धर्मश्रद्धा जागरण से बदला समाज
द मा.गो.वैद्य
ऐसे कई प्रकार के मंगलकारक परिवर्तन आए हैं, ये परिवर्तन और भी व्यापक बनते जा रहे हैं, इसके पीछे क्या कारण हैं? मूल प्रेरणा क्या है? यह प्रश्न पाठकों के मन में उठना स्वाभाविक है। इसका एक ही सरल उत्तर है-अपने धर्म यानी हिन्दू धर्म के प्रति मन में श्रद्धा जागरण। इस हेतु सेवा भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-इन सभी संगठनों के कार्यकर्ता मिलकर अनेक अभियान चला रहे हैं। 17 जनवरी, 2002 को झाबुआ में लगभग 2 लाख वनवासी बंधु-भगिनियों का एक अभूतपूर्व सम्मेलन हुआ, जिसका नाम रखा गया था "हिन्दू संगम'। उस ऐतिहासिक संगम के लिए वनवासी बंधुओं को गांव-गांव में जाकर निमंत्रण देने के लिए नगरीय क्षेत्रों के 2,500 के अलावा स्वयं 1,500 वनवासी "धर्मवीर' भी अपने घर से निकल पड़े थे। उन सबको 2-3 दिन का प्रशिक्षण दिया गया। वे कार्यकर्ता रात को जिस गांव में पहुंच जाते थे, वहीं पर किसी वनवासी बंधु के घर में रुकते थे और "हम सभी लोग-नगरवासी हों या वनवासी हों- हिन्दू हैं', यह समझाते थे। उनके साथ खाना-पीना, धार्मिक प्रवचन भी होता था।
इससे उस संगम में भाग लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति की यह स्पष्ट धारणा बनी हुई थी कि हम हिन्दू हैं-इस नाते एकत्र होने के लिए वहां जा रहे हैं। हिन्दू संगम के पश्चात् एक पत्रकार ने अपने कार्यकर्ताओं को बताया, "मैं सोचता रहा कि सम्मेलन में आने वाले वनवासियों में कम से कम कुछ लोगों के मन में इस संगम से उनको कुछ न कुछ व्यक्तिगत दृष्टि से लाभ मिलेगा, ऐसी अपेक्षा होगी। इस दृष्टि से मैं सम्मेलन में आए अनेक वनवासियों से पूछता रहा-परन्तु उनमें से एक ने भी ऐसा उत्तर नहीं दिया। "हिन्दू' होने के नाते एकत्र होने के लिए वे सब लोग आए हैं, ऐसा ही उनके हाव-भाव से प्रकट हो रहा था। ऐसा देखकर और सुनकर मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा।'
दूसरा अत्यन्त प्रभावी अभियान है यानी "गणपति उत्सव'। कार्यकर्तागण गांव-गांव में जाते हैं और घरों में गणपति जी की स्थापना करते हैं। गणपति का आकार कैसा रहता है, उसकी पूजा-अर्चना कैसे की जाती है, आदि वनवासियों को कुछ भी मालूम नहीं था। केवल बाबा गणे (गणेश जी) नामक कोई अपना देव है, इतना ही वे जानते थे। परन्तु उनको जब प्रत्यक्ष मूर्ति दिखाई गई तो वे लोग भाव-विभोर हो गए और अपने घर में गणपति जी की स्थापना होने पर अपने घर को उसका (गणपति) मन्दिर मानने लगे।
गणपति विसर्जन का कार्यक्रम इस पूरे धर्मजागरण अभियान का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण अंग रहा। इसके माध्यम से नगरवासी और वनवासियों के बीच सदियों से चलते आ रहे भेदों का निर्मूलन करते हुए "हम सभी हिन्दू हैं' ऐसा भाव जगाया गया है। गणपति विसर्जन का आयोजन तहसील स्तर पर भी किया जाता है। आसपास के वनवासी लोग अपने-अपने गांव में स्थापित की गई गणपति की प्रतिमाओं को ट्रैक्टरों में मन्दिर जैसी झांकी में सजाकर एक संयुक्त शोभायात्रा में शहर के विभिन्न मार्गों से जाते हैं और अंत में वहां के किसी सरोवर में गणपति प्रतिमा को विसर्जित करते हैं।
पहले उस यात्रा के साथ किसी भी प्रकार की सहानुभूति-सहयोग तो दूर की बात थी, शहरों के तथाकथित बाबू लोग वनवासियों की इस प्रकार की शोभायात्रा की तरफ आंखें उठाकर देखते भी नहीं थे।
परन्तु ऐसे केन्द्रों में रह रहे कार्यकर्ताओं ने लोगों को समझाते हुए कहा, "आप भी हिन्दू हैं, वनवासी बंधु भी हिन्दू हैं। वे लोग यदि हम सभी के लिए पूज्य गणपति के विसर्जन हेतु हमारे शहर में आते हैं तो क्या आपका यह धार्मिक कर्तव्य नहीं है कि अपने यहां आए उन बंधु-भगिनियों का हर प्रकार से स्वागत करें, उस यात्रा में भाग लें?' इस प्रकार के प्रयत्नों से नगरवासियों के ह्मदय में सुप्तरूप हिन्दू भावना जाग्रत हो गई और गत वर्ष नगरवासियों ने ही सभी यात्रियों के लिए अच्छा प्रसाद बनाया और शोभायात्रा में गुलाल, पुष्पवृष्टि की।
धार जिले में कांवड़ यात्रा ने समाज संगठन का रूप धारण कर लिया है। गत वर्ष वहां 7 कांवड़ यात्राओं में 4,200 कांवड़िए सम्मिलित हुए। यह संख्या एकाएक नहीं बढ़ी है। धार के कार्यकर्ताओं ने बताया कि आज से चार साल पहले एक यात्रा निकली थी, जिसमें 97 यात्री थे, लेकिन बाद में बीस-बीस गांव के समूह के खण्ड में 50-50 कांवड़ यात्री आने लगे। इस प्रकार बाग, धामनोद, कुक्षी, ताण्डा आदि सभी सघन वनवासी क्षेत्रों में कांवड़ यात्राएं प्रभावी ढंग से निकलने लगीं। इन यात्राओं से वनवासी और नगरवासियों के बीच की खाई समाप्त हो गई।
धामनोद के धानी गांव में 80 से 85 वर्ष पुराना चर्च है। 6 गांव उनके प्रभाव में हैं। 2 गांव ईसाईबहुल हो गए हैं। 53 गांवों में उनका प्रभावी सम्पर्क था। कांवड़ यात्राओं से प्रभावित होकर 73 मतान्तरित ईसाई पुरुष-महिलाएं-बच्चे पुन: अपने धर्म में वापस आ गए।
धार जिले में ही एक गंधवानी तहसील है, उसमें शेरू खां नाम का एक वृहत् मुस्लिम परिवार है। 43 हिन्दू लड़कियों को उसने अपने परिवार के किसी न किसी पुरुष के साथ दैहिक शोषण के लिए रखा था। इस प्रकार पूरे गंधवानी क्षेत्र में प्रतिवर्ष 15-20 हिन्दू लड़कियों को मुसलमान कहीं न कहीं भगा ले जाते थे। मुसलमानों को शासन का भी प्रत्यक्ष व परोक्ष सहयोग मिलता था। अपमान से भरी वनवासियों की यह अवस्था कांवड़ यात्राओं के कारण अब पूर्णत: बदल गई है। अब वहां हिन्दू लड़कियों को यूं अपमानित करना असंभव हो गया है। वनवासी समाज में कांवड़ यात्राओं के कारण प्रबल आत्मविश्वास भर रहा है।
कुक्षी तहसील के पलासी गांव में एक फकीर ने झाड़-फूंक के प्रयोग से वहां के भोले-भाले वनवासियों को बहकाकर उनसे एक झोपड़ी बनवाई, बाद में एक मजार बनवाई। उर्स आयोजन भी शुरू किया, नगरवासी भी आने लगे, और इस प्रकार सात वर्षों तक प्रतिवर्ष 10,000 लोगों का उसमें भाग लेना चलता रहा। उस फकीर का हिन्दू बहन-बेटियों के साथ अभद्र व्यवहार, पटेल की लड़की को भगाना, आदि घटनाएं भी हुईं। मुसलमानों का दबदबा बढ़ता ही रहा। परन्तु जब वहां पर सेवा भारती के कार्यकर्ताओं का जाना शुरू हुआ तो वनवासी बधुओं में संगठन का भाव बढ़ने लगा और उस फकीर का आतंक समाप्त हुआ।
अलिराजपुर में 7 कांवड़ यात्राएं निकलीं, जिनमें तीन हजार श्रद्धालु सम्मिलित हुए। जब वे सारी कांवड़ यात्राएं नगर में पहुंचीं तो स्वयं नगरवासियों ने उन कांवड़ियों के पैर धोये, उन्हें भोजन कराया। याद रहे कि 2-3 वर्ष पहले तक नगरवासी उनको छूते भी नहीं थे। इसके विपरीत कुछ अलगाववादी कम्युनिस्ट नक्सलवादी प्रचार करते थे कि वनवासी लोग हिन्दू नहीं हैं।
इन सब यात्राओं से सब पंचायतों ने अपने क्षेत्र में गाय नहीं बेचने का संकल्प लिया है। एक पंचायत ने सभी प्रकार के नशों से मुक्ति का संकल्प लिया है।
शस्त्रपूजन का आयोजन, एक और प्रभावी उपक्रम रहा। वनवासियों के अन्दर दबी हुई पराक्रम की भावना को जगाने के लिए यह आयोजन बहुत उपयुक्त रहा। उन्होंने इधर-उधर पड़े अपने विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र बाहर निकाले, उनको भलीभांति चमकाया और शस्त्र लेकर मंडल केन्द्रों में शोभायात्रा निकाली। गत वर्ष 70 गांवों में ऐसे कार्यक्रम हुए।
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