सरोकार


मेनका गांधी, सांसद, लोकसभा

बौद्ध और शाकाहार-1

शाकाहारी ही उत्तम

हाल ही में एक महिला ने मुझे पत्र में लिखा था। उसमें उसने बताया कि वह बौद्ध है, शाकाहारी है, परन्तु उसके ससुराल वालों ने विवाह के बाद बताया कि बौद्ध लोग मांस खा सकते हैं, वे दलित जो बौद्ध बन गए हैं मांसाहारी होते हैं। भारत में रह रहे तिब्बती न केवल मांस खाते हैं बल्कि खुद मैंने कई बार दलाई-लामा को लद्दाख में पशुओं को बांध कर पहाड़ी से फेंकते हुए चित्रों सहित पत्र लिखे हैं। बौद्ध अथवा जैन लोगों को मांस खाते देखकर अधिक निराशा होती है। मुझे लगता है कि हम सभी मत-पंथों से अनूकूल बातें ही लेते हैं। प्रत्येक पंथ के संस्थापक-पारसी के जरथ्रुष्ट, इस्लाम के पैगम्बर मोहम्मद, ईसाई के ईसा मसीह, जैन पंथ के महावीर, बौद्ध मत के गौतम बुद्ध-सभी शाकाहारी थे। सोचने की बात है, आप सर्वशक्तिमान की सृष्टि का अनादर कर उसके निकट कैसे आ सकते हैं?

मैं "बौद्ध पंथ तथा शाकाहार" विषय पर कुछ प्रश्न और उनके उत्तर दे रही हूं जिनसे सिद्ध होग कि अधिकांश बौद्ध मांसाहारी नहीं हैं।

क्या बौद्ध मतावलम्बियों को अपने पंथ के सिद्धांतों के अनुसार शाकाहारी होना चाहिए?

बौद्ध मत व्यापक हिंसा तथा पशु वध के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया के रूप में प्रारम्भ हुआ। गौतम बुद्ध अपने अहिंसा के सिद्धान्त से इसे समाप्त करना चाहते थे। इसलिए शाकाहारी व्यवहार बौद्ध मत से जुड़ा प्रतीत होता है। इस पर अगर कोई भी विवाद है तो वह बौद्ध ग्रंथों की गलत व्याख्या किए जाने के कारण है। बुद्ध ने ऐसे पशु के मांस के उपभोग पर प्रतिबंध लगाया था जिस पर भिक्षु के लाभार्थ मारे जाने के बारे में "देखा, सुना अथवा संदेह" हो। इसके परिणामस्वरूप, बौद्ध मत का पहला विचार किसी जीवित प्राणी को जान-बूझकर चोट पहुंचाए जाने अथवा हत्या करने से रोकने वाला है। किसी जीवित प्राणी को मारने तथा पशु का मांस खाने के बीच अंतर किए जाने का प्रयास होना चाहिए।

बुद्ध के शब्दों को समझने के लिए, उन्हें उनके समय के संदर्भ में देखते हैं। तब बुद्ध के अनुयायी भिक्षु थे-जो भिक्षा मांगते थे। वे मांस तथा शाकाहारी भोजन के मध्य चयन नहीं कर सकते थे। यदि कोई गृहस्वामी मांस ही देता तो उसे स्वीकार कर लेते थे। ऐसी किसी पेशकश को अस्वीकार करना आतिथ्य के प्रति अपराध था। इससे न गृहस्वामी को पुण्य मिलता था न पशु को लाभ, क्योंकि वह तो मृत था। इन परिस्थितियों में यह प्रावधान था कि यदि किसी भिक्षु ने यह नहीं देखा, सुना अथवा संदेह किया कि दिया गया मांस उसको देने हेतु मारे गए पशु का है तो उसे "दोषहीन" कहा जा सकता है।

अब उसी तर्क को आज के आम बौद्ध एक तार्किक मार्गदर्शन के रूप में लेते हैं। अब भोजन हेतु घर-घर भिक्षा नहीं मांगी जाती बल्कि इसे स्वयं खरीदा तथा तैयार किया जाता है जिसमें विकल्प, क्रिया तथा मंशा शामिल होती है। मांस खरीदते समय आप पशु को नहीं मारते परन्तु आप मारने के लिए पैसा देते हैं। आपके पैसे से कसाई का व्यापार चल रहा है। यह "दोषहीन" मांस हेतु निर्धारित की गई शर्तों का स्पष्ट उल्लंघन है और क्षति न पहुंचाने के बौद्ध सिद्धांत के विपरीत है। अब बौद्ध भोजन के लिए भिक्षा पर निर्भर नहीं होते इसलिए वे भोजन चुनने को स्वतंत्र हैं, उन्हें "अपने मत के सिद्धान्तों" के अनुरूप शाकाहार का दयालु तथा बुद्धिमत्तापूर्ण विकल्प अपनाना चाहिए।

पशु कल्याण आंदोलन में भाग लेने के इच्छुक पाठक

श्रीमती मेनका गांधी से 14, अशोक रोड,

नई दिल्ली-110001 के पते पर अथवा ढ़ठ्ठदड्डण्त्थ्र्ऋद्रठ्ठद्धथ्त्द्म.दत्ड़.त्द पर सम्पर्क कर सकते हैं।

श्रीमती मेनका गांधी

"सरोकार" स्तम्भ / द्वारा, सम्पादक, पाञ्चजन्य

संस्कृति भवन, देशबन्धु गुप्ता मार्ग, झण्डेवाला, नई दिल्ली-110055

इस स्तम्भ में हर पखवाड़े प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और शाकाहार कीे समर्पित प्रसारक श्रीमती मेनका गांधी शाकाहार, पशु-पक्षी प्रेम तथा प्रकृति से सम्बंधित पाठकों के प्रश्नों का उत्तर देती हैं। अपना प्रश्न भेजते समय कृपया निम्नलिखित चौखाने का प्रयोग करें।

NEWS