निष्कृतिर्विहिता राजन् कृतघ्ने नास्ति निष्कृति:।।
हे राजन्! ब्राह्म हत्यारे, शराबी, चोर तथा व्रत तोड़ने वाले के लिए शास्त्र में प्रायश्चित का विधान है, परन्तु कृतघ्न के उद्धार का कोई उपाय नहीं बताया गया है।
-वेदव्यास (महाभारत, शान्ति पर्व, 172/25)
राष्ट्रहित-निरपेक्ष विरोध
वैचारिक महाभारत के शिविर और रणनीतियां स्पष्ट होती जा रही हैं। पर इसके साथ ही जो अकल्पनीय लगता था, वह भी घटित हो रहा है। वीर सावरकर, जो स्वातंत्र्य संघर्ष और क्रांतिकारी जिजीविषा के प्रतिमान महापुरुष हैं, के विरुद्ध वामपंथियों द्वारा प्रारंभ और दामपंथी कांग्रेसियों द्वारा अपनाए गए अभियान ने देशभक्तों को स्तब्ध ही किया। वे कम्युनिस्ट जो अंग्रेजों के चाटुकार रहे, जिन्होंने अंग्रेजों के साथ मिलकर भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को पलीता लगाया, जिन्होंने गांधी, सुभाष और विवेकानन्द जैसे महापुरुषों के प्रति अपशब्द कहे, जो '62 के युद्ध में गद्दारी के लिए कुख्यात रहे, वे वीर सावरकर के विरुद्ध विषवमन का नेतृत्व करें तो आश्चर्य नहीं मानना चाहिए। लेकिन उनके साथ जो बाकी लोग और दल जुड़े हैं, उनके बारे में क्या कहा जाए? कांग्रेस अपने गिरेबां में झांकने की कोशिश नहीं करती। कांग्रेस भूल गई कि उसके नेता पं. नेहरू ने खुद को भारत का आखिरी अंग्रेज शासक होने की विकृत दम्भोक्ति की थी। भारत में अमरीका के पूर्व राजदूत श्री गालब्रोथ ने अपनी पुस्तक में स्पष्ट कहा है कि पं. नेहरू ने उनसे कहा था कि वे स्वयं को भारत का अंतिम अंग्रेज शासक समझते हैं। कांग्रेस ने वीर सावरकर के चित्र का विरोध कर सिद्ध कर दिया है कि उसका उस कांग्रेस से कोई लेना-देना नहीं रह गया है जो स्वातंत्र्य संघर्ष में अग्रणी रही थी। वह केवल इतालवी चाटुकारों की अभारतीय कम्पनी मात्र बनकर रह गई है, जो येन-केन-प्रकारेण सत्ता-सुख भोगने के लिए आतुर है।
टेलीकाम में विदेशी पूंजी निवेश
भारत सरकार ने टेलीकाम क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश को 49 प्रतिशत से 74 प्रतिशत करने का निर्णय लिया है। यद्यपि इस निर्णय को मंत्रिमण्डल की मंजूरी नहीं मिली है, परंतु इस सम्बंध में अभी से स्वदेशी हितचिन्तकों के मन में गहरी चिंताएं व्याप्त हो गई हैं। टेलीकाम अर्थात् सूचना प्रसारण की राष्ट्रीय प्राणवाहिनी, किसी भी देश के लिए अत्यंत संवेदनशील होता है। यह समझ में नहीं आता कि जिस क्षेत्र में पूंजी निवेश के लिए अमरीका, इंग्लैण्ड और चीन जैसे देश भी हिचकिचाते हैं और विदेशी पूंजी निवेश की अनुमति नहीं देते, उस क्षेत्र में भारत को 74 प्रतिशत तक विदेशी पूंजी निवेश देने की क्या आवश्यकता थी? इसमें संदेह नहीं कि पिछले कुछ समय में भारत ने टेलीकाम क्षेत्र में काफी प्रगति की है और आम आदमी को सस्ते फोन जल्दी मिलने लगे हैं। लेकिन जहां इस बात की प्रशंसा की जानी चाहिए, वहीं इस क्षेत्र में चिन्ताजनक बातों पर ध्यान दिलाया जाना आवश्यक है। कुछ खतरे इस प्रकार हैं-1. विदेशियों के स्वामित्व वाली टेलीकाम कम्पनियों को भारत के उच्च सुरक्षा क्षेत्रों तथा संवेदनशील ठिकानों तक पहुंच का खुला मौका होगा। 2.जिन क्षेत्रों में विदेशी कम्पनियों की सेवाएं होंगी, उनमें उनके उपकरणों तथा तानेबाने से गुजरने वाली दूरभाषीय बातचीत को सुनने और रिकार्ड करने का भी उनके पास पूरा मौका होगा। 3. किसी भी आपदा के समय, जिनमें दंगे, झगड़े, युद्ध या अन्य राष्ट्रीय आपदाएं सम्मिलित हैं, संचार व्यवस्था इन्हीं कम्पनियों की मेहरबानी पर निर्भर होगी और वे चाहें तो संचार सेवाओं को किसी भी बहाने से बाधित कर सकेंगे। 4. यह भी चर्चा है कि कुछ कम्पनियां विदेशी पूंजी निवेश 74 प्रतिशत तक करने के लिए इसलिए इच्छुक हैं ताकि वे विदेशों में जमा अपने काले धन को सफेद कर सकें। क्या यह सत्य है?
यह भी प्रश्न उठाया जा रहा है कि टेलीकाम क्षेत्र को पूंजी निवेश की आवश्यकता है। लेकिन यह पूंजी निवेश विदेशी ही क्यों होना चाहिए, इसका कोई उत्तर नहीं दे रहा है। आज देश की वित्तीय स्थिति इस प्रकार की है कि वित्त के स्वदेशी स्रोत, जैसे- पूंजी बाजार, बैंक और वित्तीय संस्थान धन से लबालब भरे हैं। इन स्रोतों को टेलीकाम क्षेत्र में इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा है? दूसरी बड़ी बात है कि टेलीकाम क्षेत्र को ग्रामीण क्षेत्रों तक बढ़ाने की सबसे बड़ी आवश्यकता है। स्वयं सरकारी आंकड़े बताते हैं कि इस समय ग्रामीण क्षेत्र में टेलीकाम सुविधाओं को सुधारने के लिए पूंजी की आवश्यकता है, शहरी क्षेत्र में टेलीकाम सेवाओं के विस्तार का काम पहले से ही तीव्र गति से चल रहा है। वह कौन व्यक्ति होगा जो सोचेगा कि ग्रामीण क्षेत्र में टेलीकाम सेवाओं और उनके विकास के लिए विदेशी पूंजी निवेश भेजा जाएगा? भगवान के लिए, विदेशी पूंजी निवेश के बारे में दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखते हुए ही फैसला करें।
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