
डा.रवीन्द्र अग्रवाल
विदेशी हाथों में भारतीय कृषि क्षेत्र?
रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर विमल जालान ने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा) में आयोजित लालबहादुर शास्त्री स्मृति व्याख्यान के अवसर पर कहा कि कृषि में विकास की गति सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर के आधार पर नहीं बल्कि गरीबों के विकास के आधार पर की जानी चाहिए। साथ ही उन्होंने 1996-97 के बाद कृषि क्षेत्र में आई गिरावट पर भी चिंता जताई। उनका मानना है कि कृषि क्षेत्र में इस गिरावट का कारण तात्कालिक नहीं वरन् दीर्घकालिक है और योजना निर्धारकों व चिंतकों को इस पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए।
यह भले ही स्पष्ट रूप से दिखता हो कि किसानों ने देश को एक बहुत बड़े खाद्यान्न संकट से उबार दिया और 1960-70 में खाद्यान्न आयात करने वाला देश अनाज का निर्यातक बन गया है। परन्तु इससे किसान की दशा में कोई सुधार नहीं आया। कृषि में दिखने वाली इस प्रगति का असर किसान के लिए आत्मघाती बन गया। जिस किसान ने कैसी भी विपरीत परिस्थिति में हार नहीं मानी और वह हताश नहीं हुआ, 1996-97 के बाद वही किसान हताश होकर आत्महत्या के लिए मजबूर हो गया।
किसान की आत्महत्या के लिए उन आर्थिक नीतियों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है जो 1991 के बाद अमरीका के निर्देश पर देश पर में थोपी गयीं। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया का मानना है कि किसानों को आत्महत्या इसलिए करनी पड़ी क्योंकि कृषि क्षेत्र में आर्थिक सुधार पूरी तरह लागू नहीं किए गए थे। लाल बहादुर शास्त्री स्मृति व्याख्या देते हुए उन्होंने कृषि क्षेत्र में सुधारों की वकालत की। इसका सीधा- सा अर्थ है कि देश की 70 प्रतिशत आबादी को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के रहमोकरम पर छोड़ देना।
अगर खेती को बड़ी कम्पनियों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हवाले करना ही कृषि समस्याओं का समाधान है तो फिर बड़ी कम्पनियों द्वारा संचालित चाय बागानों की हालत खराब क्यों है? प. बंगाल के चाय बागान मजदूर भूख से क्यों मर रहे हैं, क्यों असम के चाय बागान मजदूरों को अपनी मजदूरी प्राप्त करने के लिए हिंसक होना पड़ रहा है? गन्ना खेती तो एक प्रकार से संविदा खेती है फिर भी देश का गन्ना किसान क्यों संकट में है? ऐसा क्यों है कि चीनी मिलें लगाने की होड़ लगी है और गन्ना किसान गन्ने की खेती से मुक्ति चाहता है? क्या देश की कृषि के बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के गोदामों में जाने से देश की खाद्यान्न सुरक्षा इन कम्पनियों के हाथों गिरवी हो जाने का खतरा नहीं?
कहा जा सकता है कि ये कम्पनियां भारतीय कानूनों के अंतर्गत ही सारा काम- काज करेंगी। परन्तु ये कम्पनियां कितनी ताकतवर हैं इसका उदाहरण है पेप्सी और कोकाकोला। विभिन्न परीक्षणों से पता चला कि ये कम्पनियां देश को जो शीतलपेय पिला रही हैं उसमें कैंसरजनक रसायनों के अंश हैं। इसके बावजूद इन कम्पनियों के उत्पाद पर रोक लगाने की हिम्मत कोई नहीं दिखा पा रहा है। ये कम्पनियां यह बताने के लिए भी तैयार नहीं कि इनके उत्पादों में कैंसरजनक रसायनों का अंश कितना है। इसके विपरीत स्थिति यह है कि किसी देशी कम्पनी द्वारा बनाए गए गुटखों पर यह कहकर प्रतिबंध लगा दिया जाता है कि इसमें कैंसरजनक रसायन हैं। एक जैसे प्रकरण में यह दोहरा व्यवहार क्यों? कृषि में सुधारों के नाम पर भारतीय खेती की नकेल अमरीकी हाथों में पकड़ाने का जो षडंत्र योजना आयोग के योजनाकार रच रहे हैं उससे सावधान रहना समय की मांग है।
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