राष्ट्रीय आंदोलन में कम्युनिस्ट घुसपैठ का


असफल प्रयास

-रामशंकर अग्निहोत्री

पाञ्चजन्य के पूर्व सम्पादक-वरिष्ठ पत्रकार श्री रामशंकर अग्निहोत्री द्वारा लिखित पुस्तक- "कम्युनिस्ट विश्वासघात की कहानी" (प्रकाशक- लोकहित प्रकाशन, लखनऊ) में कम्युनिस्टों की नीतियों और व्यवहार के बारे में विस्तृत वर्णन किया गया था। हालांकि यह पुस्तक 40 वर्ष पूर्व प्रकाशित हुई थी परन्तु उस समय की लिखी बातें आज भी सच सिद्ध हो रही हैं। पुस्तक के संपादित अंशों की पहली कड़ी हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं। -सं.

पुस्तक "कम्युनिस्ट विश्वासघात की कहानी" का आवरण

1971 के मध्यावधि चुनाव परिणाम घोषित होने के चार दिन पूर्व सत्तारूढ़ कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष श्री जगजीवनराम ने कम्युनिस्टों की दोमुंही नीति पर अपनी नाराजी प्रकट करते हुए इसका स्पष्ट संकेत दिया कि इस चुनाव में सत्तारूढ़ कांग्रेस के साथ कम्युनिस्टों ने एक ओर समझौता किया, दूसरी ओर कई स्थानों पर उस समझौते में पलीता लगाया। कम्युनिस्टों की इस विश्वासघाती नीति से सत्तारूढ़ कांग्रेस को कितनी क्षति हुई है, इसका पता इतिहास लगाएगा, किन्तु आज की स्थिति में इतना तो साफ है कि सत्तारूढ़ कांग्रेस की टिकट पर कम्युनिस्टों का एक बड़ा वर्ग शासन सत्ता की कुर्सियों तक पहुंच गया है। भारत के बाइस वर्षीय आजाद प्रजातांत्रिक इतिहास में यह विलक्षण बात आज घटित हुई है कि जिन कम्युनिस्टों ने कांग्रेस को समाजवादी, प्रगतिशील, परिवर्तनवादी आदि-आदि तर्क देकर उछाला, वही कम्युनिस्ट पार्टी विरोधी दल की भूमिका अदा करे। सत्तारूढ़ कांग्रेस पर यह दुहरी मार है। कांग्रेस को भीतर और बाहर दोनों ओर से अपने शिकंजे में कसने का यह भीषण षडंत्र है। सम्भवत: इस षडंत्र को सत्तारूढ़ कांग्रेस के श्री जगजीवनराम जैसे पुराने दिग्गज भलीभांति पहचानते हैं। यही कारण है जो वे बेचैन हैं किन्तु क्या इस स्थिति से वे उभर सकेंगे? क्या अभी इतना समय बाकी है कि वे कम्युनिस्टों की कैंची से निकल सकें अथवा सत्तारूढ़ कांग्रेस को एक बार पुन: विभाजित करने में कम्युनिस्ट सफल होंगे और वे इन तत्वों को बदनाम कर बाहर फेंक देंगे?

गांधी जी का विरोध

महात्मा गांधी जी के नेतृत्व को उखाड़ फेंकने का सबसे पहला योजनाबद्ध प्रयत्न कम्युनिस्टों के द्वारा अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के 1922 के गया अधिवेशन में किया गया। गांधी जी कम्युनिस्टों के लिए बड़ी बाधा थे। गांधी जी की श्रद्धा और प्रेरणा का केन्द्र भारत-भूमि थी। गांधी जी भारतीयता के उपासक, धर्मनिष्ठ थे। गांधी दर्शन का आधार अहिंसा और सह-अस्तित्व था। कम्युनिस्टों को प्रारम्भ से ही भारतीयता, धर्म, सत्याग्रह आदि से चिढ़ थी। कम्युनिस्ट इसीलिए गांधी जी को क्रांति का विरोधी और पूंजीपतियों का गुलाम मानते थे। कम्युनिस्टों की दृष्टि में गांधी जी बुर्जुआ थे।

1920-21 के असहयोग आंदोलन में चौरी-चौरा की हिंसात्मक घटना होने के बाद गांधी जी ने आंदोलन बन्द कर दिया। कम्युनिस्टों के लिए गांधी जी का यह कार्य बहुत कष्ट देने वाला था। कम्युनिस्ट जनता को हिंसात्मक तरीकों की ओर मोड़ देने में अपना भला समझते थे ताकि वे ऐसे संघर्ष के समय कांग्रेस पार्टी के भीतर अपना प्रभाव विस्तार करके जनता में कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व स्थापित कर सकें। कम्युनिस्ट इस बात को भलीभांति जानते थे कि गांधी जी की अहिंसा और सत्याग्रह प्रणाली में जब तक जनता की आस्था बनी रहेगी, वे कभी भी कम्युनिज्म स्थापित नहीं कर पाएंगे।

प्रसिद्ध कम्युनिस्ट लेखक और भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के जन्मदाता श्री एम.एन. राय ने "लेबर मंथली" (3 अक्तूबर, 1922) के पृष्ठ 224 पर लिखा कि इस देश (भारत) में हमें अपनी पार्टी खड़ी करनी होगी ताकि हम संगठन में नेतृत्व प्राप्त करसकें।

भारत में कम्युनिस्टों का प्रथम घोषणा-पत्र

गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस की जनप्रियता कम्युनिस्टों के लिए बड़ी बाधा थी। इसलिए उन्होंने कांग्रेस में घुस कर उसे छोड़ने और टूटी हुई कांग्रेस के आधार पर कम्युनिस्ट पार्टी का गठन करने का निश्चय किया था। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर श्री एम.एन. राय ने कांग्रेस के गया अधिवेशन में गांधी जी के नेतृत्व को खुली चुनौती देने का कार्यक्रम आंका। दिसम्बर, 1922 में रायटर न्यूज एजेंसी ने श्री एम.एन. राय की ओर से प्रकाशित "बोल्शेविक"- प्रोग्राम का विशद विवरण विभिन्न समाचारपत्रों के लिए प्रकाशित कर दिया। भारत में कम्युनिज्म लाने का यह पहला घोषणा-पत्र था। कांग्रेस के "गया अधिवेशन" के लिए केवल 21 दिन बाकी थे। कांग्रेस के गया अधिवेशन में श्री एम.एन. राय, श्री श्रृंगारवेलुचेट्टियार और श्री मनीलाल शाह आदि कम्युनिस्ट गांधी जी की विचारधारा को चुनौती देने के लिए सम्मिलित हुए।

गांधी जी विजयी हुए

किन्तु कम्युनिस्टों की आशा के विपरीत गांधी जी की विजय हुई। श्री एम.एन. राय के द्वारा प्रतिपादित हिंसात्मक आंदोलनों के तरीकों को ठुकरा दिया गया। श्री एम.एन. राय और उनके साथियों ने सोचा था कि कांग्रेस के गया अधिवेशन का सभापतित्व करने वाले श्री चित्तरंजन दास उनका साथ देंगे। किन्तु महात्मा गांधी के महान व्यक्तित्व से प्रभावित होकर श्री चित्तरंजनदास ने श्री एम.एन. राय का साथ नहीं दिया। अपने अध्यक्षीय भाषण में श्री चित्तरंजनदास ने कहा कि कुछ ऐसे लोग हो सकते हैं जो हिंसात्मक तरीकों से ही स्वराज्य प्राप्ति संभव मानते हैं और अहिंसात्मक तरीकों को हेय दृष्टि से देखते हैं किन्तु मैं उनमें से हूं जो अहिंसा को सैद्धांतिक आधार पर स्वीकार करते हैं।

कम्युनिस्ट पार्टी के गठन का प्रयास

कांग्रेस के गया अधिवेशन में मिली इस करारी हार की चोट से कम्युनिस्टों के सामने यह स्पष्ट कर दिया कि गांधी जी के नेतृत्व तथा जनप्रियता को चुनौती देना उनके लिए टेढ़ी खीर है। श्री एम.एन. राय इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि कम्युनिस्ट पार्टी का स्वतंत्र संगठन ही भारत में शीघ्र खड़ा करना होगा। "वेनगार्ड" नामक पत्रिका के मुखपृष्ठ पर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का मुख पत्र, शीर्षक सर्वप्रथम इस घटना के बाद ही प्रकाशित किया गया। इसी वेनगार्ड के 15 फरवरी, 1923 के संपादकीय में इस नई नीति की घोषणा की गई कि इसके बावजूद कि कांग्रेस भारतीय जनता का समर्थन प्राप्त करने का दावा करती है और दलित लोगों के उद्धार की योजना प्रस्तुत करती है। यह निश्चित है कि कांग्रेस एक बुर्जुआ राजनीतिक दल ही बनी रहेगी।

किन्तु श्री एम.एन. राय और उनके साथियों के लाख प्रयत्नों के बाद भी भारत की जनता ने बोल्शेविज्म तथा कम्युनिज्म की विचारधारा को स्वीकार नहीं किया। कांग्रेस के गया अधिवेशन में कम्युनिस्ट विचारधारा की भीषण पराजय के बाद श्री एम.एन. राय ने भारत में कम्युनिज्म का समर्थन करने वाले सभी कम्युनिस्टों को एक स्थान पर एकत्रित कर अखिल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन करने का विचार किया। फरवरी, 1923 में श्री श्रृंगारवेलु ने कम्युनिस्टों की एक अखिल भारतीय कांफ्रेंस का मसविदा प्रसारित किया। इस पर गहन असहमति हुई तो श्री राय ने 5 जून, 1923 को एक नया मसविदा जारी किया जिसमें घोषणा की गई कि कम्युनिस्टों की दो पार्टियां एक साथ गठित की जाएंगी। श्री एम.एन. राय के शब्दों में यह कम्युनिस्ट पार्टी व्यापक जनसमर्थन प्राप्त करने वाली कानूनी पार्टी के गैर-कानूनी विभाग का कार्य करेगी।

प्रयास असफल

किन्तु कम्युनिस्ट नेताओं के आपसी मनमुटाव और संघर्ष के कारण इस मसविदा पर आधारित अखिल भारतीय सम्मेलन नहीं हो सका। 1924 में कानुपर षडंत्र केस के बाद उत्तर प्रदेश में सत्यभक्त नामक कम्युनिस्ट कार्यकर्ता ने पुन: नए सिरे से कम्युनिस्ट पार्टी की विधिवत तथा खुलेआम स्थापना करने का प्रयत्न किया। श्री नलिनी गुप्त और श्री मुजफ्फर अहमद ने श्री भक्त के कार्यों में सहयोग दिया। श्री सत्यभक्त ने दिसम्बर, 1925 में इस प्रस्तावित कम्युनिस्ट पार्टी का अधिवेशन कानपुर में आयोजित करने की योजना बनाई ताकि कांग्रेस अधिवेश को प्रभावित किया जा सके। इसी समय कानपुर में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का अधिवेशन भी होने वाला था। श्री एम.एन. राय ने भी इस योजना का समर्थन किया। 26 दिसम्बर, 1925 को जब कम्युनिस्टों की इस पार्टी का अधिवेशन कानपुर में हुआ तो श्री मुजफ्फर अहमद, सी.के. आयंगर (मद्रास) इसमें सम्मिलित हुए। बम्बई से सर्वश्री के.एन. जोगलेकर, एस.वी. घाटे, आर.एस. निमकर, जे.पी. बरगरहाती और लाहौर से अब्दुल मजीद भी आये। मुस्लिम लीग के अध्यक्ष मौलाना हसरत मोहानी स्वागताध्यक्ष बने। इस अधिवेशन को कांग्रेस अधिवेशन के स्थान पर कांग्रेस के साथ मिलकर दिखाने का भरसक यत्न किया गया था किन्तु कांग्रेस की ओर से इस बात की अनुमति नहीं दी गई। कांग्रेस के पंडाल में कम्युनिस्ट पार्टी का प्रथम अधिवेशन करने की चाल सफल न हो सकी। फलत: कम्युनिस्टों को दूसरे स्थान पर अपना कार्यक्रम करना पड़ा। कांग्रेस पंडाल में अधिवेशन लगाकर कम्युनिस्ट भारतीय जनता के बीच यह भ्रम फैलाना चाहते थे कि कम्युनिस्टों की आस्थाएं भी भारत में ही हैं। किन्तु जब यह चाल सफल न हुई तो श्री श्रृंगारवेलु ने अध्यक्षीय भाषण में अपनी सफाई पेश की- चूंकि बोल्शेविज्म को रूसी लोगों ने स्वीकार किया है, भारतीय कम्युनिज्म बोल्शेविज्म नहीं है। हम रूसी नहीं हैं। बोल्शेविज्म की आवश्यकता भारत के लिए नहीं है। हम यद्यपि विश्व के सब कम्युनिस्टों के साथ हैं किन्तु बोल्शेविक नहीं। किन्तु कम्युनिस्टों की यह घोषणा केवल एक मुखौटा मात्र थी।

वास्तविकता प्रकट हो गयी

कम्युनिज्म के विदेशी होने के कारण भारतीय जनता में कम्युनिस्टों के प्रति जो रोष था उससे बचने के लिए ही यह घोषणा की गई थी। असलियत केवल दो वर्ष बाद ही खुल गई, जब 31 मई, 1927 को बम्बई अधिवेशन में इन्हीं कम्युनिस्टों ने एक प्रस्ताव स्वीकृत किया जिसमें कहा गया कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी समस्त विश्व की कम्युनिस्ट पार्टियों और अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट पार्टी की ओर मार्गदर्शन तथा नेतृत्व के लिए देखती है ताकि इस देश (भारत) में उसने जो कार्य हाथ में लिया है उसे वह पूर्ण कर सके। श्री एम.एन.राय ने 1927 के जुलाई मास के "मासेस आफ इंडिया-3" में प्रकाशित "इंडियन कम्युनिस्ट" शीर्षक के लेख में स्पष्ट लिखा कि (भारत में) कम्युनिस्ट पार्टी अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन का अंग ही हो सकती है। अन्यथा वह चाहे जो कुछ हो कम्युनिस्ट नहीं हो सकती।

1920-22 से लेकर 1927 तक का कालखण्ड कम्युनिस्टों के लिए बड़ी कसमकश का रहा, न वे प्रभावी ढंग से कांग्रेस में घुस सके और न ही कम्युनिस्टों का अखिल भारतीय स्वतंत्र संगठन बना। कांग्रेस के भीतर घुसपैठ करने, कांग्रेस को तोड़ने और गांधी जी के हाथों से नेतृत्व छीनकर कम्युनिस्ट पार्टी को भारतीय जनता में प्रभावी बनाने के उनके प्रयास सफल नहीं हुए। (...जारी)

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