भाजयुमो प्रदेश उपाध्यक्ष जयकृष्णन की हत्या के आरोपी


5 कम्युनिस्ट हत्यारों को सजा-ए-मौत

द आलोक गोस्वामी

आखिरकार फैसला आया और तल्लाशैरी के अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने के.टी. जयकृष्णन की हत्या के पांच आरोपियों को सजा-ए-मौत दी। 26 अगस्त की दोपहर अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के.के. चंद्र दास ने एक ऐतिहासिक निर्णय, जो संभवत: कानूनी इतिहास का एक हिस्सा बन जाएगा, सुनाते हुए पांच कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं अचमपरमबथ प्रदीपन (32 वर्ष), कुनहीपुनत्तहिल सुन्दरन (30 वर्ष), नल्लावीतिल शाजी (30 वर्ष), चट्टमबल्ली दिनेश बाबू (29 वर्ष) और के.के. अनिल कुमार (28 वर्ष) को जयकृष्णन की हत्या का दोषी ठहराते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 302 सहित अन्य अनेक धाराओं के तहत मौत की सजा सुनाई। प्रदीपन स्थानीय माकपा समिति का सचिव है, जबकि अन्य चार आरोपी माकपा के कार्यकर्ता हैं। न्यायालय ने पांचों अपराधियों को धारा 449 के तहत आजीवन कठोर कारावास, धारा 342 के तहत एक वर्ष का कठोर कारावास, धारा 148 और धारा 143 के तहत क्रमश: 3 वर्ष और 6 माह की सजा भी सुनाई।

मालाबार में सुखद बदलाव

जयकृष्णन हत्याकांड के 5 आरोपियों को मौत की सजा के संदर्भ में मुख्यमंत्री एंटोनी ने कहा है कि मालाबार क्षेत्र में एक सुखद बदलाव दिखाई दिया है। सुखद बदलाव यह कि पहले जहां राजनीतिक हत्याकांडों में प्रत्यक्षदर्शी अदालत जाकर गवाही देने से कतराते थे वहीं अब लोग आगे आकर गवाही देने लगे हैं। एंटोनी ने कहा, "बीते 8-9 वर्षों में कई राजनीतिक हत्याओं के मामलों की जांच और सुनवाई प्रत्यक्षदर्शियों के गवाही से मुकर जाने के कारण बाधित हुई थीं। यह अच्छी बात है कि अब राजनीतिक संरक्षण में हत्यारों को खुलेआम छूट जाने नहीं दिया जा रहा है।' उल्लेखनीय है कि न्यायाधीश ने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा है कि ये सभी सजाएं एक साथ नहीं, बल्कि अलग-अलग दी जाएं।

शिक्षक के.टी. जयकृष्णन का कसूर क्या था? माकपाई हत्यारों की नजर में उनका कसूर था भाजपा से जुड़ा होना। जयकृष्णन भारतीय जनता युवा मोर्चे के प्रदेश उपाध्यक्ष थे और मोकेरी यूपी स्कूल में शिक्षक थे। 1 दिसम्बर, 1999 को, जिस समय वे कक्षा में पढ़ा रहे थे, घातक हथियारों से लैस ये माकपाई हत्यारे कक्षा में घुसे और छोटे-छोटे बालकों के सामने जयकृष्णन की नृशंसतापूर्वक हत्या कर दी। मासूम बच्चे सहम उठे, उनमें से कई तो मानसिक रोगी हो गए और उन्हें काफी समय तक उस वीभत्स दृश्य का भय सताता रहा था।

सत्र न्यायाधीश चंद्र दास ने फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की कि आरोपियों ने इतना घृणित अपराध किया है कि उनके प्रति किसी प्रकार की दया नहीं दिखाई जा सकती। माकपाइयों की हरकतों को जानते हुए पुलिस ने उस दिन न्यायालय परिसर को पूरी तरह अभेद्य बनाया था। आशंका थी कि माकपाई गुंडे न्यायालय के भीतर घुसकर कहीं तोड़-फोड़ न करें। हालांकि माकपाई सुरक्षा घेरे को तो नहीं भेद पाए परन्तु बाहर रहकर उन्होंने नारेबाजी की और फैसले का विरोध किया। यह पहला ऐतिहासिक फैसला है जिसमें राजनीतिक हत्या पर मौत की सजा सुनाई गई है।

केरल में रा.स्व.संघ और भाजपा के कार्यकर्ताओं के प्रति माकपा इतनी हिंसक रही है कि उन्हें रास्ते से हटाने के लिए वह किसी भी हद तक गई है। 1969 से 2000 के बीच माकपाई अपराधियों ने संघ के 149 से ज्यादा स्वयंसेवकों की हत्या की है। इसी कालखण्ड में इस्लामी कट्टरवादियों ने 22 संघ स्वयंसेवकों की हत्या की। यही हाल कम्युनिस्ट शासित प. बंगाल का है। 25 वर्ष के वाम मोर्चा राज में कम्युनिस्ट गुंडों ने 1984 से 2001 के बीच 50 से अधिक स्वयंसेवकों की हत्याएं की हैं।

दरअसल केरल में संघ व भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमले 1958 में स्व. नम्बूदिरिपाद के शासनकाल से आरम्भ हुए थे। उस समय कम्युनिस्टों ने पुलिस अधिकारी के सामने एक शाखा पर हमला किया और एक स्वयंसेवक को चाकुओं से गोद डाला था। तब से लेकर आज तक हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों के कार्यकर्ता कम्युनिस्टों के निशाने पर रहे हैं। उन छात्र स्वयंसेवकों की दर्दनाक हत्या को कौन भूल सकता है जिन्हें माकपाई गुण्डों ने पत्थर मार-मारकर नदी में डुबोया था। पथनमथिट्टा में 17 सितम्बर, 1996 को माक्र्सवादी गुण्डों ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के तीन कार्यकर्ताओं 20 वर्षीय अनु, 17 वर्षीय करुणाकरन और 17 वर्षीय सजित कुमार को पम्पा नदी में डुबा दिया था।

बर्बर कम्युनिस्टों ने जहां स्वयंसेवकों की निर्मम हत्याएं कीं वहीं उनके घर-परिवार वालों को भी नहीं बख्शा। अनेक स्वयंसेवकों की माताओं, बहनों को भी हत्यारों ने निर्ममता से मारा, उनके घरों को उजाड़ा, तोड़-फोड़ की, आग लगाई। संघ व भाजपा कार्यालयों में आगजनी की। अपनी इन हरकतों को ये कम्युनिस्ट अपराधी बड़े निडर होकर करते हैं, क्योंकि पुलिस और प्रशासन पर लाल हौवा व्याप्त है। वे ऐसी घटनाओं को देखकर भी अनदेखा करते रहे हैं। कई घटनाओं की तो रपट तक दर्ज नहीं की गई। रपट दर्ज कराने वालों को धमकाकर भगा दिया गया या फिर थाने में घंटों बिठाकर रखा गया। जिन कुछ माकपाई अपराधियों को पकड़ा भी तो किसी कामरेड नेता का फोन आते ही छोड़ दिया गया या "गवाह न मिलने' पर छोड़ दिया गया।

के.टी. जयकृष्णन की हत्या करने वाले कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने भी बड़ी निडरता से हत्या करने के बाद वहां दीवार पर बने श्यामपट पर प्रत्यक्षदर्शियों के लिए चेतावनी लिखी- "अगर किसी ने मुंह खोला तो उसका भी हाल जयकृष्णन जैसा ही होगा।' इतना आतंक!

मोकेरी उसी कुख्यात कण्णूर जिले में स्थित है जहां माकपाई गुंडों का एकछत्र राज चलता है। जहां की बस्तियां, मोहल्ले और नगर कम्युनिस्ट आतंक के साये तले जीने को विवश हैं। अपने प्रिय शिक्षक जयकृष्णन की हत्या का वह वीभत्स दृश्य अपनी आंखों से देखने वाले 6ठी कक्षा के उन मासूम बच्चों ने बताया था कि किस तरह खून के छींटे उनके ऊ पर पड़े थे, कैसे उनकी किताबें रक्त से लाल हो गई थीं। वे चीखकर बाहर भागे थे। 11 वर्ष की छात्रा रेमीशा तो घटना के बाद कई दिनों बाद तक ठीक से सो नहीं पाई, उन हत्यारों के चेहरे उसकी नन्हीं आंखों में उतर आते थे। जयकृष्णन की हत्या के मामले में पुलिस ने कुल 397 लोगों से पूछताछ की थी और 151 गवाहों की गवाही हुई। अपने 105 पृष्ठीय निर्णय में न्यायालय ने पुलिस पर भी संदेह की अंगुलियां उठाई हैं।

बहरहाल जैसी उम्मीद थी, राज्य माकपा इकाई ने न्यायपालिका की अवमानना करते हुए 28 अगस्त की शाम अदालत के इस फैसले के विरुद्ध मोकेरी में प्रदर्शन और विरोध सभा की। इसमें पण्णूर माकपा समिति के नेता उपस्थित थे। प्रदर्शनकारियों ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश चंद्र दास के विरुद्ध अभद्र नारे लगाए।

विडम्बना देखिए, यह विरोध सभा उसी मोकेरी यू.पी. स्कूल के प्रांगण में हुई, जहां जयकृष्णन की हत्या की गई थी। सभा को सम्बोधित करते हुए राज्य माकपा सचिवालय के सदस्य ई.पी. जयराजन ने कहा कि न्यायालय ने "मासूम' माकपा कार्यकर्ताओं को भाजपा नेता जयकृष्णन की हत्या का आरोपी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई है। जयराजन ने कहा कि "मामले की जांच करने वाली पुलिस और स्थानीय लोग जानते हैं कि आरोपी माकपा कार्यकर्ता निर्दोष हैं। न्यायालय के इस पक्षपातपूर्ण फैसले से लोगों का न्यायपालिका से भरोसा उठ जाएगा। माकपा इन निर्दोषों को बचाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ेगी।' इतना ही नहीं, जयराजन ने कहा, "जयकृष्णन जाना-माना अपराधी था और उसे उसके कर्मों का फल मिला है।'

माकपा के इस निर्लज्ज आयोजन के विरोध में केरल के कानून विशेषज्ञों सहित बुद्धिजीवी वर्ग ने अपनी आवाज बुलंद की है। उन्होंने न्यायापालिका के प्रति ऐसी दुर्भावना फैलाए जाने का विरोध करते हुए इसे एक दूषित परम्परा की शुरुआत कहा है। केरल उच्च न्यायालय में अधिवक्ता श्री राज ने कहा कि जयकृष्णन हत्या के मामले पर माकपा नेताओं की ऐसी प्रतिक्रिया दर्शाती है कि किसी इंसान की जिंदगी का उनके लिए कोई मोल नहीं है। वरिष्ठ अधिवक्ता केलु नाम्बियार ने कहा कि माकपा द्वारा इस तरह की बातें करने का अर्थ है कि वे इस निर्मम घटना की जिम्मेदारी स्वीकारते हैं।

इधर मुख्यमंत्री ए.के. एंटोनी ने भी माकपा की इन विरोध सभाओं की भत्र्सना करते हुए इनसे बाज आने को कहा है। एंटोनी ने न्यायमूर्ति चंद्र दास के विरुद्ध माकपा नेताओं की छीका-टिप्पणी और उनके लिए अपशब्द कहे जाने की तीव्र आलोचना की। उन्होंने माकपा को सलाह दी कि न्यायपालिका के विरुद्ध इस तरह की हरकतें न की जाएं। उन्होंने कहा कि अदालत की यह प्रतिक्रिया, कि इस मामले की जांच में पुलिस की भूमिका संदिग्ध रही है, की भी वे पड़ताल करेंगे।

इस बीच पता चला है कि माकपा के रवैए के तीखे विरोध को देखकर कामरेडों ने अब आगे इस मामले में चुप्पी साध लेना तय किया है। परन्तु माकपा नेताओं ने कानूनी सलाह लेकर फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देने का मन बनाया है। मुख्यमंत्री एंटोनी की एक उक्ति ध्यान देने योग्य है कि यह फैसला "हत्या की राजनीति' करने वालों के लिए एक निरोधक जैसा होगा। लेकिन इससे कम्युनिस्टों के शातिर इरादों पर लगाम लगेगी, इस पर जानकारों को संदेह है।

दुनियाभर, चाहे पूर्व सोवियत रूस हो, चीन या यूरोप के कुछ देश, कम्युनिस्ट विचारधारा आखिरी सांसें लेती देखी जा सकती है। लेनिन का सोवियत रूस ढह गया, माओ के चीन की लालिमा पर बाजार का रंग हावी होता जा रहा है। जिस माक्र्स और स्टालिन के विचारों का कम्युनिस्ट दम भरते हैं उनके जरा भाषण देखिए, हिंसा की बू आती है उनमें। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि ढहते कम्युनिज्म का हिंसात्मक रवैया खलबली या हताशा को दर्शाता है। वे छटपटा रहे हैं इसलिए मानवीय मूल्य और संवेदनाएं उनके लिए कोई मायने नहीं रखतीं। बस किसी पर भी बुर्जुआ का लेबल चिपकाओ और खत्म कर दो, यही मूलमंत्र दिखता है उनका। राजनीतिक विरोधियों को वैचारिक स्तर पर नहीं तो हिंसा के जरिए खत्म करो, यह ध्येय है।

जयकृष्णन की हत्या के मामले में अदालत के फैसले की सभ्य समाज ने प्रशंसा की है। पशुता के उन्माद में हिंसक हत्यारों को सजा-ए-मौत से कम दिया भी क्या जा सकता था? द

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