आख्यान


-- नरेन्द्र कोहली चिंता

विश्वनाथ आंगन के एक कोने में स्नान कर रहे थे। नरेन्द्र स्नान और ध्यान कर कुर्ते के बटन बंद करता हुआ, भोजन के लिए आ गया। वह रसोई के भीतर द्वार के निकट ही आसन बिछा कर बैठ गया।

"मां! भात दो।'

भुवने·श्वरी छत पर कपड़े सुखा रही थी। वहीं से झांककर देखा। पिता अभी नहा रहे हैं और पुत्र भोजन मांग रहा है। भुवने·श्वरी को नरेन्द्र का इस प्रकार जल्दी मचाना अच्छा नहीं लगता।

"बाबा को नहा तो लेने दे।'

"तुझे तो सदा ही ताड़ाताड़ी मची रहती है।' उन्होंने किरण को संकेत किया, "थाली परोस दे किरण!'

किरण ने नरेन्द्र के सम्मुख पहले पानी का गिलास रखा, फिर थाली। बड़े पतीले में से भात परोसा। छोटे बर्तनों में से दो सूखी सब्जियां परोसीं और उसके ऊपर से मछली का रसा डाल दिया। नरेन्द्र का ध्यान उसकी ओर नहीं था। वह अपने हाथों से जैसे कुर्ते के बटन और आस्तीन इत्यादि ठीक कर रहा था और मुंह में किसी मंत्र का जाप करता चल रहा था।

"खाओ।'

नरेन्द्र ने बेध्यान ही भात में शाक और रसा मिलाया और एक बड़ा सा कौर मुंह में डाल लिया। तोड़ा चबाया और निगलने से पहले ही रुक गया। प्रश्न भरी दृष्टि से किरण की ओर देखा और फिर वही दृष्टि छत से उतरकर निकट आ गई भुवने·श्वरी पर भी डाली। सहसा वह उठकर रसोई से बाहर आ गया। मुंह का कौर नाली में थूक दिया और पानी लेकर कुल्ला करने लगा।

"कंकड़ आ गया क्या? कहा भी था किरण से कि उबालने से पहले चावल की थाली मुझे दिखा दे। पर सब अपनी ही मनमानी करते हैं।' भुवने·श्वरी ने खेद जताया। नरेन्द्र लौट आया। गिलास फर्श पर रखा; किन्तु स्वयं आसन पर नहीं बैठा।

"तुम्हें मालूम नहीं कि मैं केवल निरामिष भोजन करता हूं?'

किरण नटखट सी मुद्रा में मुसकाई, "जिस बात को सारा मुहल्ला जानता है, उसे मैं कैसे नहीं जानूंगी।'

नरेन्द्र ने हल्के आवेश के साथ कहा, "तो फिर मछली क्यों परोसी?'

"कब परोसी मछली?'

नरेन्द्र ने थाली की ओर संकेत किया, "यह निरामिष है?'

"और क्या है?'

"मछली निकाल कर उसका झोल मुझे दे दिया, तो वह निरामिष हो गया?' किरण कुछ नहीं बोली। भुवनेश्वरी अपने स्थान पर ठगी सी बैठी रह गई।

वि·श्वनाथ लोटा भर पानी सिर पर डालने ही वाले थे। उनका हाथ रुक गया। वे बिना किसी को संबोधित किए हुए, जैसे अपना आवेश प्रकट करने को बोले, "इसकी चौदह पीढ़ियों ने मछलियां और कछुए खाकर जीवन व्यतीत किया है। अब यह ब्राह्मदैत्य बन गया है और मछली नहीं खाता। बंगाल में रहेगा और मछली नहीं खाएगा तो क्या खाएगा?'

नरेन्द्र ने अपने पिता की ओर देखा भर और बिना कोई उत्तर दिए घर से बाहर निकल गया। भुवनेश्वरी उसे जाते हुए देखती रहीं।

"यह तुमने क्या किया?' भुवनेश्वरी ने कहा।

"क्या कर दिया मैंने?' विश्वनाथ ने पूछा।

"बच्चा होता तो गोद में बैठकर मछली ही नहीं, रोगनजोश भी खिलाता।'

"पलटकर उत्तर नहीं देता तो क्या हुआ। खाना छोड़ गया। अब सारा दिन भूखे पेट बाहर की गलियां नापता फिरेगा।'

"और तुम भी सुन लो। मुझे उसके ये रंग-ढंग पसंद नहीं हैं। मांस मछली नहीं खाएगा, विवाह नहीं करेगा, तो क्या करेगा? अपने दादू के समान भगवाधारण कर काशीवास करेगा?'

"तो तुम उसे ब्राह्म समाज की सभाओं में सम्मिलित होने से रोक क्यों नहीं देते? वह शाकाहारी भोजन करता है। भूमि पर कंबल बिछाकर सोता है।' भुवने·श्वरी का स्वर कुछ तीखा था।

"ब्राह्म समाज से मेरा कोई विरोध नहीं है। पर लोग मुख से कहते भर हैं; यह तो उन पर आचरण करने लगता है।'

"जब इतना कुछ जानते हो तो फिर उसे डांटते क्यों हो?'

भावुकता के कारण विश्वनाथ का स्वर रुंध गया, "पिता हूं उसका। मुझे उसकी चिंता है।'

भुवनेश्वरी अपने पति को देखती रह गई।

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