पाकिस्तानी कब्जे वाले गुलाम कश्मीर से आए हिन्दू शरणार्थियों की दास्तान


बीते छप्पन साल मगर वही है हाल

द विनीता गुप्ता

मीरपुर में छूटें भूखण्डों के दस्तावेज राज्य के राजस्व कार्यालय से गायब

पिछले 56 वर्षों से ये हिन्दू अपने अधिकार मांग रहे हैं। लेकिन आज तक उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती ही साबित हुई। इतने लम्बे अर्से से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे ये लोग 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद पाकिस्तानी कब्जे वाले गुलाम कश्मीर से खदेड़ दिए गए थे। पाकिस्तानी हमलावरों ने कबाइलियों के वेश में कश्मीर पर हमला बोला और वहां के निवासियों पर जो कहर बरपाया, उसकी यादें आज भी कुछ बुजुर्ग आंखों को नम कर जाती हैं। इन हिन्दुओं को याद आती है कश्मीर की उस धरती पर छोड़े अपने मकानों और दुकानों की, जो 1947 से पाकिस्तान के कब्जे में हैं। वहां से खदेड़े गए तो जम्मू-कश्मीर आ गए। जान हथेली पर लिए। आशा थी कि एक दिन अपने घर लौट जाएंगे, जब संयुक्त राष्ट्र संघ में नियंत्रण रेखा का यह मामला तय हो जाएगा। लेकिन 56 साल बीत गए, न वे वापस अपने घरों को लौट सके, न जम्मू-कश्मीर में उन्हें शरणार्थियों को मिलने वाली राहत और सुविधाएं मिलीं, न वे स्थायी रूप से यहां बस पाए और न ही गुलाम कश्मीर में छोड़ी चल-अचल सम्पत्ति का कोई हर्जाना ही मिला। इन विस्थापितों की संस्था एस.ओ.एस. के उपाध्यक्ष श्री यशपाल गुप्ता कहते हैं, "सरकार ने हमें शरणार्थियों का दर्जा तो दिया नहीं, लेकिन शरणार्थी बने रहने पर मजबूर कर दिया है। मुख्यमंत्री का कहना है कि पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में लम्बित है। इसलिए हमें आप लोगों की जमीन-जायदाद का फैसला करने का कोई अधिकार नहीं है। अगर ऐसा करते हैं तो उस जमीन पर भारत का दावा कमजोर हो जाएगा। यानी कि हम शरणार्थी बने रहें और लेकिन शरणार्थी का दर्जा भी न मिले।'

अपनी चल-अचल सम्पत्ति के हर्जाने की भरपाई और राहत के लिए जब सरकार की ओर से कहीं कोई आशा की किरण नहीं दिखाई दी तो ये शरणार्थी जम्मू-कश्मीर न्यायालय की शरण में गए। न्यायमूर्ति श्री दोआबिया और न्यायमूर्ति श्री एस.के. गुप्ता की खण्डपीठ ने सरकार को आदेश दिया कि इन शरणार्थियों को शरणार्थियों का दर्जा मिले और उसकी सुविधाएं और राहत दी जाए। लेकिन राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय का आदेश पालन करने की बजाय इस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी।

एस.ओ.एस.के अध्यक्ष श्री राजीव चुन्नी कहते हैं, "पाकिस्तानी कब्जे वाले गुलाम कश्मीर में छोड़ी गई हमारी चल-अचल सम्पत्ति के मुआवजे की बात तो दूर है, उनका लेखा-जोखा भी कहीं दर्ज नहीं है। जबकि जम्मू-कश्मीर सरकार ने 1946 में भारत छोड़कर पाकिस्तान गए मुसलमानों की जमीन-जायदाद की देखभाल के लिए एक पूरा प्राधिकरण बनाया था। उनकी सम्पत्ति का पूरा-पूरा मुआवजा जम्मू-कश्मीर सरकार ने उन्हें दिया, जबकि पाकिस्तान के स्थायी नागरिक के रूप में वे वहां बस गए थे। जम्मू-कश्मीर सरकार इसी तरह का प्राधिकरण हम हिन्दू विस्थापितों के लिए भी बनाती, जो कश्मीर में छोड़ी गई हमारी जमीन-जायदाद का हिसाब-किताब रखता और उसी हिसाब से हमें मुआवजा दिलवाता।' श्री चुन्नी का आरोप है कि पं. नेहरू की सरकार ने भी मुसलमानों के तुष्टीकरण की नीति अपनाते हुए पाकिस्तानी कब्जे वाले गुलाम कश्मीर के शरणार्थियों की उपेक्षा की, जिसके कारण आज भी वे भारत में दूसरे दर्जे के नागरिक की हैसियत से जीवन बिताने को मजबूर हैं। सरकार ने हमसे छल किया है। 1947 में हमें 3,500 रुपए अनुग्रह राशि और 250 रुपए ऋण दिया गया था। सरकारी अधिकारी कहते हैं कि वही बस अंतिम भुगतान था। अब सरकार के पास कोई देनदारी बाकी नहीं है। फाइलें बंद हो चुकी हैं। श्री चुन्नी पूछते हैं, सरकार हमें यह बताए कि कब गुलाम कश्मीर में छूटी हमारी सम्पत्ति का पंजीकरण किया गया? उनके मूल्यांकन के लिए कौन सी समिति या आयोग का गठन किया गया? उनके आकलन के बाद हमारी सम्पत्ति के कितने दाम लगाए गए? उस आंकलन के समय इन शरणार्थियों का कौन सा प्रतिनिधि वहां मौजूद था? ऐसे किसी आयोग या समिति की रपट कहां है?'

श्री राजीव चुन्नी के इस वक्तव्य के संदर्भ में यह बता देना प्रासंगिक होगा कि पिछले दिनों राज्य के राजस्व विभाग के "रिकार्ड रूम' में पाकिस्तानी कब्जे वागे गुलाम कश्मीर में स्थित मीरपुर में छूटी इन विस्थापितों की जमीनों के दस्तावेज न मिलने का मामला काफी चर्चा में रहा था। मीरपुर क्षेत्र से विस्थापित लोग पिछले एक साल से राजस्व कार्यालय के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन कार्यालय अब तक उन्हें ये रिकार्ड उपलब्ध नहीं करा पाया। उल्लेखनीय है कि 1999 में जिलाधीश कार्यालय के पास स्थित निदेशक भूमि रिकार्ड कार्यालय को स्थानांतरित किया गया था। तब इस रिकार्ड को रेत- बजरी की तरह ढोकर उस नये कार्यालय में पहंुचाया गया था, जिससे 82 वर्ष पुराना रिकार्ड इधर-उधर हो गया। कितने ही दस्तावेज दीमक लग जाने के कारण नष्ट हो गए। पिछले दिनों केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री श्री आई.डी.स्वामी ने एक सवाल के जवाब में कहा था "पाकिस्तानी कब्जे वाले गुलाम कश्मीर के विस्थापितों के रिकार्ड रखना बहुत आवश्यक है। 1947 में पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर से विस्थापित 32000 परिवारों की छोड़ी गई सम्पत्ति के मुआवजे के लिए भारत सरकार ने कोई दावा आमंत्रित नहीं किया, क्योंकि अब भी कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है।' उल्लेखनीय है कि उस जमीन को वापस लेने के लिए संसद ने एक प्रस्ताव भी पारित किया था, ताकि इन विस्थापितों को दोबारा उनके पैतृक इलाकों में बसाया जा सके।

आज जब भारत पाकिस्तानी कब्जे वाले गुलाम कश्मीर को पाने के लिए अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर जूझ रहा है, वहीं उस क्षेत्र के भूमि सम्बंधी दस्तावेजों का गायब हो जाना हैरानी की बात है। इस प्रकार महत्वपूर्ण दस्तावेजों का गायब हो जाना अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के दावे को कमजोर करेगा। उल्लेखनीय है कि जिला मीरपुर की जमीन संबंधी ये दस्तावेज 1920 में तैयार किए गए थे। इस जिले में मीरपुर, भिम्बर और कोटली तहसीलें आती थीं। इन तीनों तहसीलों की जमीन के दस्तावेज अब कहीं मिल नहीं रहे हैं।

श्री राजीव चुन्नी का कहना है, "इन दस्तावेजों का गायब होना पाकिस्तानी कब्जे वाले गुलाम कश्मीर पर भारत के दावे को कमजोर करता है। यह सीधे राष्ट्रहित से जुड़ा मुद्दा है। हमारे बार-बार अनुरोध करने पर भी अधिकारी हमें वे दस्तावेज उपलब्ध नहीं करा पाए, इसका अर्थ है कि वे सुरक्षित नहीं हैं।'

एस.ओ.एस. की दिल्ली शाखा के अध्यक्ष श्री वेद प्रकाश गुप्ता कहते हैं, "एक तो हमारी जमीनों के दस्तावेज नहीं मिल रहे। दूसरे अब उन जमीनों पर पाकिस्तान ने विशाल मंगला बांध बना लिया है, जिस कारण ज्यादातर जमीनें पानी में डूब चुकी हैं। सरकार कहती है कि वह हम लोगों को वापस हमारी जमीनों पर बसाएगी। तो हमें क्या पानी में बसाएगी?' वहीं श्री चुन्नी कहते हैं "जिस हालत में ये दस्तावेज हैं, उन्हें देखकर सरकार की नीयत का अंदाजा लग जाता है। सरकार इन्हें नष्ट कर देना चाहती है। यह हिन्दुओं के विरुद्ध षड्यंत्र है। मान लो पाकिस्तानी कब्जे वाला कश्मीर भारत को मिल भी गया तो हमें किस आधार पर अपनी जमीनों पर कब्जा वापस मिलेगा? कहां हैं हमारी वे जमीनें? पश्चिमी पंजाब और पूर्वी बंगाल से आए शरणार्थियों के पुनर्वास और पुनरस्थापना के लिए 1954 में एक केन्द्रीय अधिनियम बनाकर उन्हें पूरा मुआवजा दिया गया और स्थायी रूप से बसाया, यही व्यवहार हम शरणार्थियों के प्रति क्यों नहीं किया गया? क्या इसलिए कि मामला संयुक्त राष्ट्रसंघ में है। लेकिन यह मामला हम तो नहीं ले गए थे संयुक्त राष्ट्र में फिर सजा हमें क्यों?'

जम्मू-कश्मीर सरकार शुरू से ही मुस्लिमों की पक्षधर रही है और उसकी यही नीति रही कि कश्मीर घाटी में मुस्लिम समुदाय ही रहे, गैर मुस्लिमों को घाटी से बाहर बसाया जाए। इसका प्रमाण है कि 1947 में पाकिस्तानी कब्जे वाले गुलाम कश्मीर के मुजफ्फराबाद जिले से आए 300 हिन्दू परिवारों ने उससे लगते कुपवाड़ा जिले में शरण ली थी। लेकिन इन परिवारों को कुपवाड़ा से उजाड़कर जम्मू में बसाया गया था। इन शरणार्थियों ने शिविरों में कैसे दुर्दिन देखे। सोचकर आज भी दिल कांप उठता है। इन शरणार्थियों की मांग है कि इन्हें भी कश्मीरी विस्थापितों की तरह राहत और सुविधाएं दी जाएं। सन् 2000 पैकेज के अंतर्गत इनके लिए निर्धारित अनुग्रह राशि 25,000 को बिना किसी शर्त के तुरन्त जारी किया जाए। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर बैंक की पाकिस्तानी कब्जे वाले गुलाम कश्मीर में स्थित शाखाओं में जमा इनकी रकम इन्हें दिलाई जाए, वैसे ही जैसे नेशनल बैंक आफ लाहौर, डाकखानों और बीमा कम्पनियों द्वारा राशि वापस की गई थी।

इन विस्थापितों को अपने अधिकार हासिल करने के लिए जूझते हुए 56 साल तो बीत गए अब और कितने साल गुजरेंगे? यह आने वाला वक्त ही बताएगा।

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