इतिहास के पन्नों में नहीं है नाम जिनका
वचनेश त्रिपाठी "साहित्येन्दु'
सन् 1910 में नागपुर से केशवराव बलिराम हेडगेवार पढ़ाई हेतु कोलकाता गए थे। वहां उनका मुख्य उद्देश्य था, क्रांतिकारी दल में शामिल होकर देश को सशस्त्र क्रांति के द्वारा स्वतंत्र कराना। उन्हें दाजी साहब बुटी से आर्थिक सहायता दिलाकर कोलकाता के पुलिन बिहारी दास के संपर्क में रहकर क्रांति कार्यों की श्रृंखला चलाने हेतु भेजा गया था। यह प्रमाण अमरीका निवासी जाने-माने क्रांतिकारी नेता श्री रामलाल वाजपेयी ने अपने आत्म-चरित्र में संजोया है। वाजपेयी जी डा. हेडगेवार के परम मित्र थे। क्रांतिकारी माधवदास संन्यासी के द्वारा नागपुर के क्रांतिकारी दल स्वदेश बान्धव समिति का सम्बंध बंगाल के क्रांतिकारी दल से जुड़ा था। प्रसिद्ध क्रांतिकारी डा. पाण्डुरंग सदाशिव खानखोजे नागपुर की स्वदेश बान्धव समिति के नेता थे। डा. हेडगेवार कोलकाता से अपने साथ हथियार लाकर इस संस्था को दिया करते थे। अनुशीलन समिति में डा. हेडगेवार को प्रसिद्ध क्रांतिकारी नेता त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती ने एक अन्य क्रांतिकारी नलिनी किशोर गुहा के माध्यम से भर्ती किया था। त्रैलोक्यदा ने अपनी आत्मकथा "जेले त्रीश बछर' (जेल में 30 वर्ष) में डा. हेडगेवार का परिचय क्रांतिकारी के नाते दिया है और उन्हें अपने क्रांतिकारी दल का सदस्य प्रमाणित किया है। त्रैलोक्यदा बाद में भी, जब द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था, डा. हेडगेवार से नागपुर आकर मिले थे। डा. हेडगेवार का योगेश चंद्र चटर्जी, राजस्थान के क्रांतिकारी पं. अर्जुनलाल सेठी, नागपुर के विनायक राव कापले, शिव रामहरि राजगुरु, वीर सावरकर और उनके अनुज डा. नारायण राव सावरकर, बम निर्यातक क्रांतिवीर डा. वी.वी. आठले से संपर्क रहा था। डा. वी.वी. आठले बम बनाते- बनाते ही कोलकाता के निकट ही 2 सितम्बर सन् 1911 को बीमार होकर चल बसे। उस दिन डा. वी.वी. आठले की चिता को डा. हेडगेवार और उनके सहकर्मी क्रांतिकारी श्यामसुन्दर चक्रवर्ती और डा. हार्डीकर ने ही अग्नि दी थी। गुप्त रूप से एक गांव में ही उस क्रांतिकारी की चिता इन लोगों ने जलाई थी ताकि पुलिस को उस की जानकारी न हो सके। डा. आठले पहले सतारा षड्यंत्र केस में गिरफ्तार हुए थे और जेल में 7 दिन का अनशन भी किया था। यह केस कोल्हापुर में 7 महीने चला था। सन् 1907 में सतारा में सावरकर बन्धुओं ने एक कार्य-संघ नामक दल कायम किया था। यह वीर सावरकर की अभिनव भारत समिति की ही एक शाखा थी। यहीं बम बनाते हुए एक बार 3 युवक पकड़े गए थे, जिनमें डा. वी.वी. आठले और सेनापति बापट भी थे। डा. वी.वी. आठले का जन्म महाराष्ट्र के जिला रत्नागिरी के शियोशी नामक स्थान पर 14 नवम्बर, 1879 हुआ था। क्रांतिकारी जीवन में उनका एक छद्म नाम अण्णा था और दूसरा एक बंगाली नाम भी था। ये जर्मनी, इटली, अमरीका आदि देशों में भी घूम चुके थे। उन्होंने शियोशी से ही मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की थी, पर बालशास्त्री हरदास के वृहत मराठी ग्रंथ क्रांति इतिहास में सतारा षड्यंत्र केस और डा. वी.वी. आठले का कहीं नाम ही नहीं है। समय के साथ डा. वी.वी. आठले का नाम धुंधला पड़ गया। हालांकि डा. आठले का एक चित्र कोलकाता के उसी पुराने मराठा लाज में अवश्य उपलब्ध है।
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