अंक-सन्दर्भ, 1 मई, 2005
पञ्चांग
संवत् 2062 वि.
वार
ई. सन् 2005
ज्येष्ठ कृष्ण 6
रवि
29 मई
,, ,, 7
सोम
30 ""
,, ,, 8
मंगल
31 ,,
,, ,, 9
बुध
1 जून
,, ,, 11
गुरु
2 ""
,, ,, 12
शुक्र
3 ""
,, ,, 13
शनि
4 ""
नया दिल- कितना भरोसेमंद?
आवरण कथा के अन्तर्गत श्री तरुण विजय का आलेख "मुहब्बत का मौसम" पढ़ा। प्रचारित हुआ कि क्रिकेट के खेल में दीवानगी के कारण पाकिस्तान के फौजी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने भारत की यात्रा की। उनकी खेल भावना से हम सब अभिभूत हो गए। माहौल भी बदला है और बात दोस्ती की हो रही है। अच्छा हो कि ऐसे माहौल में पाकिस्तान द्वारा कश्मीर में खेला जा रहा खूनी खेल भी रूक जाए। अगर ऐसा होता है तभी सिद्ध होगा कि "खेल प्रेमी" मुशर्रफ एक "नए दिल" के साथ भारत आए थे।
-राजेश कुमार1/11552-बी, गली सं. -1,
सुभाष पार्क विस्तार, नवीन शाहदरा (दिल्ली)
लगता है परवेज मुशर्रफ क्रिकेट के बहाने भारत के साथ नया पैंतरा खेल रहे हैं। वे कहते हैं उनका दिल नया है लेकिन वास्तव में उसकी धड़कनें वही पुरानी हैं, जो कश्मीर-कश्मीर की रट लगाता है। पाकिस्तान ऊ‚पर से तो प्यार भरी बातें करता है लेकिन उसके दिल में जहर भरा हुआ है। यदि पाकिस्तानी नेता हृदय से चाहें तो भारत में जम्मू-कश्मीर में खून की होली रुक सकती है। परन्तु पाकिस्तानी नेताओं के व्यवहार से लगता नहीं है कि वे इस पक्ष में हैं।
-हेमन्त सिंह2/28 डी.एम. कालोनी,
बुलन्दशहर (उ.प्र.)
क्रिकेट के बहाने पाकिस्तानी राष्ट्रपति मुशर्रफ भारत आए। किन्तु उन्होंने क्रिकेट के लिए समय कम निकाला और वे यहां के नेताओं के साथ गपियाने में ही लगे रहे। उन्होंने हुर्रियत के नेताओं से भी बातचीत की। उनके दिल्ली आगमन पर करोड़ों रुपया पानी की तरह बहा दिया गया। पिछली राजग सरकार के समय भी आगरा शिखर वार्ता के लिए कुछ इसी तरह का खर्च किया गया था, लेकिन हुआ क्या? इसलिए भारतीय नेतृत्व को बहुत सोच-समझकर कदम उठाना चाहिए।
-विनोद कुमार शर्मा
ग्रा.-भूरा, मुजफ्फरनगर (उ.प्र.)
समझ से परे
भारत और पाकिस्तान के बीच बदलते माहौल में हजारों पाकिस्तानी क्रिकेट-श्रृंखला देखने भारत आए। दोनों ओर के बुद्धिजीवी, कलाकार तथा व्यापारियों का आवागमन शुरू हुआ। हमारी सरकार तथा मीडिया ने तो लगभग एक मास तक मुशर्रफ के भारत आने को लेकर कशीदे पढ़े। उनकी आवभगत में शाही होटलों में आलीशान दावतें दी गईं। किन्तु वे तथा वहां के सभी नेता निरंतर वही पुराना कश्मीरी-राग पंचम स्वर में अलापते रहे। नि:संदेह भारत-पाकिस्तान के मध्य कई महत्वपूर्ण निर्णय हुए हैं किन्तु लंबे समय से अपने देश में ही शरणार्थी बनकर शिविरों में नारकीय जीवन जीने को विवश, कश्मीरी हिन्दुओं के लिए किसी ने भी अपनी जुबान तक नहीं खोली। इसलिए भारत के कूटनीतिज्ञों एवं राजनेताओं का सीमा से अधिक उत्साहित होना समझ से परे है।
-राम सहाय जोशी 28, अहलूवालिया बिÏल्डग,
अम्बाला छावनी (हरियाणा)
मुखपृष्ठ पर "मुहब्बत का मौसम" शीर्षक पढ़कर आश्चर्य हुआ। क्या दूसरे को भाषा का उपदेश देने में ही हमारी बहादुरी है? इसका शीर्षक हिन्दी में यह भी हो सकता था- "स्नेह का वातावरण", "स्नेह का समीर" या "स्नेह तरंग"। पाञ्चजन्य को दुविधा वाले चरित्र से बचना चाहिए, क्योंकि यह हमारे भाव विचार एवं भाषा-दोनों का प्रतिनिधि है। स्व. विष्णुकांत शास्त्री की स्मृति में अच्छी सामग्री प्रस्तुत की गई है।
-त्रिनाथ शास्त्री
प्रभात आश्रम, मेरठ (उ.प्र.)
पिछले 57 वर्षों में पाकिस्तान ने एक भी ऐसा काम नहीं किया है, जिसके आधार पर उस पर भरोसा किया जाए। कुछ वर्ष पूर्व दोस्ती के लिए किए गए सारे प्रयासों को राष्ट्रपति मुशर्रफ ने मिट्टी में मिला दिया और अपनी तोपों के मुंह हमारी ओर खोल दिए। दिल्ली यात्रा के समय उन्होंने कहा इस बार वे नया दिल लेकर आए हैं। एक क्षण के लिए मान भी लें तो अब क्या गारंटी है कि वापस जाकर वे इसी दिल से चिपके होंगे। सरकार यह बताए कि आखिर क्यों कश्मीर के अलगाववादी हुर्रियत नेताओं को मुशर्रफ से मिलने की अनुमति दी गई? अगर यह सही कदम है तो फिर कश्मीर से निकाले गए हिन्दुओं को क्यों नहीं दिल्ली बुलाया गया और उनकी चिंता भारत सरकार कभी क्यों नहीं करती?
-प्रो. लक्ष्मीकांता चावला
उपाध्यक्ष, पंजाब भाजपा,अमृतसर (पंजाब)
ब्लेयर की जय-जयकार
टोनी ब्लेयर की हुई, फिर से जय-जयकार
लेबर के सम्मुख मिली, बाकी सबको हार।
बाकी सबको हार, मगर इक झटका खाया
सीट घटी, वोटों का प्रतिशत भी कम आया।
कह "प्रशांत" अब जरा संभल कर चलना होगा
अमरीकी हां जी-हां जी से बचना होगा।।
-प्रशांत
सूक्ष्मिका
रोजगार
बेरोजगारी,
हटाने के वादों ने,
उन्हें मंत्री बना दिया...
उन्हें मंत्री बना दिया... !
-मुकेश त्रिपाठी
खेरमाई के सामने, लखेरा, कटनी (म.प्र.)
"प्रेम-युद्ध"
संपादकीय "उन्हें अब जायदाद की आस, शेष देश से दूरियां" और आवरण कथा अच्छी लगी। मित्रता का सारा माहौल दोनों ओर के केवल मुसलमानों के लिए है। पाकिस्तान तो इस्लामी देश है ही, भारत भी बिना किसी अस्मिता वाला, मुसलमानों के सामने झुकते रहने वाला देश है। मुहब्बत के युद्ध में शस्त्र नहीं चलाना पड़ता। दुश्मन प्रेम से वह सब कुछ बिन मांगे ही दे देता है जिसकी हमें चाह होती है।
-श.द. लघाटे संकट मोचन आश्रम
रामकृष्ण पुरम, नई दिल्ली
मुशर्रफ ने इस बार आतंकवाद रोकने के संबंध में कोई भरोसा देने की भी जरुरत नहीं समझी, जैसा उन्होंने आगरा में किया था। वस्तुत: भारत सरकार आतंकवाद को मुद्दा बनाने में ही असफल रही। कश्मीर तो पहले ही पाकिस्तान पोषित आतंकवाद का शिकार था, अब उत्तर-पूर्व भी झुलस रहा है।
भारत के 54 सैनिक व अधिकारी, जो 1971 से पाकिस्तानी जेलों में सड़ रहे हैं, उनके बारे में भारत सरकार मुशर्रफ से कोई आश्वासन नहीं पा सकी। भारत के साथ व्यापार के मामले में भी जनरल गंभीर नहीं हैं। अन्तरराष्ट्रीय श्रोताओं के सामने तो जनरल केवल कश्मीर को एकमात्र विवादित मुद्दा बताते हैं, पर अपने देश में मुस्लिम लीग के सत्तारूढ़ धड़े के सम्मेलन में उन्होंने कहा था- "कश्मीर के हल के बाद भी भारत के खिलाफ कम तीव्रता की जंग जारी रह सकती है"। संप्रग सरकार ने उनसे इस बारे में कोई स्पष्टीकरण भी मांगना उचित नहीं समझा।
-अजय मित्तल
खंदक, मेरठ (उ.प्र.)
सज्जनता के प्रतिरूप थे
आचार्य विष्णु कान्त शास्त्री के आकस्मिक निधन से उन सभी लोगों के लिए गहरी क्षति हुई है, जो भारतीयता और नैतिकता के पक्षधर थे। आचार्य जी सादगी और सज्जनता के प्रतिरूप थे। राज्यपाल जैसे पद पर पहुंचने के बाद भी उन्होंने अपनी सादगी कभी नहीं छोड़ी।
-विशाल कुमार जैन 184, कटरा मशरू, दरीबा कलां,
चांदनी चौक (दिल्ली)
आचार्य विष्णु कान्त शास्त्री के निधन से हमें बड़ा दु:ख हुआ। वे स्वयं जम्मू-कश्मीर मूल के थे। लाखों विस्थापित बन्धुओं की दुर्दशा से पीड़ित थे। वह जम्मू स्थित शरणार्थी शिविरों में भी गए थे। कश्मीर की हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने में उनका योगदान था। सरस्वती पुत्र शास्त्री जी को हमारी हार्दिक श्रद्धाञ्जलि।
-प्रो. चमनलाल सप्रू सम्पादक, कोशुर समाचार 80-डीलक्स अपार्टमेंट,
वसुन्धरा एनक्लेव (दिल्ली)
शास्त्री जी पर अच्छी सामग्री है। अंक संजोकर रखने योग्य है। वैसे तो पाञ्चजन्य का हर अंक ही संजोने योग्य होता है। श्रेष्ठ सम्पादन के लिए बधाई। आपने अपने संस्मरण में कोबरा सांप का उल्लेख किया है। पर यह नहीं बताया है कि उसे किसी ने मारा या नहीं। न मारना ही ठीक है।
-आनन्द मिश्र "अभय" सम्पादक ,
राष्ट्रधर्म (मासिक) संस्कृति भवन, राजेन्द्र नगर,लखनऊ‚ (उ.प्र.)
0 उस सांप को बाद में जंगल में छोड़ दिया गया -सं.
शुभ संकेत नहीं
सम्पादकीय "बर्बर बंगलादेश और बहादुर हम" अच्छा लगा। सीमा सुरक्षा बल के सहायक कमांडेंट जीवन कुमार की हत्या बंगलादेश रायफल्स के गुण्डों ने ऐसे समय पर की है जब भारत अपने पड़ोसियों से संबंध सुधारने का जी-तोड़ प्रयास कर रहा है। भारत सरकार इस मामले का कड़ा विरोध करे, इसे अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर ले जाए और बंगलादेश को विश्व शान्ति के शत्रु के रूप में प्रचारित करे।
-चन्द्रकान्त यादव
चन्दौली (उ.प्र.)
वंचितों के लिए आगे आएं
निजी क्षेत्र में आरक्षण के सन्दर्भ में श्री प्रेमचन्द्र का आलेख "जो कहते हैं जरुरी है, उन्हें भी लागू करने में दिलचस्पी नहीं" पढ़ा। निजी क्षेत्र में वंचितों के लिए आरक्षण होना चाहिए या नहीं, यह कोई नया प्रश्न नहीं है। संप्रग के प्रमुख घटक दल कांग्रेस ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में प्रमुखता से निजी क्षेत्र में आरक्षण की वकालत की तथा चुनाव में सफलता प्राप्त की। इसके विपरीत राजग के प्रमुख घटक दल भाजपा ने अपने छह साल के शासन काल में अनुसूचित जाति, जनजाति तथा दलितों के आरक्षण में कटौती की। इसका एक उदाहरण केन्द्रीय विद्यालयों में प्रधानाचार्य के पद को कानून बनाकर आरक्षण मुक्त करना था। साथ ही सरकारी पदों को, जो कि आरक्षण के माध्यम से भरे जाने थे, को यह कहकर कि दलित वर्ग में इन पदों के लिए उपयुक्त उम्मीदवार नहीं हैं, सामान्य श्रेणी घोषित कर दलितों के आरक्षण को समाप्त करने की साजिश रची गई। कुछ दिन पूर्व देश के प्रमुख औद्योगिक समूह "फिक्की" ने भी उद्योग जगत में आरक्षण को अव्यवहारिक कहकर कटुता बढ़ाने का प्रयास किया है। हम संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत की स्थायी सदस्यता की वकालत करते हैं तथा अन्य देशों से समर्थन का आग्रह करते हैं, आने वाली सदी में विश्व का मुखिया बनाना चाहते हैं और अमरीका का मुकाबला करना चाहते हैं। परन्तु अपने देश में अमरीका की तर्ज पर कानून बनाने में हिचकते हैं। वहां का श्वेत वर्ग, जो शासक वर्ग है, अश्वेतों को सभी प्रकार की समानता से दूर रखते थे। अश्वेत लोगों ने संघर्ष कर वहां सरकारी व निजी क्षेत्रों में आरक्षण प्राप्त किया तथा अमरीका को विश्व में शक्तिशाली बनाने में योगदान किया। आज भारत में भी दलितों के लिए निजी क्षेत्र में आरक्षण हो, इस मुद्दे पर जो संगठन, संस्था, पार्टी, व्यक्ति एक मत हैं और जो विश्व में सबसे शक्तिशाली भारत के निर्माण में योगदान देना चाहते हैं, को सब धर्मसंकटों को छोड़कर दलितों के लिए आगे आना होगा। निजी क्षेत्र में भी दलितों के लिए आरक्षण लागू हो, इस विषय पर खुले मन से तथा सही दिशा में कार्य करने की आवश्यकता है।
-रोशन लाल कनवाड़िया
डी. 812, मादीपुर कालोनी (नई दिल्ली)
कृपया इतिहास पलटें
वार्ता-वार्ता और लगातार वार्ताएं। पाकिस्तान के साथ वार्ता का अर्थ है कुछ न कुछ खोना, और हम उन्हीं वार्ताओं में खोकर शान्ति ढूंढ रहे हैं। अलगाववाद और आतंकवाद को वार्ता के माध्यम से खत्म करने की चाह में हमारे नेता अब तक अरबों रुपयों के साथ-साथ हजारों बेगुनाह लोगों की मौतों के बाद भी उसे खत्म नहीं कर पाए हैं। पाकिस्तान ने कई बार भारत पर युद्ध थोपा और वही हारा भी। फिर भी उसके साथ वार्ताओं के दौर चलते रहे। परन्तु पाकिस्तान अपनी हरकत से बाज नहीं आया और वह लगातार आतंकवाद को समर्थन देकर भारत माता को लहू-लुहान करता रहा।
1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तो दिल्ली-लाहौर बस यात्रा शुरू करवाई और स्वयं बस द्वारा लाहौर जाकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से शिखर वार्ता की। परन्तु अपनी आदतानुसार पाकिस्तान ने कारगिल में अघोषित युद्ध छेड़ दिया, जिससे हमारे सैकड़ों जवान व अधिकारी शहीद हुए और करोड़ों रुपयों की हानि हुई। ऐसा लगता है कि बार-बार धोखा खाकर भी हमने सबक न सीखने का प्रण कर रखा है। पुन: आगरा में श्री वाजपेयी द्वारा राष्ट्रपति मुशर्रफ से शिखर वार्ता की गई, परन्तु क्या हुआ?
कांग्रेस के नेतृत्व में संप्रग सरकार के बनते ही इसी समझौतावादी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए विभिन्न स्तरों पर पुन: वार्ताओं के दौर जोर-शोर से आरम्भ किए गए। ऐसा लगता है कि कांग्रेस एक वर्ग विशेष को खुश करने के लिए पाकिस्तान के समक्ष समर्पण को पूरी तरह तैयार है। तभी तो जम्मू-कश्मीर में निरन्तर हिन्दुओं के पलायन व नरसंहार के बावजूद पाकिस्तान के दबाव में सेना कुछ जगहों से हटायी गयी और मुशर्रफ साहब को दिल्ली आमंत्रित कर उनकी आवभगत की गई।
इतिहास साक्षी है कि इन सबका परिणाम कुछ नहीं निकलने वाला है। उल्टे इन आयोजनों व समझौतों द्वारा न जाने कितने आई.एस.आई. के गुण्डे हमारे देश में घुसकर गुम हो गए हैं। अवसर देखकर वे न जाने कब कहां कोहराम मचा दें? फिर हम संसद पर हुए हमले की भांति केवल निन्दा प्रस्ताव पारित करते रह जाएंगे। अत: जब तक पाकिस्तान अपने यहां चल रहे आतंकवादी शिविरों को समाप्त नहीं करता और हमारे यहां आतंकवादी घटनाओं को बढ़ावा देना बन्द नहीं करता, तब तक उसके साथ किसी भी स्तर पर वार्ता करना तो दूर, किसी भी प्रकार के सांस्कृतिक, व्यापारिक व राजनीतिक सम्बन्धों पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाना ही होगा।
-यति नरसिंहानन्द सरस्वती
हिन्दू बचाओ मोर्चा
गाजियाबाद (उ.प्र.)ाप
NEWS