दंभी कांग्रेस
-ए. सूर्यप्रकाश, वरिष्ठ स्तम्भकार

झारखण्ड के राज्यपाल सिब्ते रजी शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाते हुए
आजादी के बाद 40-45 साल तक कांग्रेस ने इस देश पर राज किया है। इस दौरान उसने जहां तक हुआ अपने लोगों को राजभवनों में राज्यपाल बनाया। कांग्रेस ने संविधान और लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उसने जब चाहा, जहां चाहा राष्ट्रपति शासन लागू किया और विरोधी दलों की सरकारों पर बार-बार प्रहार किया।
1980 में श्रीमती इंदिरा गांधी दुबारा सत्ता में लौटी थीं। उस समय जनता पार्टी (बाद में भाजपा), कम्युनिस्ट पार्टियों सहित सभी विरोधी दलों ने कांग्रेस के उस रवैए का घोर विरोध करते हुए कहा था कि सरकारों को हटाने की इस दुर्नीति पर लगाम कसनी चाहिए। अंतत: एक सरकारिया आयोग स्थापित किया गया जिसने केन्द्र-राज्य संबंधों पर काफी काम किया। केन्द्र और राज्यों के बीच कैसे संबंध रहने चाहिए, इस पर आयोग ने करीब 250 सुझाव दिए। आयोग ने अपने निष्कर्ष में राज्यपालों के काम-काज की रीति-नीति पर लंबी टिप्पणी की। कारण, उस समय राज्यपालों के रवैए और काम में इतनी गिरावट आ चुकी थी कि उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय तक ने उनके विषय में कई बार टिप्पणियां की थीं। अत: मुद्दा महत्वपूर्ण था।
1993 में बोम्मई मामले में सर्वोच्च न्यायालय की नौ सदस्यीय खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसला दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जब मन चाहे किसी प्रदेश में राष्ट्रपति शासन नहीं लगाया जा सकता। हमारे संविधान की धारा 74 (2) में प्रावधान है कि केन्द्रीय मंत्रिमंडल राष्ट्रपति को किसी मुद्दे पर जो सलाह देता था, उसके बारे में कोई न्यायालय पूछताछ नहीं कर सकता। लेकिन बोम्मई मामले पर गौर करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने साफ कहा कि नहीं, हम जानना चाहेंगे कि मंत्रिमंडल ने राष्ट्रपति को क्या सलाह भेजी थी। हमें जब-जब जरूरत होगी यह जानने की, तब-तब हमारे सामने वह मसौदा पेश होना चाहिए। यानी सरकार जब चाहे धारा 356 का इस्तेमाल नहीं कर सकती, मनमानी नहीं कर सकती।
सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्देश के बाद राष्ट्रपति पर भी बाध्यता आ गई कि वे मंत्रिमंडल की संस्तुति पर यूं ही हस्ताक्षर न करें, पूरी गंभीरता से विचार करें और जरूरत हो तो राष्ट्रपति शासन का प्रस्ताव मंत्रिमंडल के पास फिर से गौर करने के लिए लौटा दें। बहरहाल, बोम्मई मामले के फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण बातें कहीं जिससे कांग्रेस के लिए एकदम से राष्ट्रपति शासन लगाना मुश्किल हो गया। न्यायालय ने तो यहां तक कहा कि किसी प्रदेश में धारा 356 लगाने के पीछे जितने कारण गिनाए गए हों, उन्हें देखा जा सकता है और संतुष्ट नहीं होने पर राष्ट्रपति शासन का आदेश न्यायालय पलट सकता है। आखिरकार धारा 356 को लेकर कांग्रेस का जो 40-45 साल से तमाशा चल रहा था उस पर कमोबेश नियंत्रण लगा है।
जब कांग्रेस के पास यह रास्ता नहीं बचा तो अपनी आदत से परेशान कांग्रेस विरोधी दलों की सरकारों को हटाने का नया रास्ता तलाशने लगी।
इधर बोम्मई फैसले के अलावा भी एक नयी परिस्थिति पैदा हुई। संविधान का 91वां संशोधन कानून आने के बाद दल-बदल पर भी रोक लगी। 1985 में हमारे संविधान में दल-बदल विरोधी प्रावधान जुड़ा। इसे 10वीं अनुसूची या दल-बदल विरोधी कानून भी कहा जाता है। इससे किसी अकेले विधायक/सांसद के दल-बदल पर प्रभावी रोक लगी, पर एक तिहाई समूह के पार्टी से अलग होने को मान्य किया गया। दूसरे, कहा गया कि किसी दल के दो तिहाई सदस्य बाहर निकलकर किसी दूसरे दल में मिल सकते हैं। पिछले 18 साल में एक समूह के टूट कर किसी दूसरे दल में मिल जाने के प्रावधान का जमकर उपयोग किया गया। भारत में पिछले 10-15 साल में अनेक छोटे-छोटे क्षेत्रीय दल उभर कर आए हैं। चार-पांच विधायकों वाले दल में से 2-3 लोग अपने दल में कोई मिला ले तो दल-बदल विरोधी कानून का उल्लंघन नहीं माना जाता।
गोवा में पिछले दिनों कांग्रेस ने नया प्रयोग किया। उसने जब देखा कि विरोधी दल में विभाजन नहीं कराया जा सकता, अपने साथ जोड़ने के लिए दो-तिहाई विधायक चाहिए जो कि गोवा के मामले में बड़ी संख्या है तो कांग्रेस ने नई चाल चली। उसने पैसे का लालच देकर विरोधी पाले से कुछ विधायकों से इस्तीफा दिलवाया। सदन से चार-पांच विधायकों को कम करने के बाद संख्या 40 से घट गई। इसके बाद कांग्रेस ने अपने पास बचे 15-16 विधायकों के बूते बहुमत जुटाने की कवायद शुरू की।
झारखण्ड में स्थिति दूसरी थी। वहां चुनाव परिणामों के तुरंत बाद विधायकों से इस्तीफा दिलवाकर अपने दल में शामिल करना कांग्रेस के लिए सहज नहीं था। वहां कांग्रेस ने अपनी सत्ता कायम करने के लिए राज्यपाल का इस्तेमाल किया। इसकी पूरी जिम्मेदारी सोनिया गांधी की है। इसमें कोई शक नहीं कि 10, जनपथ से ही सब संचालित हुआ है। राज्यपाल सिब्ते रजी ने "भाड़े के हत्यारे" की भूमिका निभाई है। प्रियरंजन दास मुंशी और अजीत जोगी की निगरानी में रांची में सारा खेल चला। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि प्रियरंजन दास मुंशी की पूरे प्रकरण में प्रमुख भूमिका है। मैं उनके व्यवहार और कामों को पिछले 30 साल से देख रहा हूं। लोकतांत्रिक मूल्यों में उनकी कभी आस्था नहीं रही है। उधर अजीत जोगी ने छत्तीसगढ़ में अपनी सरकार बचाने के लिए जो हथकंडे अपनाए थे, शायद उन्हीं को आजमाने वे रांची पहुंचे थे।
नेहरू-गांधी परिवार ने हमारे लोकतंत्र और संविधान के विरुद्ध कई गलत काम किए हैं, जो देश-विरोधी ही कहे जा सकते हैं। जहां उनके परिवार का हित सधता है, वही काम यह खानदान करता है। यही उनकी राजनीति है। इस खानदान ने सत्ता में आते ही राजभवनों में अपने लोगों को बिठाया है। नेहरू-गांधी परिवार को राजभवनों में घरेलू चाकर चाहिए।
झारखण्ड प्रकरण को बारीकी से देखें तो जान जाएंगे कि विधानसभा चुनाव के नतीजे आने से पहले ही इस कांड की रूपरेखा तय हो गई थी। पहले से ही सोच लिया गया था कि चुनाव परिणाम कुछ भी हो हम शिबू सोरेन को ही गद्दी पर बिठाएंगे। इसी योजना पर चलते हुए राज्यपाल सिब्ते रजी ने शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया। गोवा में भी तो यही किया था राज्यपाल जमीर ने। गोवा विधानसभा में सदन के अध्यक्ष की रपट तैयार होने के 24 मिनट बाद ही बहुमत प्राप्त भाजपा सरकार बर्खास्त कर दी गई थी। यह सब पहले से तय था जिसकी रूपरेखा 10, जनपथ में बनाई गई थी।
मुझे लगता है कि इन परिस्थितियों में लोकतंत्र खतरे में दिख रहा है। क्योंकि नेहरू-गांधी परिवार का लोकतंत्र से कोई लेना-देना नहीं है। उसकी मानसिकता है तानाशाही की। फिर एक और समस्या है कि इस परिवार की मुखिया एक विदेशी महिला है। अब हिन्दुस्थान के नागरिकों को होशियार रहना होगा क्योंकि देश पर संकट दिख रहा है। विदेशियों को राजनीति से दूर रखना होगा। राष्ट्रपति द्वारा राज्यपाल सिब्ते रजी को तलब किया जाना एक संकेत है कि राष्ट्रपति इस मामले पर कितनी गंभीरता से विचार कर रहे हैं। जाहिर है, राष्ट्रपति इस सब से संतुष्ट नहीं हैं। सरकारिया आयोग ने राज्यपाल के काम-काज के बारे में भी सुझाव दिए हैं, कहा है कि जब चुनाव के बाद किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिले तो राज्यपाल को सबसे अधिक सीट जीतने वाले दल या गठबंधन को सरकार बनाने का न्यौता देना चाहिए। यह एक सिद्धान्त है। लेकिन जब राज्यपाल स्थापित मूल्यों से अलग हटकर काम करते हैं तो फिर ठीक है, उन्हीं का तरीका अपनाते हुए अन्य लोगों को मैदान में उतरना पड़ेगा। फिर न तो संसद की बात होगी, न विधानसभा की और न किसी सिद्धान्त की। अगर सरकार बनाने का फैसला सड़क पर ही तय होना है तो फिर वैसा ही हो। अगर सामने वाला खुद लोकतंत्र की चहारदीवारी लांघकर काम करे तो फिर हमें भी उससे परहेज क्यों होना चाहिए। जब तक लोकतंत्र की हद में कोई बात होती है तो नागरिक के नाते संविधान और लोकतंत्र में हमारी आस्था कायम रहेगी। सिब्ते रजी ने रांची के राजभवन में जो किया, उससे लोगों का लोकतंत्र से भरोसा खत्म होता जाएगा। यह बहुत खतरनाक है। सिब्ते रजी को पद से हटाना चाहिए। लोकतंत्र के मार्ग में जिस व्यक्ति के कारण अड़चन पैदा होती हो उसे हटाना चाहिए।
श्रीमती इंदिरा गांधी के समय में संघर्ष की राजनीति बहुत तीखेपन से चली थी। इसी की वजह से उन्होंने आपातकाल लागू किया था। 2 साल उनकी खूब तानाशाही चली। मुझे लगता है कि सोनिया गांधी के दरबार में भारतीय राजनीति को फिर से संघर्ष की राजनीति की ओर मोड़ने की कोशिश हो रही है। संघर्ष होगा तो ध्यान रहे कि फिर दूसरे लोग भी चूड़ियां पहनकर नहीं बैठे हैं। फिर जो होगा सो होगा। इससे लोकतंत्र की प्रक्रिया बाधित हो जाएगी। यह गंभीरता से सोचने की बात है।
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