सच क्या है?


आलोक गोस्वामी

क्या नेताजी की मृत्यु 18 अगस्त, 1945 को हवाई दुर्घटना में ताइवान में हुई थी?

ताइवान ने कहा-नहीं। तो रेंकोजी मंदिर (जापान) में किसकी अस्थियां रखी हैं?

नेताजी रूस में थे, भारत सरकार ने जांच क्यों नहीं की?

मुखर्जी आयोग के काम में अड़चनें क्यों पैदा की जा रही हैं?

प्रधानमंत्री कार्यालय से गोपनीय दस्तावेज कहां गायब हुए?

(23 जनवरी, 1897 -)

60 साल। एक लम्बा समय। 18 अगस्त, 1945.... और उसके बाद का एक-एक दिन रहस्य को और गहराता गया है। विरोधाभासी खबरें, प्रत्यक्षदर्शियों के "बयान" और घटनाक्रम का अलग-अलग ब्यौरा। एक नहीं, दो-दो आयोगों में साक्ष्यों की "परख" और उसके बाद नतीजा (?)। लेकिन सच फिर भी छुपा रहा.... या छुपाया जाता रहा। जब सत्ता अधिष्ठान और उसका नौकरशाह तंत्र एक खास निर्देश के अनुसार काम करता है तो सत्य का अन्वेषण आसान नहीं होता।

क्या है सच? नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन के अंतिम दिनों का सच! 18 अगस्त, 1945 की दोपहर जिस हवाई जहाज में नेताजी ने अपने निकट सहयोगी हबीबुर्रहमान और जापानी सैन्य अधिकारियों के साथ ताइहोकू (अब ताइवान) से उड़ान भरी और जो कुछ ही पलों बाद तकनीकी खराबी के कारण दुर्घटनाग्रस्त हो गया क्या उसी के साथ नेताजी के जीवन का अंत हो गया था? भारत सरकार ने शुरुआती सवालों से किनारा करने के लिए 1956 में एक रस्मी शाहनवाज आयोग गठित किया। निष्कर्ष निकला-दुर्घटना में मौत। सवाल तब भी खड़े होते रहे। नेताजी के भाई सुरेश बोस मानने को तैयार नहीं थे कि नेताजी की इस तरह मृत्यु हो सकती थी। गांधी जी ने भी एकाध बार इशारा किया कि मानो नेताजी जीवित थे।

नेताजी रहस्यगाथा-1

सुभाष बोस मरे नहीं हैं। वे इस तरह नहीं मर सकते।

-मोहनदास करमचंद गांधी,

दिसम्बर, 1945

नेताजी सुभाष बोस की मृत्यु से जुड़ा प्रश्न, मुझे लगता है, किसी भी शंका से परे, सुलझ चुका है।

-संसद में जवाहरलाल नेहरू का वक्तव्य,

मार्च, 1952

आप मुझे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु का प्रमाण भेजने को कह रहे हैं। मैं आपको कोई निश्चित और सीधा प्रमाण नहीं भेज सकता।

-नेताजी के भाई सुरेश बोस को लिखे पत्र में जवाहरलाल नेहरू,

1962

प्रधानमंत्री (नेहरू) को मुद्दों पर अपनी राय पहले ही बना लेने की आदत है।

-संसद में अटल बिहारी वाजपेयी,

नवम्बर, 1963

1978 में प्रधानमंत्री (मोरारजी देसाई) के बयान के बाद, लगता है, कोई सकारात्मक कोशिश नहीं हुई है.... क्योंकि इस ओर न तो कोई गंभीर प्रयास किया गया है और न ही कोई नई जांच हुई है। लगता है, समय-समय पर इसमें बाधाएं आई हैं और आम जनता संतुष्ट नहीं है।

-कलकत्ता उच्च न्यायालय की टिप्पणी,

3 अप्रैल, 1998

1970 में खोसला आयोग बैठा। 1977 में सरसरी सरकारी जांच-पड़ताल के बाद फैसला उस समय की मोरारजी देसाई सरकार को सौंपा गया कि हां, उसी दुर्घटना में मौत हुई। लेकिन बहस चलती रही, नेताजी के अनुयायी और समर्थक निश्चित निष्कर्ष ढूंढने की मांग उठाते रहे। 1998 में एक याचिका के संदर्भ में जब कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कहा कि जांच बेमन से हुई, ठोस सबूत नहीं जुटाए गए तो तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने मई, 1999 में तीसरा आयोग न्यायमूर्ति एम.के. मुखर्जी आयोग गठित कर दिया, जो अब भी जांच कर रहा है और सबूत जुटा रहा है।

इस बीच ताइवान की सत्ता से संपर्क सधा और पता चला कि 18 अगस्त क्या उसके आस-पास भी इस तरह की कोई दुर्घटना हुई ही नहीं थी। रहस्य गहरा गया और उन सूचनाओं पर भरोसा जमने लगा कि 1945 के बाद नेताजी रूस के मंचूरिया नामक स्थान पर देखे गए थे। लेकिन जवाहरलाल नेहरू सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की थी। सवाल उठता है कि नेताजी की मृत्यु ताइवान में नहीं हुई थी तो उनके कथित अंतिम संस्कार के बाद रेंकोजी मंदिर (जापान) में किसकी अस्थियां रखी हुई हैं? इस बीच 1953 और उसके कुछ वर्ष बाद तक की अति महत्वपूर्ण गोपनीय फाइलें प्रधानमंत्री कार्यालय जैसी अत्यंत सुरक्षित जगह से गायब कर दी गर्इं। नाम आता है पं. नेहरू के विश्वासपात्र और सहयोगी मोहम्मद यूनुस का। लेकिन अफसोस यह है कि युनूस के इंतकाल के साथ ही वह रहस्य भी दफन हो गया।

अब जो मुखर्जी आयोग जांच कर रहा है, उसके काम में सरकारी अड़चनें पैदा की जा रही हैं। उन्हें बार-बार कहने के बाद ताइवान और जापान जाने की अनुमति दी गई। रूस जाने के लिए 3 साल से न्यायमूर्ति मुखर्जी सरकार से अनुमति मांग रहे हैं, पर किसी न किसी बहाने उन्हें जाने ही नहीं दिया जा रहा है। रूस में नेताजी के जीवन के महत्वपूर्ण सुराग मिलने की पूरी उम्मीद है। आयोग का कार्यकाल तक बढ़ाने की बात पर मनमोहन सरकार द्वारा भवैं तान ली गर्इं। लेकिन जबरदस्त जनाक्रोश और राष्ट्रपति की दखल के बाद पहले नवम्बर, 2004 में और अब मई, 2005 में छह-छह महीने के लिए कार्यकाल बढ़ाया गया। इस बार तो यहां तक कह दिया गया कि इसके आगे कार्यकाल नहीं बढ़ाया जाएगा, बजट की मामूली ही दिया है।

दूसरे विश्व युद्ध के अंतिम दौर में घटी भारत के इतिहास को प्रभावित करने वाली इस घटना की गुत्थियां इतनी उलझी हुई हैं कि जब तक पूरा सहयोग न मिले, रास्ता मिलना मुश्किल है। हिन्दुस्तान टाइम्स के पत्रकार अनुज धर और पायनियर के जुझारू पत्रकार उदयन नम्बूदिरी ने सच की खोज में अभियान छेड़ा हुआ है। उदयन तो सीधे-सीधे नेहरू-गांधी परिवार को इस सबका दोषी ठहराते हैं। 1939 में नेताजी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से पं. नेहरू के व्यवहार से खिन्न होकर ही इस्तीफा दिया था। अनुज धर ने तो पांच साल की कड़ी मेहनत के बाद एक पूरी पुस्तक "बैक फ्राम डेड-इनसाइड द सुभाष बोस मिस्ट्री" (मानस पब्लिकेशन्स, दरियागंज, दिल्ली, पृष्ठ-402, मूल्य-495/-रु.) ही लिखी है। इसमें नेताजी के जीवन से जुड़े रहस्यों का बारीक विश्लेषण और तमाम आयोगों की कार्रवाइयों का विस्तृत ब्यौरा दिया है।

हम नेताजी की मृत्यु के रहस्य की परतें एक-एक करके आपके सामने रखते जाएंगे। सूत्र जुड़ने के बाद परिणाम की खोज करेंगे।

(जारी....)

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