जो कहा, यूं ही कहा?
महाराष्ट्र में कोंकण प्रदेश के सावंतवाडी शहर में कुछ दिन पूर्व एक अजीबोगरीब "साहित्य संस्कृति सम्मेलन' का आयोजन किया गया। अजीबोगरीब इसलिए, क्योंकि वहां कुछ प्रगतिवादियों ने मिलकर भारतीय संस्कृति और आस्था का भद्दा मजाक उड़ाया। मुट्ठीभर लोगों के इस जमावड़े में लोग तो गिने-चुने ही आते हैं, पर सेकुलर मीडिया का हाथ सदा इनके सर पर रहता है। सावंतवाडी में आयोजित अपनी तरह का यह पांचवां सम्मेलन था। इसकी अध्यक्षता की थी मराठी के "साहित्यकार' राजन खान ने। सम्मेलन में जो "विद्वान' पधारे थे, उनमें एक थे हैदराबाद के प्रो. कांचा इलय्या। अपने भाषण में प्रो. इलय्या ने कहा, "जिस महाराष्ट्र में ज्योतिबा फुले और डा. बाबासाहब अम्बेडकर जैसी विभूतियों ने जन्म लिया, उसी महाराष्ट्र में सावरकर और डा. हेडगेवार जैसे लोगों का भी जन्म हुआ। इसे महाराष्ट्र का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहेंगे।' इतना ही नहीं, उन्होंने डा. हेडगेवार, श्री गुरुजी और संघ के स्वयंसेवकों के बारे में खूब अनाप-शनाप बकते हुए बड़े गर्व से अपने को हिन्दू न मानने की घोषणा की। और तो और उन महाशय ने भगवान राम और कृष्ण को भी नहीं बख्शा। उन्होंने कहा कि "कृष्ण की सोलह हजार पटरानियां थीं, अत: उनका आचरण सही नहीं था।' उनके इस भाषण के बाद पूरी सभा स्तब्ध थी। सम्मेलन में सावंतवाडी के नगराध्यक्ष श्री केसरकर मंच पर संयोजक के नाते मौजूद थे। इस भाषण से बदनामी हो सकती है, इसका खतरा भांप कर उन्होंने माइक थामा और घोषणा की कि प्रो. इलय्या का भाषण कोई गंभीरता से न ले। उन्होंने जो कहा, यूं ही कहा।
महंगी हुई बातें
अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत दूरभाष के मासिक किराये में की गई वृद्धि पर चुप नहीं बैठेगी। उसने हर स्तर पर इस मनमानी का विरोध करने का फैसला किया है। यह जानकारी पंचायत के राष्ट्रीय महामंत्री श्री बिंदुमाधव जोशी ने पिछले दिनों भुवने·श्वर में दी। उल्लेखनीय है कि दूरसंचार नियामक मण्डल ने दूरभाष के किराये में वृद्धि और आवृत्ति दर में कटौती की घोषणा की है। नई दरें 1 अप्रैल, 2003 से लागू होनी हैं। पंचायत का कहना है, एक ओर तो सचल दूरभाष सस्ता हो रहा है, दूसरी ओर आम लोगों की जरूरत दूरभाष महंगा हो रहा है। इस घोषणा के पीछे किसी षड्यंत्र की आशंका व्यक्त करते हुए इसकी जांच की मांग की गई है। इसके विरोध में पूरे देश से ग्राहक पंचायत के कार्यकर्ता प्रधानमंत्री को पत्र लिखेंगे।
मीडिया के "महात्मा'
दिल्ली में वि·श्व हिन्दू परिषद् की धर्मसंसद हो और मीडिया उसकी अनदेखी करे, संभव ही नहीं था। इसलिए 22, 23 व 24 फरवरी को पूरा समाचार जगत धर्मसंसद के समाचार जुटाने में लगा था, शेषकर इलेक्ट्रानिक मीडिया। कई प्रमुख समाचार वाहिनियों (चैनलों) ने सीधे प्रसारण के शेष इंतजाम किए थे। अपने-अपने दृष्टिकोण थे और अपने-अपने लक्ष्य। किसी ने संख्या के अतिरिक्त लगायी गयी कुर्सियों की चर्चा की तो कोई मोबाइल फोन पर बात करते किसी संत को देखकर अचरज में था। अखबारों में ऐसे कोणों से खिंचे चित्र छापे गए जिसमें संत एक पुण्यात्मा न दिखकर हंसी का पात्र दिखता हो। इतना ही नहीं, रामलीला मैदान में भोजन कर रहे साधुओं के चुपके से खींचे गए चित्र छपे। केवल चित्र ही नहीं, कई अंग्रेजी अखबारों ने धर्म संसद की रपटों में न केवल उन्माद का भाव दर्शाने वाले शीर्षक दिए बल्कि आलेखों में भी भाषा की शालीनता का ख्याल नहीं रखा गया। यहां तक कि सम्मेलन स्थल पर कुछ वामपंथी-दामपंथी कम्युनिस्ट पत्रकारों ने विश्व हिन्दू परिषद् को "तालिबानों की जमात' तक कहा। ऐसे लोगों पर आचार्य धर्मेन्द्र के व्यंग्य-बाण जमकर बरसे। अपनी खास भाषाशैली के लिए प्रसिद्ध आचार्य धर्मेन्द्र जब भी पत्रकारों की ओर इशारा कर कहते थे "मीडिया के महात्माओ' तो सबके चेहरे पर एक मुस्कुराहट होती थी। आचार्य धर्मेन्द्र के निशाने पर अधिकांशत: मीडिया ही रहा और जब उन्होंने ऊंचे स्वर में पूछा कि, वि·श्व हिन्दू परिषद् की तुलना तालिबान से करने वाले मीडिया के महात्माओं, बताओ, अगर हम तालिबान होते तो क्या तुम उल्टा-सीधा लिखकर, झूठा-सच्चा दिखाकर भी यहां बैठे रह सकते थे? तब "मीडिया के महात्मा' एक-दूसरे का मुंह ताकते रह गए!
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