श्यामजी का पूरा जीवन मातृभूमि को समर्पित रहा


-कुप्.सी.सुदर्शन

सरसंघचालक, रा.स्व.संघ

गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जब जेनेवा से श्यामजी कृष्ण वर्मा का अस्थिकलश लेकर मुम्बई पहुंचे तो मुम्बई में एक भव्य समारोह का आयोजन किया गया। 24 अगस्त को आयोजित इस समारोह में रा.स्व.संघ के सरसंघचालक श्री कुप्.सी.सुदर्शन उपस्थित थे। इस अवसर पर श्री सुदर्शन द्वारा दिए गए भाषण के संपादित अंश इस प्रकार हैं।

गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्रभाई एवं उनके साथ-साथ सांसद श्री किरीट सोमय्या एवं श्री मंगलभाई भानुशाली बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने अथक परिश्रम कर पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा एवं उनकी पत्नी भानुमति की अंतिम इच्छा पूरी करते हुए उन्हें अपनी मातृभूमि की गोद में पहुंचाया जो स्वतंत्रता-प्राप्ति के पहले दशक में ही हो जानी चाहिए थी। वह नहीं हुई, इसे दुर्भाग्य न कहें तो और क्या कहें? इसका कारण यही रहा कि स्वराज्य प्राप्ति का श्रेय कुछ व्यक्तियों, परिवारों एवं एक संस्था तक ही सीमित रखा गया। ऐसे लोग तब भी थे और आज भी हैं जिन्होंने इस देश की अस्मिता और सम्मान के साथ सदैव छल किया। ऐसी जमातों का नाम है मैकालेपुत्र और माक्र्सपुत्र।

इसी मानसिकता के कारण सन 1857 में जन्मे और विदेशों में भारत की स्वतंत्रता के लिए प्रयास करने वाले पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा को भी विस्मृति के गर्भ में ढकेलने का प्रयास किया गया। श्री श्यामजी कृष्ण वर्मा के चरित्र लेखक श्री इन्दुलाल याज्ञिक ने इस श्रेष्ठ देशभक्त को अपनी भावांजलि अर्पित करते हुए कहा है-

"श्यामजी कृष्ण वर्मा ने अपने जीवन में जो सैद्धान्तिक भूमिका स्वीकार की, उसे उन्होंने आदि से अन्त तक दृढ़ता के साथ निभाया और अपने जीवन के सर्वोत्तम वर्षों में उन्होंने जो कुछ कहा और लिखा, उससे उन्हें कभी पीछे नहीं हटना पड़ा।' प्रश्न यह है कि भारत की नई पीढ़ी में कितनों ने उनका नाम भी सुना है? कैसे सुनेंगे? आज सम्पादकीय विभागों में बैठे लोगों से ही पूछा जाए कि श्यामजी कृष्ण वर्मा कौन थे, तो बगलें झांकने लगेंगे। मुम्बई से निकलने वाले समाचार पत्रों में से तरुण भारत और लोकसत्ता को छोड़कर शायद ही किसी अन्य अखबार ने इस ओर ध्यान दिया हो।

कच्छ के मांडवी नामक स्थान पर एक अतिसाधारण भानुशाली परिवार में जन्मा यह बालक, जिसके पिता को मुम्बई में अपनी दो जून की रोटी के लिए खटना पड़ता था, केवल अपनी तीव्र मेधा, असीम ज्ञानपिपासा व असामान्य प्रतिभा के सहारे मांडवी के बाद क्रमश: भुज व मुम्बई में शिक्षा प्राप्त करने के लिए पहंुचा। हर स्तर पर अपनी बुद्धिमत्ता की धाक जमाता हुआ विल्सन हाईस्कूल और एल्फिन्स्टन हाईस्कूल में सर्वप्रथम आता रहा। इसके साथ ही परम्परागत पद्धति से वि·श्वनाथ शास्त्री द्वारा संचालित संस्कृत पाठशाला में प्रविष्ट होकर उन्होंने कड़ी मेहनत से संस्कृत, व्याकरण, अमरकोश व धर्मग्रंथों के श्लोकों को कण्ठस्थ करते हुए संस्कृत में धाराप्रवाह बोलने की क्षमता प्राप्त की और रूढ़िवादी व सुधारवादी विद्वानों में 20 वर्ष की उम्र में ही धाक जमा ली। सन् 1875 में ऋषि दयानंद का अनुग्रह प्राप्त कर उनसे पाणिनी की अष्टाध्यायी सीखी और मूर्तिपूजा, बालविवाह, जात-पात व छुआछूत आदि के तर्कशुद्ध खण्डन को आत्मसात कर विधवा विवाह आदि सुधारवादी कार्यक्रमों का प्रचार करना प्रारम्भ किया। उनकी भाषा-शैली ऐसी थी कि रूढ़िवाद का तर्कशुद्ध विरोध करते हुए भी रूढ़िवादियों को नाराज नहीं करती थी और सुधारवादियों को प्रसन्न करती थी। नासिक, पुणे, मुम्बई, सूरत, वडोदरा, लाहौर, वाराणसी आदि सर्वत्र इस युवा पंडित ने अपने पाण्डित्य की धाक जमायी और वह लोगों की चर्चा व कौतूहल का विषय बन गया।

श्यामजी ने इंग्लैंड जाने का निश्चय किया। इंग्लैंड में मोनियर विलियम्स ने उन्हें हर मास 6 पौंड 13 शिलिंग यानी 100 रु. प्रति माह देना स्वीकृत किया जिससे अत्यन्त कठिनाई से गुजारा चलता था। वहां वे हरबर्ट स्पेंसर के विचारों से प्रभावित हुए और उनके ग्रंथों का गहराई से अध्ययन किया। लगभग 6 वर्ष इंग्लैंड में रहकर, वहां अपनी प्रतिभा की धाक जमाकर और ब्रिटिश साम्राज्य के सर्वोच्च शिक्षा संस्थान से डिग्री व वकालत की उपाधि प्राप्त कर वे 1885 में भारत लौटे।

भारत वापस आकर वे मुम्बई में वकालत कर सकते थे किन्तु उन्हें लगा कि भारत की रियासतों में काम करना अधिक लाभदायक रहेगा, क्योंकि स्वामी दयानन्द जी के समान वे भी मानते थे कि यदि भारतीय राजे-रजवाड़ों को प्रेरित किया जा सके तो भारत से ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने के आन्दोलन की वे अगुवाई कर सकते हैं। किन्तु कुछ रियासतों में कार्य करने के बाद उन्हें लगा कि भारत में परिस्थितियां अनुकुल नहीं हैं। अत: इंग्लैंड जाकर वहां से भारत को मुक्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। सन् 1897 को वे इंग्लैंड रवाना हो गए।

1897 से 1907 तक का उनका इंग्लैंड का कार्यकाल अत्यन्त महत्वपूर्ण रहा। इसी अवधि में श्यामजी ने असहयोग का मंत्र दिया जिसे आगे चलकर सन् 1921 में महात्मा गांधी ने अपनाया। उनका कहना था कि भारत में अंग्रेजी राज्य भारतीयों के बल पर ही टिका हुआ है। वहां न कोई गोरे नौकर हैं, न साईस, न रसोईये। अगर देशी लोग एक सप्ताह के लिए भी असहयोग कर दें तो सारा साम्राज्य ताश के पत्ते के समान ढह जाएगा और हर अंग्रेज अफसर अपने ही घर में भूखा कैदी बन जाएगा। इस दिशा में जागृति लाने के लिए उन्होंने तीन उपाय किए। पहला "इंडियन सोशियालाजिस्ट' नामक पत्रिका का प्रकाशन, जो स्वाधीनता तथा सामाजिक व धार्मिक सुधारों के प्रति समर्पित थी। दूसरा, सभी प्रमुख भारतीयों को साथ लेकर "इंडियन होमरूल सोसायटी' का गठन, जिसके तीन उद्देश्य रखे गए थे- 1. हिन्दुस्थान की स्वाधीनता 2. इंग्लैंड में सारे सम्भव उपायों से स्वाधीनता हेतु प्रचार करना व 3. भारत की जनता को स्वतंत्रता व राष्ट्रीय एकता से होने वाले लाभों की जानकारी देना। श्यामजी इसके अध्यक्ष बने। तीसरा काम था "इंडिया हाउस' की स्थापना, जहां श्यामजी द्वारा स्थापित छात्रवृत्ति पाने वाले भारतीय निवास कर सकें।

भारतीय क्रांतिकारियों ने 9 मई, 1907 को श्यामजी के सम्मान में भोज का आयोजन किया था जिसमें डा. पेरेरा ने कहा कि "शिक्षित समुदाय को रक्त क्रांति की बात वीभत्स लगती है पर रक्तिम क्रांति से ही भारत स्वतंत्र हो सकेगा।'

ऐसे महान देशभक्त व क्रांतिकारियों के प्रेरणास्रोत श्यामजी ने अपना संपूर्ण जीवन मातृभूमि की मुक्ति के लिए लगा दिया। उनकी अंतिम इच्छा थी, देश स्वतंत्र हो जाने पर उनकी अस्थियां भारत ले जायी जाएं। सन् 2003 में यह इच्छा पूरी हुई। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद 45 वर्षों तक यह महान सपूत उपेक्षित ही रहा। उस उपेक्षित को नमस्कार करते हुए इन पंक्तियों में सबकी भावना अभिव्यक्त कर रहा हूं।...

ले नमस्ते ओ उपेक्षित!

दु:ख का गुरुभार मां के, शीर्ष तेरा ढो रहा था।

तन जला तेरा उजाला, विश्वभर में हो रहा था।

उस तुझे पाकर भरत भू, हो गई सौभाग्य मंडित।

ले नमस्ते ओ उपेक्षित!

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