हिन्दुओं से एक और छल
"जैसे ही शाम को हम काम करके अपनी झुग्गी में लौटते हैं, पुलिस वाले हमें आ घेरते हैं और बिना किसी कारण के धमकाते हैं, हमें जम्मू छोड़ देने के लिए कहते हैं। अपने राज्य में अकाल की हालत के कारण वहां दाने-दाने को हम मोहताज हो गए थे। काम की तलाश में बरसों पहले यहां आए थे। तब से मजदूरी करके अपने बाल-बच्चों का पेट भर रहे हैं। किन्तु अब यह सरकार हमारा दाना-पानी छीन रही है।' जम्मू के त्रिकुटा नगर की झुग्गी बस्ती में रहने वाला एक मिस्त्री सभी झुग्गीवासियों की स्थिति बता देता है। उल्लेखनीय है कि वर्षों पहले बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा और पूर्वी उत्तर-प्रदेश से आए हिन्दू श्रमिक काफी बड़ी संख्या मजदूरी की तलाश में जम्मू-कश्मीर में आ बसे थे। असंगठित रूप में इधर-उधर कार्य करने के कारण इनकी सही संख्या लगभग तो नहीं बतायी जा सकती किन्तु अनुमान के अनुसार इनकी संख्या 40,000 से 50,000 है। इनमें से कई तो एक दशक पहले से जम्मू-कश्मीर में आकर बसे थे। लेकिन अब मुफ्ती सरकार इन्हें राज्य से भगाने की कोशिश कर रही है। इन मजदूरों के साथ मारपीट और इन्हें आपराधिक मामलों में फंसाना तो अब आम बात हो गई है। जम्मू-कश्मीर से इन हिन्दू मजदूरों को निकालने का कारण अप्रत्यक्ष रूप से राज्य को मुस्लिमबहुल बनाना ही है। कश्मीरी पंडितों को घाटी से निकालने के बाद अब ये मजदूर सरकार के निशाने पर हैं। गत 4 जून, 2002 को राज्य विधानसभा में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष मुफ्ती महबूबा के बयान के बाद इस मुहिम में विशेष तेजी आयी है। विधानसभा में महबूबा मुफ्ती ने मांग की थी कि राज्य में बाहर से आये मजदूरों को वापस भेज देना चाहिए। उल्लेखनीय है कि एक वक्त था जब जम्मू-कश्मीर से ही बड़ी संख्या में कश्मीरी युवक देश के विभिन्न भागों में रोजी-रोटी कमाने जाते थे, किन्तु पिछले कुछ वर्षों से परिस्थितियां काफी कुछ बदल गयीं। केन्द्र से भारी वित्तीय सहायता मिलने और कई नई परियोजनाएं शुरू होने के कारण स्थानीय लोगों की वित्तीय स्थिति में सुधार आया और राज्य में श्रमिकों की भारी कमी महसूस की जाने लगी जिसे पूरा करने के लिए देश के विभिन्न भागों से हजारों श्रमिक वहां पहुंचे। इससे राज्य में हिन्दू जनसंख्या बढ़ी जो अलगाववादियों को चुभने लगी। आतंकवादियों ने भी इन्हें अपना निशाना बनाया। पिछले छह साल के आंकड़े इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि आतंकवादी राज्य से इन हिन्दू श्रमिकों का सफाया कर देना चाहते हैं। 6 मई, 1996 को श्रीनगर के लासजन में आठ हिन्दू मजदूरों को आतंकवादियों ने मार डाला था। 3 अगस्त, 1998 को चम्बा (हिमाचल प्रदेश) और डोडा (जम्मू-कश्मीर) सीमा पर कालाबंद और शतरूंडी में 35 मजदूर आतंकवादियों की गोलियों का शिकार हुए। इससे दो महीना पहले 30 जून, 1998 को अनंतनाग जिले के नौगाम में बुलबुल नामक स्थान पर ईंट-भट्टे पर काम कर रहे 12 मजदूरों को आतंकवादियों ने निशाना बनाया। 1 अगस्त, 2002 को अनंतनाग के काजीगुंड नामक स्थान पर 20 और मजदूर आतंकवादियों के हाथों मारे गए। इसी दिन, इसी जिले में संधु नामक स्थान पर 7 मजूदर इनका निशाना बने। और अब सरकार के इशारे पर राज्य पुलिस इनके पीछे पड़ी है। इनके साथ मारपीट तो आम बात हो गई है। महबूबा मुफ्ती के इस बयान पर कांग्रेसी तो खामोश रहे, लेकिन अन्य लोगों ने इसका जोरदार खंडन किया। कांग्रेस सांसद सैफुद्दीन सोज पहले तो यह बात स्वीकारने के लिए ही तैयार नहीं हुए कि महबूबा इस प्रकार का बयान दे सकती हैं। लेकिन जब पता किया कि उन्होंने ऐसा बयान दिया है तो बोले, "राज्यवासियों की रोजगार समस्या का ध्यान तो रखना ही पड़ेगा। लेकिन इस प्रकार बाहर से आए मजदूरों को खदेड़ना ठीक नहीं होगा।'
इस संदर्भ में एक बातचीत में उधमपुर से सांसद और केन्द्रीय रक्षा राज्यमंत्री प्रो. चमन लाल गुप्ता ने महबूबा के इस बयान और राज्य सरकार की बाहरी मजदूर भगाओ मुहिम की निंदा करते हुए कहा, "मुफ्ती सरकार के इस कदम की प्रतिक्रिया पूरे देश में हो सकती है। महबूबा का यह बहुत गंभीर वक्तव्य है। आज कश्मीर के नौजवान पूरे देश में रोजी-रोटी कमाने के लिए बसे हुए हैं। कर्नाटक, गोवा, दिल्ली, कोलकाता सहित देश के विभिन्न भागों में कश्मीरी युवक अपना काम-धंधा चला रहे हैं। और बड़ी संख्या में कश्मीरी विस्थापित देश के विभिन्न भागों में शरणार्थी के रूप में जीवनयापन कर रहे हैं। अगर जम्मू-कश्मीर से देश के अन्य भागों से आए मजदूरों को निकाला जाएगा, तो प्रतिक्रियास्वरूप ऐसा ही सिलिसिला देश के अन्य भागों में भी शुरू हो सकता है, तब कश्मीरियों के लिए कितनी परेशानी खड़ी हो जाएगी। महबूबा को शायद इसका अंदाजा नहीं। वह कश्मीरियों की भलाई करने की बजाय उनके लिए परेशानी खड़ी कर रही हैं।' सच तो यह है कि आज कश्मीर में जितनी भी परियोजनाएं चल रही हैं, निर्माण हो रहा है उनमें ये मजदूर काम कर रहे हैं। अगर इन मजदूरों को जम्मू-कश्मीर से बाहर निकाल दिया गया तो राज्य में मजदूरों का संकट खड़ा हो जाएगा, क्योंकि वहां स्थानीय मजदूर मिलना अब एकदम असम्भव हो गया है। प्रो. चमनलाल गुप्ता का कहना है कि इन हिन्दू मजदूरों को राज्य से निकाल बाहर करने का जो काम आतंकवादी कर रहे हैं, अब वही काम सरकार ने अपने हाथ में ले लिया है। इससे पूरे देश में गलत संदेश जाता है। मुफ्ती सरकार की बाहरी मजदूर भगाओ मुहिम से अलगाववादियों के हौंसले और बढ़ेंगे।'
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