वे गरीबी देखने के अभ्यस्त हो गए हैं


-तेजिन्दर, प्रसिद्ध साहित्यकार

पिछले दिनों प्रसिद्ध साहित्यकार श्री तेजिन्दर की नवीन कृति "डायरी सागा-सागा" प्रकाशित हुई। (प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन प्रा.लि., 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली-110002, मूल्य-150 रु. व पृष्ठ-83) इस पुस्तक में उन्होंने गरीबी, भुखमरी, कुपोषण आदि का पर्याय बन चुके उड़ीसा के कालाहांडी और बलांगीर की चिंताजनक स्थिति का विशद् वर्णन किया है। सरकारी सेवा में रहते हुए भी श्री तेजिन्दर की अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। 1971 से लेखन क्षेत्र में सक्रिय श्री तेजिन्दर वर्तमान में दूरदर्शन केन्द्र, देहरादून के निदेशक हैं। यहां प्रस्तुत हैं उनसे हुई बातचीत के मुख्य अंश-

जिन लोगों पर गरीबों के उत्थान की जिम्मेदारी होती है, जैसे सरकार, नेता, अधिकारी; क्या उन्हें इनकी कोई चिंता नहीं है?

राजनीतिक लोग प्रशासन को अपने पक्ष में कर लेते हैं। नौकरशाही, राजनीतिज्ञ, मीडिया व बाहर से आए हुए लोगों का वहां "दबाव गुट" है। इनकी आपसी गुटबन्दी वहां काम कर रही है। इन्हें केवल अपने हितों की ही चिन्ता है। कालाहांडी की चिंता किसी को नहीं है।

"डायरी सागा-सागा" लिखने की प्रेरणा कहां से मिली?

मेरी पहली नियुक्ति संबलपुर (उड़ीसा) में हुई थी। मुझे वहां काफी घूमने का मौका मिला। कालाहांडी, बलांगीर के बारे में काफी सुना था, इसलिए वहां के बारे में जानने की बहुत उत्सुकता थी। वहां मैंने इतनी गरीबी देखी कि क्या बताऊं, मन को बहुत पीड़ा पहुंची। वहां की गरीबी व भुखमरी के बारे में जो सुना था, उससे कहीं ज्यादा वहां दिखा। लेकिन नेताओं, वरिष्ठ नागरिकों, प्रशासनिक अधिकारियों व पत्रकारों से बात करने पर ऐसा लगा मानो उन्हें इस बात की कोई चिन्ता नहीं है। वे गरीबी देखने के अभ्यस्त हो गए हैं। जहां तक लेखन की बात है तो वह प्रेरणा भीतर से ही आती है। मुझे ऐसे लेखक पसंद हैं, जिन्होंने आदमी के द्वारा आदमी के शोषण पर कुछ कहने की कोशिश की है। मैं भी उनके साथ हूं। मैंने तुरन्त फैसला किया कि इस समस्या पर जरूर लिखूंगा। मैं जानता हूं कि एक लेखक मुद्दों को प्रकाश में लाने का काम करता है, उस पर अमल करना प्रशासनिक अधिकारियों व सरकारों का काम है। इसलिए पुस्तक लिखकर मैंने अपना काम कर दिया। मैं तो इन लोगों पर एक उपन्यास लिखना चाहता था, लेकिन फिलहाल वह संभव नहीं हो पाया।आप भावुक हृदय लेखक हैं।

आपका क्या कहना है, गरीबी कैसे दूर होगी?इसके लिए कारणों की तह में जाना होगा। कालाहांडी में साधनों की कमी नहीं है, इलाका विकसित है, उसका लाभ स्थानीय लोगों को मिलना चाहिए। पर बाहर के लोग आकर, लाभ कमाकर चले जाते हैं। सिख, मारवाड़ी, जैन व सिंधी लोग वहां बड़े आराम से कोठियां बनाकर रह रहे हैं। स्थानीय लोगों का खूब शोषण करते हैं, कहते हैं कि ये लोग अनपढ़ व गंवार हैं।

मैंने तुरन्त फैसला किया कि इस समस्या पर जरूर लिखूंगा। मैं जानता हूं कि एक लेखक मुद्दों को प्रकाश में लाने का काम करता है, उस पर अमल करना प्रशासनिक अधिकारियों व सरकारों का काम है। इसलिए पुस्तक लिखकर मैंने अपना काम कर दिया। मैं तो इन लोगों पर एक उपन्यास लिखना चाहता था, लेकिन फिलहाल वह संभव नहीं हो पाया।

आप भावुक हृदय लेखक हैं। आपका क्या कहना है, गरीबी कैसे दूर होगी?

इसके लिए कारणों की तह में जाना होगा। कालाहांडी में साधनों की कमी नहीं है, इलाका विकसित है, उसका लाभ स्थानीय लोगों को मिलना चाहिए। पर बाहर के लोग आकर, लाभ कमाकर चले जाते हैं। सिख, मारवाड़ी, जैन व सिंधी लोग वहां बड़े आराम से कोठियां बनाकर रह रहे हैं। स्थानीय लोगों का खूब शोषण करते हैं, कहते हैं कि ये लोग अनपढ़ व गंवार हैं।

क्या मीडिया की भूमिका भी उपेक्षापूर्ण है?

हां, आमतौर पर ऐसा ही है! जिलाधिकारी जिस अखबार को विज्ञापन देता है, वह उसी का हो जाता है। वहां छोटे-छोटे अखबार यही काम कर रहे हैं।

इन दिनों क्या लिख रहे हैं?

"टिहरी के बहुगुणा" पर मैं काम कर रहा हूं। साल के अन्त तक यह पूरा हो जाएगा।

प्रस्तुति: मनोज गहतोड़ी

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