ जाए

कोई छोटा सवार

तो हिलने लगता है पूरा शरीर

आगे-पीछे, खिसकता एक इंच भी नहीं

चाहे जितना कान उमेठो

कोड़े लगाओ, रहेंगे इसी तरह।

घोड़े, जो वास्तव में

कभी घोड़े हुआ करते थे

बाहर खड़े हैं, देख रहे हैं कौतुक

अपने-अपने खेमों में बंटे

अपने शागिदों का।

वे अपने-अपने भोंपू लिए

आग उगल रहे हैं एक-दूसरे के खिलाफ

काठ के घोड़ों की तारीफ में

रंगे जा रहे हैं अखबार...

साप्ताहिक, मासिक, त्रैमासिक।

जितना हिलते हैं घोड़े

उससे कहीं अधिक

विज्ञापित होती है

उनकी सृजनशीलता

पुरस्कृत होते हैं वे

खेमे के जोर-दबाव में हर बार

झुक जाते हैं निर्णायक

प्रचार-तंत्र के सामने।

एक अरसा हो गया जब

घोड़े सरपट दौड़ लगाते थे

उछल कर पार कर जाते थे

खाइयां.... खोल देते थे

प्रगति के अवरुद्ध मार्ग,

जो कभी घोड़े हुअा करते थे

अब केवल हिनहिनाया करते हैं

और काठ के घोड़े

रच रहे हैं इतिहास।

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