सेकुलरों की "देशभक्ति' अनावृत


संसद के केंद्रीय कक्ष में गत 26 फरवरी को राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने स्वातंत्र्यवीर सावरकर के तैल चित्र का अनावरण किया। उल्लेखनीय है कि 5 दिसम्बर, 2002 को लोकसभा अध्यक्ष श्री मनोहर जोशी की अध्यक्षता में संसद में चित्रों की स्थापना हेतु संयुक्त समिति की बैठक में संसद के केन्द्रीय कक्ष में वीर सावरकर का चित्र लगाने का निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया था। छह सदस्यीय इस समिति के सदस्यों में माकपा के वरिष्ठ नेता श्री सोमनाथ चटर्जी तथा कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेता श्री प्रणव मुखर्जी और श्री शिवराज पाटिल भी हैं। ये सभी उस बैठक में उपस्थित थे और इन्होंने इस निर्णय को अपनी सहमति भी दी थी। परंतु अनावरण समारोह से ठीक एक दिन पूर्व संपूर्ण विपक्ष ने पलटी मारते हुए इसका विरोध प्रारंभ कर दिया। पहले गैरकांग्रेसी विपक्ष, जिसमें सपा, बसपा, माकपा, भाकपा, राजद आदि सम्मिलित हैं, ने 25 फरवरी को एक विरोध पत्र महामहिम राष्ट्रपति को भेजा। इस पर पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौडा, मुलायम सिंह यादव, सोमनाथ चटर्जी समेत कुल 15 विभिन्न विपक्षी नेताओं के हस्ताक्षर हैं। इस पत्र पर शरद पवार ने हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। लेकिन कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने अपनी सहमति जताते हुए उसी दिन एक पत्र महामहिम राष्ट्रपति को भेज दिया। कांग्रेस और शेष विपक्ष हालांकि इस बात का उत्तर नहीं दे पा रहे हैं कि आखिर जब उनके वरिष्ठ नेताओं ने समिति में इसे सहमति दे दी थी तो फिर विरोध किस बात का है। सोमनाथ चटर्जी कहते हैं कि उनसे भूल हो गई और उन्हें बाद में ध्यान आया। यह विरोध उनकी भूल का प्रायश्चित है। उल्लेखनीय है कि श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपने कार्यकाल में स्वातंत्र्यवीर सावरकर के सम्मान में डाक टिकट जारी किया था। 20 मई, 1980 को श्रीमती गांधी ने स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक संस्था के सचिव श्री पंडित बाखले को पत्र लिखकर भारत के इस महान सपूत की जन्मशती मनाने पर शुभकामनाएं देते हुए कहा था- "स्वातंत्र्य संघर्ष के पन्नों में वीर सावरकर द्वारा किया ब्रिटिश सरकार का प्रबल प्रतिकार एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।' आज विपक्ष ने सावरकर को गांधी हत्याकांड का दोषी ठहराने की कुचेष्टा की है, लेकिन वे इस विषय पर न्यायालय की उपेक्षा कर जाते हैं जिसने इस अभियोग से श्री सावरकर को बाइज्जत बरी किया था। गत 26 फरवरी को लोकसभा में गोरखपुर के सांसद योगी आदित्य नाथ ने विपक्ष द्वारा अनावरण समारोह के बहिष्कार का निंदा प्रस्ताव रखा। इसके उत्तर में शालीन चर्चा करने की बजाय संपूर्ण विपक्ष उत्तेजित हो उठा और सदन में हंगामा खड़ा कर दिया। उस हंगामे में जिसने जो कहा, वह सब तथा गैर कांग्रेसी विपक्ष व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा राष्ट्रपति को लिखे पत्रों का अविकल पाठ यहां प्रस्तुत है। सं.

सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति को लिखा-

इससे गंभीर विवाद पैदा हुए

"संसद के केंद्रीय कक्ष में कल 26 फरवरी को वी.डी. सावरकर के चित्र के अनावरण कार्यक्रम में विपक्षी दलों के उपस्थित हो पाने में हमारी असमर्थता के प्रति मैं अपनी सहमति प्रकट करती हूं।

हमारा भाव आपकी अवमानना करने का नहीं है, लेकिन कांग्रेस पार्टी की सर्वसम्मत भावना यही है। हमारा मानना है कि चूंकि इससे अनेक गंभीर विवाद पैदा हुए हैं, शायद आप अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहेंगे।' लोकसभा में किसने, क्या कहा...

यह सीधे-सीधे देश के महान क्रान्तिकारियों का अपमान है और इसकी निंदा की जानी चाहिए। संसद के द्वारा निंदा प्रस्ताव पारित होना चाहिए। यह देश के महान स्वतंत्रता सेनानियों का निरादर है।

-योगी आदित्यनाथ, भाजपा सांसद, गोरखपुर

ये सांप्रदायिक लोग हैं ...... ये जानबूझकर ऐसे हालात पैदा करना चाहते हैं जिसकी वजह से समाज में शान्ति न रहे।

-रामजी लाल सुमन

सपा सांसद, फिरोजाबाद

हमने इसका बहिष्कार किया है, ये लोग गांधी के हत्यारे हैं।

-कुंवर अखिलेश सिंह, सपा सांसद, महाराजगंज

गैर कांग्रेसी विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति को लिखा-

सावरकर की नीतियां अलगाववादी

"संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में, जहां भारत का संविधान बना और लागू हुआ, विनायक दामोदर सावरकर के चित्र के अनावरण करने के निर्णय से देश के सेकुलर राजनीतिक दलों और सामान्य जनता में काफी आक्रोश है। जैसा आप जानते हैं कि हमारा संविधान राष्ट्र के सेकुलर स्वरूप को प्राथमिकता देता है। यदि संसद भवन के केंद्रीय कक्ष का उपयोग विनायक दामोदर सावरकर का चित्र लगाने में किया तो यह एक बहुत दु:खद घटना होगी। सावरकर न केवल गांधी हत्याकांड के दोषी हैं, बल्कि उन्होंने जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद के सिद्धान्त का भी समर्थन यह कहकर किया था कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र होना चाहिए।'

"सावरकर समग्र' के

शेष पांच खण्ड भी प्रकाशित

वीर सावरकर की पुण्य तिथि के अवसर पर जहां राष्ट्रपति ने संसद में तैल चित्र का अनावरण किया, वहीं हिन्दी के पाठकों को वीर सावरकर के सम्पूर्ण साहित्य का अनुपम उपहार भी मिला है। दिल्ली स्थित देश के सुप्रसिद्ध प्रकाशन गृह प्रभात प्रकाशन द्वारा गत अनेक वर्षों से वीर सावरकर के सम्पूर्ण साहित्य और भाषणों का विशाल भंडार प्रकाशित करने का गुरुतर कार्य हाथ में लिया गया था। गत वर्ष इसके प्रारंभिक पांच खण्डों का लोकार्पण प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था और अब शेष पांच खंड भी प्रकाशित हो चुके हैं। ये दस खण्ड, जिनमें से प्रत्येक खण्ड की पृष्ठ संख्या 600 से अधिक है, पांच सौ रुपए प्रति खण्ड की दर से उपलब्ध हैं। इन्हें प्राप्त करने के लिए इस पते पर सम्पर्क किया जा सकता है-

प्रभात प्रकाशन, आसफ अली मार्ग, नई दिल्ली-110002

सावरकर के स्मरण में संकोच दुर्भाग्यपूर्ण

-वसंत साठे, पूर्व केन्द्रीय मंत्री व वरिष्ठ कांग्रेसी नेता

14 जुलाई, 2000 को प्रधानमंत्री निवास पर वीर सावरकर के जीवन पर आधारित ग्रंथमाला "सावरकर समग्र' के 5 खण्डों का लोकार्पण श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था। इस कार्यक्रम में श्री वसंत साठे ने कहा था-

"सावरकर समग्र' के हिन्दी में प्रकाशन से एक बहुत बड़ा काम हुआ है। हम लोग जब भी बटुके·श्वर दत्त, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, राजगुरु जैसे क्रांतिकारियों के नाम सुनते हैं, तो सर आदर से झुक जाता है। पर ऐसे सैकड़ों क्रांतिकारी निर्माण करने वाले सावरकर को याद करने में राष्ट्र संकोच करता है, यह बहुत बड़ा दुर्भाग्य है। इसका कारण है कि वीर सावरकर के बारे में अनेक भ्रांतियां फैलाई जाती रहीं। गांधीवध से उनका झूठा सम्बन्ध जोड़ने की कोशिश हुई। "सावरकर समग्र' में गांधी और नेहरू के विषय में सावरकर के प्रशंसात्मक विचारों को पढ़कर कुछ लोगों को आश्चर्य हो सकता है। सावरकर तो हिन्दू महासभा और कांग्रेस को परस्पर अधिक से अधिक निकट लाना चाहते थे। सावरकर यदि कुछ भी नहीं होते और यदि केवल साहित्यकार होते, तो भी साहित्य क्षेत्र में महान होते। उन्होंने डा. अम्बेडकर से पहले रत्नागिरी में पतित पावन मन्दिर बनाकर सामाजिक समरसता का अभियान शुरू कर दिया था। वे अंधश्रद्धा निर्मूलन के अग्रगामी थे। वे हिन्दुओं से कहते थे कि गो-पालन करो, गो-पूजा नहीं। इससे उनका अर्थ था कि लापरवाहीपूर्वक गाय की उपेक्षा करते हुए उसकी पूजा का ढोंग रचना व्यर्थ है।'

सावरकर- एक महान विभूति

रा.स्व.संघ के सह प्रवक्ता श्री राम माधव ने 25 फरवरी, 2003 को जारी एक प्रेस वक्तव्य में इस प्रकरण पर राजनीति करने वालों की भत्र्सना की है। श्री राम माधव ने स्वातंत्र्यवीर सावरकर के सम्बन्ध में विभिन्न विभूतियों द्वारा व्यक्त उद्गारों का भी उल्लेख किया है जो इस प्रकार हैं-

सावरकर साहस, हिम्मत तथा देशभक्ति के प्रतीक और राष्ट्रीय नायक थे। -श्री राजगोपालाचारी यदि भारत ने सावरकर की सैन्यकरण की नीति को अपनाकर उसके अनुरूप अपने को तैयार किया होता तो आज भारत इस अप्रिय स्थिति में न होता। -जनरल करिअप्पा,प्रथम कमाण्डर-इन-चीफ (1962 में चीन युद्ध में हार के बाद व्यक्त विचार) सावरकर समकालीन भारत की एक महान विभूति थे और उनका नाम साहस और देशभक्ति का पर्याय है। वे एक आदर्श क्रांतिकारी के सांचे में ढले थे और अनगिनत लोगों ने उनके जीवन से प्रेरणा ली।

-श्रीमती इंदिरा गांधी

मैं नौजवानों से हमेशा कहता हूं कि धार्मिक लोगों के लिए भले ही केदारनाथ, बदरीनाथ, काशी, रामे·श्वरम तीर्थ स्थान होंगे, पर देशभक्तों के लिए यदि कोई तीर्थ स्थान है तो वह है अंदमान। अंदमान में भी पोर्टब्लेयर और उसमें भी सेल्युलर जेल और सेल्युलर जेल में भी वह कक्ष जहां सावरकर जी ने सजा काटी थी। -श्री लालकृष्ण आडवाणी, उपप्रधानमंत्री (14 जुलाई, 2000 को "सावरकर समग्र' ग्रंथमाला के लोकार्पण अवसर पर व्यक्त विचार)

सावरकर केवल राजनीति के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि काव्य व साहित्य के क्षेत्र में भी महान थे। हम सब तो उनकी महानता के समक्ष बहुत बौने हैं। -श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर, ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार हम आपकी अविस्मरणीय साहसपूर्ण उपलब्धि को श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं। महासागर को पार कर स्वाधीनता की पुन:प्राप्ति स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में हमेशा याद रखी जाएगी।

-श्री वायलेट एवं श्री जोआचिन अल्वा, कांग्रेस सांसद

(5 फरवरी, 1966 को सावरकर को लिखे एक पत्र में)

सावरकर साम्राज्यवाद विरोधी महान क्रांतिकारियों में से एक थे।

-श्री श्रीपाद अमृत डांगे,अध्यक्ष, कम्युनिस्ट पार्टी

सावरकर राष्ट्रवाद, साहस और सामाजिक एकता का अद्वितीय मिश्रण थे। -श्री यशवन्त राव चव्हाण, पूर्व रक्षामंत्री

सावरकर एक महान देशभक्त और भारतमाता के यशस्वी सुपुत्र थे। सावरकर जैसे क्रांतिकारियों ने ऐसा माहौल बनाया जिसने महात्मा गांधी की सफलता संभव की। यदि भारत के लोग सावरकर को भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान नहीं देते, तो यह देश के प्रति उनकी कृतघ्नता होगी। -श्री मोहम्मद करीम छागला, पूर्व शिक्षा मंत्री

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