अच्छे के लिए सौम्य और
हमलावर के लिए उग्र है हिन्दुत्व

"हिन्दुत्व न सौम्य है और न ही उग्र। जो हमारे साथ अच्छा व्यवहार करता है उसके लिए हिन्दुत्व सौम्य है और जो आक्रमण करता है, उसके लिए उग्र है। हम किसी को मारने नहीं जाएंगे लेकिन कोई हम पर आक्रमण करेगा तो हम उसका डटकर प्रतिकार करेंगे।' उक्त विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री कुप्. सी. सुदर्शन ने व्यक्त किए। वे गत 17
फरवरी को मुजफ्फरपुर (बिहार) में आयोजित "हिन्दू नवजागरण सम्मेलन' में बोल रहे थे। उन्होंने देश में व्याप्त सभी
समस्याओं का एकमात्र समाधान हिन्दू शक्ति का जागरण तथा स्वदेशी विकास पथ का अवलंबन बताया। उन्होंने कहा कि दुनिया के सभी देशों ने स्वदेशी के दम पर अपना विकास किया है। जब तक गांवों को विकास का केन्द्र मानकर विचार नहीं किया जाएगा तब तक देश का विकास संभव नहीं है।
हिन्दू नवजागरण सम्मेलन की अध्यक्षता स्थानीय तकनीकी संस्थान के पूर्व प्राचार्य डा. कृष्ण कुमार सिन्हा ने की। मंच पर क्षेत्र संघचालक श्री कृष्ण वल्लभ प्रसाद, नारायण सिंह उपाख्य बबुआजी तथा उत्तर बिहार के प्रांत संघचालक श्री केशव झा भी उपस्थित थे। इस अवसर पर स्वयंसेवकों ने शारीरिक प्रदर्शन भी किया। इस अवसर पर 17 फरवरी को उत्तर बिहार

पथ संचलन से पूर्व तिलक लगाकर स्वयंसेवकों का अभिनंदन करतीं राष्ट्र सेविका समिति की बहनें (प्रकोष्ठ में) स्वयंसेवकों को सम्बोधित करते हुए श्री सुदर्शन
के चम्पारण विभाग, सिवान विभाग व मुजफ्फरपुर विभाग के स्वयंसेवकों का पथ संचलन भी हुआ, जो मुजफ्फरपुर के चार स्थानों से प्रारम्भ होकर सिकन्दरपुर स्टेडियम गया, जहां हिन्दू नवजागरण सम्मेलन आयोजित था।
द संजीव कुमार, वि.सं.के.,पटना
राष्ट्रीयता के प्रखर प्रवक्ता थे
प्रकाशवीर शास्त्री --लालकृष्ण आडवाणी, उपप्रधानमंत्री
पं.प्रकाशवीर शास्त्री न केवल सामाजिक जीवन में बल्कि संसद में भी राष्ट्रीय विचारों के एक प्रखर प्रवक्ता थे। मात्र 35 वर्ष की आयु में पहली बार गुड़गांव से निर्दलीय सांसद के रूप में संसद में प्रवेश करने वाले स्व. प्रकाशवीर शास्त्री द्वारा संसद में दिए गए भाषणों का पुस्तक रूप में संकलन "राष्ट्रीयता के मुखर स्वर' का लोकार्पण गत 21 फरवरी को नई दिल्ली में उपप्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी ने

"राष्ट्रीयता के मुखर स्वर' पुस्तक का लोकार्पण करते हुए (बाएं से)
श्री लालकृष्ण आडवाणी, डा. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी तथा श्री रविशंकर प्रसाद
वेद प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित इस समारोह में ग्रंथ समिति के अध्यक्ष एवं सांसद डा. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी ने ग्रंथ का परिचय देते हुए कहा, "स्व. शास्त्री प्रखर राष्ट्रभक्त थे। संसद में और अन्यत्र भी वे भारतीय संस्कृति के उत्थान, राष्ट्रीय विचारों के प्रबल आग्रही रहे। इसी कारण उनके भाषणों के इस संकलन का शीर्षक "राष्ट्रीयता के मुखर स्वर' रखा गया है।'
ग्रंथ का लोकार्पण करते हुए उपप्रधानमंत्री श्री आडवाणी ने कहा, "1952 की पहली लोकसभा में दो सदस्य ऐसे थे, जिनके भाषणों को सुनने के लिए पूरी सभा खचाखच भरी रहती थी। ये दोनों वक्ता अंग्रेजी में बोलते थे और विपक्ष के थे। एक श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दूसरे श्री हीरेन मुखर्जी। इसी प्रकार दूसरी लोकसभा में दो सदस्य थे। किंतु ये दोनों हिन्दी में बोलते थे। एक थे श्री अटल बिहारी वाजपेयी और दूसरे पं. प्रकाशवीर शास्त्री। श्री शास्त्री पहले जनसंघ के साथ नहीं थे, परंतु विचार मिलते थे। एक समय था जब देश में ऐसे विद्वानों की कमी नहीं थी, जो भारत को अनेक राष्ट्रों का बना देश मानते थे। पं. प्रकाशवीर शास्त्री ही ऐसे नेता थे जो इन बातों का डटकर मुकाबला करते थे और भारत को एक राष्ट्र, एक जन और एक संस्कृति के रूप में प्रस्तुत करते थे। उनकी ऐसी ही बातें उन्हें भारतीय जनसंघ के निकट ले आईं।'
पं. प्रकाशवीर शास्त्री के अथक प्रयत्नों के कारण चारों वेदों का अंग्रेजी में अनुवाद किया गया था जिनका प्रकाशन वेद प्रतिष्ठान ने किया है। कार्यक्रम में श्री आडवाणी और केंद्रीय सूचना प्रसारण राज्य मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद को अंग्रेजी वेद भाष्य की प्रतियां भेंट की गईं। इस अवसर पर वेद प्रतिष्ठान के अध्यक्ष श्री शान्ति सूरी व अन्य गण्यमान्यजन उपस्थित थे।
दप्रतिनिधि
कोलकाता के श्री बड़ाबाजार कुमारसभा पुस्तकालय की अनूठी स्मरणाञ्जलि
लोकनायक की याद में...

स्मारिका का आकर्षक मुख पृष्ठ
श्री बड़ाबाजार कुमारसभा पुस्तकालय ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण जन्मशताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में एक वृहत् स्मारिका का प्रकाशन किया है जिसका लोकार्पण गत 18 जनवरी को उत्तर प्रदेश के राज्यपाल आचार्य विष्णुकांत शास्त्री ने किया था। इस स्मारिका का यदि स्व. जयप्रकाश नारायण के बारे में एक लघु सन्दर्भ कोष कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
आमतौर पर स्मारिकाएं विज्ञापनों के लिए छापीं जाती हैं और उसमें कुछ लेख इधर-उधर से ठूंस-ठांस दिए जाते हैं। लेकिन इस स्मारिका में कुमारसभा की अन्य स्मारिकाओं की ही भांति विषय के साथ न्याय किया गया है। इसमें स्व. जयप्रकाश नारायण की जीवन यात्रा के सभी महत्वपूर्ण मोड़ ही नहीं, बल्कि उनकी हस्तलिपि में कुछ महत्वपूर्ण पत्र, नके परिवार तथा देश में उनकी विभिन्न गतिविधियों के महत्वपूर्ण चित्र, उन पर विभिन्न कवियों द्वारा लिखी गईं कविताएं (जिनमें धर्मवीर भारती, भवानी प्रसाद मिश्र, द्वारिका प्रसाद मिश्र, शांता कुमार, डा. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी, डा. दयाकृष्ण "विजय', सूर्यभानु गुप्त, चन्द्रदेव सिंह के नाम प्रमुख हैं) तथा जयप्रकाश नारायण के सभी साथियों तथा उनके काम को परखने वाले मनीषियों के महत्वपूर्ण आलेख हैं। यह स्मारिका जयप्रकाश नारायण को समझने के इच्छुक हर व्यक्ति के लिए संजोकर रखने योग्य और पठनीय ग्रंथ है। इसमें सभी आलेख जयप्रकाश नारायण की प्रशंसा में ही हैं। यदि जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रांति के सम्बंध में समीक्षात्मक मूल्यांकन करने वाले आलेख भी होते तो इस समग्र स्मारिका की समग्रता कुछ और गहरी हो सकती थी। स्मारिका बहुत सीमित संख्या में प्रकाशित की गई है। इसे मंगवाने के लिए श्री बड़ाबाजार कुमारसभा पुस्तकालय, 1सी- मदन मोहन बर्मन स्ट्रीट, कोलकाता-700007 से सम्पर्क किया जा सकता है। दप्रतिनिधि
हैलाकाण्डी में कल्याण आश्रम का वार्षिकोत्सव

वार्षिकोत्सव में उपस्थित वनवासी बालाएं
गत 16 फरवरी को असम के हैलाकांडी क्षेत्र में वनवासी कल्याण आश्रम का वार्षिकोत्सव मनाया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे रा.स्व.संघ, दक्षिण असम प्रांत प्रचारक श्री शशिकान्त चौथाईवाले। इस अवसर पर कल्याण आश्रम, असम प्रांत के संगठन मंत्री डा. उपेन्द्र महालिया, सह संगठन मंत्री श्री धरणीधर बरदलै, श्री रमेश बाबू सहित बड़ी संख्या में वनवासी छात्र-छात्राएं और वनवासी बंधु उपस्थित थे। समारोह के बाद एक शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें स्थानीय वनवासी पारम्परिक वेशभूषा में सम्मिलित हुए।
द वासुदेव पाल
पाञ्चजन्य स्वर्ण-जयन्ती चित्रमाला-277

लाला हरदेव सहाय
जन्म- 26 नवम्बर, 1892 निधन-30 सितम्बर, 1962 लाला हरदेव सहाय
एक गोभक्त
राष्ट्रभाषा हिन्दी, स्वदेशी तथा गोरक्षा के लिए समर्पित महान स्वाधीनता सेनानी लाला हरदेव सहाय का जन्म 26 नवम्बर, 1892 को हिसार (हरियाणा) जिले के सातरोड़ गांव में लाला मुसद्दी लाल अग्रवाल के पुत्र के रूप मंे हुआ था। लाला मुसद्दीलाल हिन्दी तथा स्वदेशी के अनन्य भक्त थे। उनकी प्रेरणा से सातरोड़ में 1912 में हिन्दी पाठशाला की स्थापना हुई।
लाला हरदेव सहाय पंजाब केसरी लाला लाजपत राय की प्रेरणा से स्वाधीनता आन्दोलन में सक्रिय हुए। सन् 1921 में उन्होंने जेल में स्वामी श्रद्धानंद जी के साथ यातनाएं सहीं। जेल में स्वामी जी ने उन्हें हिन्दू संगठन, संस्कृत और हिन्दी के प्रचार की प्रेरणा दी। लाला जी ने सातरोड़ गांव के विद्यालय में शुद्ध खादी की बुनाई तथा चरखा चलाने का प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित किया। उन्होंने विद्यालय के शिक्षकों तथा छात्रों के लिए विदेशी वस्त्रों की जगह शुद्ध खादी के वस्त्र पहनना अनिवार्य कर दिया।
सन् 1936 में राजस्थान तथा हरियाणा में अकाल पड़ा तो लाला जी तमाम कार्यक्रम स्थगित कर अकालग्रस्त क्षेत्रों में गोवंश की रक्षा में जुट गए।
लाला लाजपतराय का लाहौर में बलिदान हुआ तो लालाजी को इसका बहुत आघात लगा। उन्होंने उनके नाम पर "लाला लाजपतराय शिल्पशाला' की स्थापना की। लालाजी का राजेन्द्र बाबू, गांधीजी तथा मालवीय जी आदि नेताओं से निकट का सम्पर्क था। देश स्वाधीन हुआ तो लाला जी ने पं. मदन मोहन मालवीय के साथ गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाए जाने की मांग को लेकर केन्द्र सरकार को पत्र लिखा।
उन्होंने "गाय ही क्यों', "गो संकट निवारण' तथा "कलकत्ता का कलंक' पुस्तकें लिखीं। स्वाधीनता मिलने के बाद भी गोहत्या पर प्रतिबंध न लगाए जाने से असन्तुष्ट होकर लाला जी ने गोरक्षा आंदोलन का सूत्रपात किया। सन् 1953 में उन्होंने प्रयाग के कुंभ में भारत गो सेवक समाज की स्थापना की। पटना तथा मथुरा में गोहत्या बन्दी अभियान चलाकर गोहत्या पर प्रतिबंध लगवाने में सफलता पाई। 30 सितम्बर, 1962 को यह महान विभूति गोलोक प्रयाण कर गई।
द शिवकुमार गोयल