माटी का मन अंगूठों के निशान से सच उजागर


दडा. रवीन्द्र अग्रवाल

साक्षरता सम्बंधी अभियान की सफलता को लेकर कोई कितने भी दावे क्यों न करे परन्तु अगूंठों के निशानों ने अभियान का सच उजागर कर ही दिया। घटना है-राजस्थान के देवीकोट गांव की। राष्ट्रपति अब्दुल कलाम सूखा राहत कार्यक्रमों को देखने देवीकोट गांव पहुंचे। सूखा राहत सम्बन्धी सभी कागज चाक-चौबन्द किए गए थे। इन्हीं कागजों में एक रजिस्टर पर पशुचारा के वितरण का लेखा-जोखा था और इस पर प्राप्तकर्ताओं के अंगूठों के निशान लगे थे। रजिस्टर पर लगे अंगूठों के निशानों पर राष्ट्रपति चौंके। उनका चौंकना स्वाभाविक था। राष्ट्रपति ने मुख्यमंत्री से पूछा, "राज्य का मुख्य अभियान है, साक्षरता और रजिस्टर में अगूंठों के इतने निशान?' अंगूठों के निशानों से रंगे रजिस्टर के ऐसे पकड़े जाने पर मुख्यमंत्री निरुत्तर। न तो वे इस मामले में अपनी आदत के अनुसार केन्द्र सरकार को आरोपित करने की स्थिति में थे और न ही अपने अधिकारियों की करतूतों पर पर्दा डालने की स्थिति में। तभी उन्हें राष्ट्रपति से यह सीख सुननी पड़ी कि वे राज्य में साक्षरता के प्रचार-प्रसार पर ध्यान दें। गांवों से जुड़े विकास कार्यों की असलियत अगूंठों के इन निशानों से ज्यादा कुछ नहीं है। अंगूठों के निशान इसलिए भी ज्यादा हैं कि यहां विकास-दर शून्य है। लोगों के पास दो समय पेट भरने के लिए रोटी नहीं हैं। ऐसे में पढ़ने की बात कौन सोच सकता है? प्रतिवर्ष विकास कार्यों के नाम पर अरबों रुपया खर्च होता है। परन्तु रजिस्टरों में अगूंठों की छाप लगा-लगाकर वह जमा शहर के बैंकों में होता है। अगर गांव का आदमी पढ़-लिख गया तो वह विकास कार्यों का हिसाब-किताब पूछने लगेगा। विकास कार्यों के नाम पर राजनीति और धंधा करने वालों के लिए यह स्थिति चिंता की बात होगी। इस चिंता से बचने का एकमात्र तरीका यही है कि आदमी को अंगूठाछाप ही रहने दो। अगूंठाछाप रहेगा तो साक्षरता अभियान के नाम पर पैसा भी आता रहेगा। अगूंठाछाप नहीं रहे तो पैसा आना भी बंद। अब भला ऐसा मूर्ख कौन होगा कि जो सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को अपने ही हाथों यूं हलाल कर दे। परन्तु सच, सच ही होता है। कहीं न कही चुगली कर ही बैठता है। अब भला यह भी क्या बात हुई? मामला था पशुओं के लिए चारा वितरण का और सच उजागर हो गया साक्षरता अभियान का जिसका सूखा राहत से कोई लेना-देना नहीं।

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