गहरे पानी पैठ


बंद, हड़तालें और बेरोजगार

कम्युनिस्ट शासन में प. बंगाल का आर्थिक ढांचा किस कदर चरमरा गया है, एक-एक करके इसके उदाहरण सामने आते जा रहे हैं। खजाना तो खाली हो ही गया, मजदूरों के कंधे पर बंदूक रखकर राजनीति करने वाले कम्युनिस्टों ने प. बंगाल में मजदूरों को सड़कों पर भटकने के लिए मजबूर कर दिया है। आर्थिक दृष्टिकोण से राज्य की छवि इतनी खराब हो चुकी है कि कोई भी उद्योगपति वहां अपनी पूंजी लगाने के लिए तैयार नहीं है, अलबत्ता जिनके उद्योग वहां पहले से ही हैं, वे भी बंद, हड़तालों के कारण अब किसी तरह वहां से बोरिया-बिस्तर बांध दूसरे राज्यों में जाना चाहते हैं, अनेक तो चले भी गए हैं। पिछले एक साल का ही आंकड़ा देखें तो ज्ञात होता है कि बीते 365 दिनों में राज्य के 2 लाख श्रमिक बेरोजगार हुए हैं। कम्युनिस्ट संस्कृति का हिस्सा है तालाबंदी और हड़तालें जिनका सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है और जब उत्पादन नहीं तो काम नहीं। राज्य श्रम विभाग के अनुसार पिछले साल राज्य में 2 लाख, 30 हजार, 490 श्रमिक बेरोजगार हुए। सन 2002 में औद्योगिक हड़तालों के कारण 29 औद्योगिक इकाइयां बंद हुई़, इनमें 81 हजार, 960 मजदूर कार्यरत थे। 2001 में इसी कारण 20 इकाइयां बंद हुई थीं जिससे 20 हजार, 500 श्रमिक बेरोजगार हो गए थे। 2002 में प. बंगाल की 324 औद्योगिक इकाइयों में कार्यस्थगन के नोटिस टांगे गए। इनमें 1 लाख 42 हजार 500 श्रमिक कार्यरत थे। सन 2001 में 309 इकाइयों में कार्यस्थगन के कारण 1 लाख 18 हजार श्रमिकों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा था। घाटे में चलने के कारण वहां 184 कारखानों को बंद किया गया। श्रमिकों में असंतोष के कारण 106 इकाइयां बंद हुईं। राज्य रोजगार कार्यालयों में नया पंजीकरण कराने वाले बेरोजगारों की संख्या बढ़ती जा रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य में बेरोजगारों की कुल संख्या 64 लाख 33 हजार है। बेरोजगारों की बढ़ती संख्या और बंद होते उद्योग धंधे श्रमिक हितों की बात करने वाली कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा शासित राज्य की कहानी है। कैसा है यह श्रमिक-हित का ढोल पीटने वाला यह सिद्धांत।

"मिशन इंडिया'

उड़ीसा में ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित विद्यालयों और अन्य शिक्षा केन्द्रों के प्रमुख पदों पर आसीन ईसाई पादरियों को हो क्या गया है? पिछले दिनों बारीपदा में हुए अप्राकृतिक यौनाचार कांड का मामला अभी सुलझा भी नहीं था कि सम्बलपुर में बलात्कार की घटना घट गई। यह घटना सम्बलपुर के भीमभाई रोड स्थित बाइबिल तालीम केन्द्र की है। गत 17 अगस्त को केन्द्र के अध्यक्ष ने सिर दबवाने के बहाने एक छात्रा को अपने कमरे में बुलाया और उसके साथ बलात्कार किया। किन्तु साथ वाले कमरे में रह रहे कुछ छात्रों के कारण इसका भाण्डा फूटा। इन छात्रों ने उस कमरे से लड़की के चिल्लाने की आवाज सुनकर दरवाजा खटखटाया और फिर सब कुछ सामने आ गया। इस घटना के बाद से ही इस केन्द्र में ताला लगा हुआ है। बलात्कार करने वाला इसका अध्यक्ष भी फरार है। सूत्रों के अनुसार केन्द्र का मुख्यालय नागपुर में है और इसका संचालन मिशन इंडिया नामक एक संस्था करती है। स्थानीय लोगों ने इस घटना की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।

साधु के चहेते

कौन भूला होगा दीपा मेहता को। वही, "फायर', "अर्थ' और "वाटर' फिल्मों की अंग्रेजीदां फिल्म निर्देशिका दीपा मेहता। "फायर' और "अर्थ' में संस्कृति और कला के नाम पर बेहूदा कथानक और अदाकारी के नाम पर अश्लील चित्रण के कारण वे इतनी कुख्याति पा चुकी थीं कि "वाटर' के फिल्मांकन के लिए उन्हें बनारस के गंगा तटों पर चित्रांकन का प्रचूर विरोध हुआ। कई सेकुलरवादी, प्रगतिशील "कलाकारों' ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का राग अलापते हुए हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों के विरोध में खूब भाषण दिए, जुलूस निकाले।

आज कहां हैं वे सब प्रगतिशील और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पहरुए? क्यों नहीं वे पटना जाकर "गंगाजल' फिल्म के प्रदर्शन का विरोध करने वाले मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के भाई साधु यादव के "समर्थकों' को समझाते कि भई, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। फिल्म "गंगाजल' में खलनायक का नाम साधु यादव है। बस, इसी बात पर कीचड़ उछाल रहे हैं साधु यादव के लोग। पिछले शुक्रवार पटना के वीणा और अप्सरा छविगृहों पर पत्थरबाजी की गई, पोस्टर फाड़े गए। फिल्म दिखाई न जा सकी। उस पर साधु यादव के भाई सुभाष यादव का तुर्रा यह कि अगर फिल्म में भला काम करने वाले किसी पात्र का नाम साधु यादव होता तो उन्हें कोई परेशानी नहीं थी। अब नाम भी साधु यादव रख दें और काम भी खलनायकी का दिखाएं तो यह तो नहीं न चलेगा।

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