पुरानी नींव पर नए निर्माण का संकल्प जब जागता है तो एक ठोस वर्तमान और सुनहरा भविष्य दिखाई देता है। वही वि·श्वास आंखों में लिए युवा पीढ़ी चुनौती देती है।
पुस्तक का नाम- अतिशय
लेखिका - मृदुला सिन्हा
पृष्ठ - 498
मूल्य - 500 रुपए
प्रकाशक - प्रतिभा प्रतिष्ठान
1661 दरबनी राय स्ट्रीट,
नेताजी सुभाष मार्ग नई दिल्ली-110002
हम शिलालेख हैं इतिहास है हमसे कायम
हमसे जूझेंगी जमाने की हवाएं कब तक।।
सद्य: प्रकाशित उपन्यास "अतिशय' पढ़ते हुए पाठक इसके पात्रों के साथ-साथ तमाम झंझावतों से जूझता हुआ अंतत: मंथन का नवनीत ग्रहण करता है। ये भोगोपभोग, भौतिकता के झंझावत व्यक्ति को भटकाते हैं और भटकते हुए भी व्यक्ति को अनुभूति होती है कि जीवन का सत्य यही है, यह वर्तमान ही जीवन का मूल सूत्र है। और जब अंधड़ गुजर जाता है तब व्यक्ति को अहसास होता है कि वह जिस जमीन पर खड़ा है, वहां चारों तरफ सिर्फ बियाबान ही बियाबान है और तब वह सनातन सत्य का सूत्र टटोलता है। जब वह सूत्र उसके हाथ आ जाता है तब उसे अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों साफ-साफ अलग-अलग खांचे में दिखाई देने लगते हैं। लेखिका मृदुला सिन्हा ने बड़ी खूबी से अपने इस मूल कथ्य को पाठकों तक पहुंचाने लिए सामान्य जन-जीवन में से पात्र टटोले और उन पात्रों के जरिए उपन्यास की कथा का ताना-बाना बुनती चली गईं। "अतिशय' की कथा पीढ़ियों के संघर्ष को ही नहीं, अपितु भारत की सनातन संस्कृति और पश्चिम की उपभोक्तावादी संस्कृति के संघर्ष को भी दर्शाती है। "अतिशय' की कहानी दो प्रगाढ़ युवा मित्रों रजनीश और यतीन्द्र नाथ गोयनका के इर्द-गिर्द घूमती है। दोनों दो अलग-अलग जीवन धाराओं के प्रतीक हैं। भोगवादी दर्शन के कायल यति की आंखों में देश का बड़ा उद्योगपति बनने का सपना और दृढ़ संकल्प है, तो रजनीश दर्शनशास्त्र का, भारतीय सनातन मूल्यों को मानने वाला मेधावी छात्र है। दोनों अपनी-अपनी राह चलते हैं, लेकिन कोई ऐसा बिन्दु है जो इन दो विपरीत धुरों को आपस में बांधे रखता है। वर्तमान को जीवन का सत्य मानने वाला भोगवादी, महत्वाकांक्षी यति एक के बाद एक अपना कारोबार बढ़ाता जाता है- मिल, होटल... एक पैर दिल्ली में, एक पैर मुम्बई में। थके-मांदे, तनावग्रस्त यति को चाहिए अपनी पत्नी शिवानी का आंचल, जहां वह सब कुछ भूल जाए। किन्तु शिवानी पति का सदैव यह मांगी रूप अंगीकार नहीं कर पाती, क्योंकि उसे संस्कार में दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक अपने विद्वान पिता से मिले हैं सनातन भारतीय मूल्य। शिवानी की अवहेलना यति को संस्कारवान उद्यमी मित्र शर्मिष्ठा के करीब ले आती है। यति की व्यवसायिक सफलता का आधार बनी शर्मिष्ठा को यति अपने जीवन का भी आधार मानने लगता है। संबंधों की परिणति अविवाहित शर्मिष्ठा के मातृत्व में होती है। यति शर्मिष्ठा, शिवानी के भीषण अंधड़ में खो जाता है और दोनों ही अपने-अपने बेटों को लेकर उससे दूर चली जाती हैं। बड़ा उद्योगपति बनने का सपना भी तेज आंधी में हिचकोले खाने लगता है, लेकिन इसे एक बार फिर थामती हैं सनातन मूल्यों की प्रतीक शिवानी और उसकी खोज एक महत्वकांक्षी युवा पुरुषार्थ। अधुनातन और पुरातन मूल्यों को साथ लेकर चलने वाला अमरीका में पढ़ा भारतीय संस्कारों और आधुनिक शिक्षा के अस्त्रों से लैस पुरुषार्थ अपने कर्मयोग से दिखा देता है कि किस प्रकार पुरानी नींव पर नव निर्माण कर भारत को वि·श्वगुरु के पद पर पहुंचाया जा सकता है। यह भारतीय जीवन-पद्धति की ही विशेषता है जो जीवन को टुकड़ों-टुकड़ों में बांटकर नहीं देखती अपितु समग्रता में देखती है। भारत की इसी विशेषता को अपने प्रशंसकों के बीच व्याख्यायित करते हुए डा. रजनीश कहते हैं, "दरअसल हम जीवन को टुकड़ों में देखने के आदी नहीं हैं। हमारे रास्ते भिन्न हैं, पर लक्ष्य एक हैं।.... कृष्ण की गीता हो या कौटिल्य का अर्थशास्त्र, धन्वंतरि का शरीरशास्त्र अथवा चाणक्य का राजशास्त्र सबका लक्ष्य एक है।' "एक सद् विप्रा: बहुधा वदन्ति।'
इसी भारतीय जीवन-पद्धति का लोहा अब विश्व मानने लगा है। भारतीय जीवन मूल्यों को स्थापित करती "अतिशय' उपन्यास की कथा को लेखिका ने इस खूबी से बुना है कि जब पाठक एक बार पढ़ने बैठता है तो उसमें इस प्रकार डूब जाता है कि 498 पृष्ठों का महाकाय उपन्यास कब समाप्त हुआ, उसे पता नहीं चलता। सभी पात्र अपने आस-पास विचरने लगते हैं, भारतीय दर्शन और सनातन जीवन मूल्यों की घुट्टी भी पिलाते हुए ये पात्र पाठक के हाथ में नवनीत सा रखते प्रतीत होते हैं। "अतिशय' के नारी पात्रों को लेखिका ने एक मजबूत धरातल पर आधुनिक संदर्भों में खड़ा किया है। ये नारी पात्र आधुनिक संदर्भों में हमारे पौराणिक पात्रों शकुंतला, ऐतिहासिक पात्र सीता, शर्मिष्ठा और माता जीजा बाई का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। सनातन और आधुनातन मूल्यों को लेखिका ने इस रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है कि पाठक कहीं भी ऊब का अनुभव नहीं करता। घटनाओं का कसाव और भाषा का लोच उसे बांधे रखता है। यही है "अतिशय' की पठनीयता का कारण।
द विनीता गुप्ता
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