कही-अनकही आंदोलनकारी सरकार


द दीनानाथ मिश्र

यह आंदोलनप्रिय देश है। 1947 के पहले भी आंदोलन होते थे। "अंग्रेजों भारत छोड़ो' आन्दोलन अर्थात् धरना, जुलूस, बंद, नारे, पोस्टर, परचे, लाठी, गोली, जेल, आगजनी, तोड़-फोड़ वगैरह। अंग्रेजों को हिन्दी नहीं आती थी। फिर भी भारत छोड़ो को वह समझ गए। तरह-तरह के लोग इसमें लगे थे। बातों से भूत भगाने वाले भी और लातों वाले भी। खैर, वे चले गए मगर आंदोलन होते रहे। साठ के दशक में छात्र आंदोलन बहुत हुए। यही छात्र पीढ़ी जब सत्तर और अस्सी के दशक में आई तो देश आंदोलनमय हो गया। गुजरात आंदोलन, बिहार आंदोलन, चक्का जाम आंदोलन, सड़क जाम आंदोलन। कालेज बंद से लेकर भारत बंद तक। भूख हड़ताल से लेकर आमरण अनशन तक।

एक दिन एक पुराने छात्र नेता घर आए। मैंने उनके सामने एक समस्या रखी। तपाक से उन्होंने कहा, "इस पर तो आंदोलन होना चाहिए।' मैं समझ गया कि मेरे मित्र समाज की आंदोलन की भूख को समझते हैं। पिछले महीनों में आंदोलन उतने नहीं हुए, जितनी समाज की भूख थी। इसीलिए मेरे मित्र मुद्दा मिलते ही तपाक से बोले थे। उन दिनों राजनीतिक दलों के नेताओं की बैठक, किस विषय पर आंदोलन करें, इस पर विचार करने के लिए होती थी। विषय नहीं मिलता तो जेल भरो आंदोलन करते थे। आंदोलन करने का फैसला पहले करते थे, मुद्दे बाद में तलाश करते थे।

अभी उस दिन प्रधानमंत्री अटल जी ने कर्नाटक के कोलार में कहा कि बिजली उत्पादन को बढ़ाने के काम को आंदोलन का रूप देना चाहिए। उनको भी आंदोलन की लत लगी हुई है। आंदोलनों की पीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते ही वह यहां तक पहुंचे है। पुरानी लत है, छूटती नहीं। सरकार में आकर भी आंदोलन कर रहे हैं, करा रहे हैं। उनकी आंदोलनकारी सरकार ने जाने कितने विभागों का बेड़ा गर्क कर दिया, कुछ का करने में लगी है। कोलार के बयान से लगता है कि आगे उनके इरादे नेक नहीं हैं।

दूरभाष विभाग को ही लीजिए। क्या ही अच्छा जमाना था वो। हर टेलीफोन पर विभागीय कर्मचारियों के दस-बीस तो कभी पचास हजार बन जाते थे। लाइनमैन नए टेलीफोन का नम्बर बताने की भी अपनी फीस ले जाता था। पिछले तीन साल में इतने टेलीफोन कनेक्शन दिए, जितने पचास साल में नहीं दिए गए। इस विभाग वालों से पूछिए कि उनकी हालत कितनी बिगड़ गई है। कारण वही है, आंदोलन। ये तो सरकार में आने के बाद भी आंदोलन कर रहे हैं। एक, दूसरे आंदोलनकारी मंत्री हैं। उन्होंने रसोई गैस वितरण को भी आंदोलन गियर में डाल दिया है। ये रिश्वतप्रिय विभाग भी एक-एक गैस कनेक्शन का अपना जो हक बनता था, उसे लेकर ही देता था। जितने गैस कनेक्शन आदि काल से पिछली शताब्दी की शाम तक दिए गए थे, इस आंदोलनकारी सरकार ने उससे ज्यादा रसोई गैस तीन साल में दे दिए। आज जब कम्पनियों वाले फेरी वालों की तरह हांक लगाकर रसोई गैस बांट रहे हैं तो कोई रि·श्वत की गुंजाइश कहां बचती है?

कोई पूछ सकता है- अटल जी, आप सरकार चला रहे हैं या आंदोलन कर रहे हैं? पहले वो सड़क पर उतरकर आंदोलन करते थे, अब सड़क का आंदोलन चला रहे हैं। चार और छह लेन की सड़क बनाने का औसत प्रतिवर्ष सवा किलोमीटर का था। अब प्रतिदिन का औसत पांच किलोमीटर का है; पहले सड़क पर जुलूस, नारे, लाठीचार्ज वगैरह का आंदोलन होता था, अब प्रधानमंत्री स्वर्णिम चतुर्भुज पर देश में डेढ़ सौ जगह पर चार और छह लेन की सड़क बनाने का आंदोलन चल रहा है। सरकार ही जब आंदोलन करे तो उससे कौन बचाए? एक दो चैनल थे, सौ-सौ चैनल हो गए। आदमी क्या देखे, कब तक देखे और क्या टी.वी. ही देखता रहे? सब कुछ देखने का दर्द क्या रहता है? सरकार दर्द दे तो उससे कौन बचाए? और अब अटल जी फरमाते हैं कि बिजली उत्पादन बढ़ाने को भी आंदोलन का रूप देना चाहिए। नदियों को भी आंदोलन गति से जोड़ने की बात की है। जब तक सत्ता में नहीं थे तब तक एक समय में एक आंदोलन ही करते थे। अब सत्ता में हैं, एक साथ कई-कई आंदोलन कर रहे हैं। क्या आंदोलन का अर्थ पूरी तरह बदल देने का इरादा है?

8