पाञ्चजन्य, फाल्गुन शुक्ल 7, 2059 वि. (9 मार्च, 2003)


सत्ता लोभियों ने भोजशाला को बनाया

राजनीति की बिसात

द विजय मनोहर तिवारी

मध्य प्रदेश में राजा चर्चा में हैं। राजा भोज और दिग्गी राजा। चर्चा का निमित्त बनी है- भोजशाला। राजा भोज अब नहीं हैं। उन्हें गए नौ सौ से अधिक साल बीत गए। इस बीच इतिहास की न जाने कितनी करवटों का कोप यह देश झेल गया। बेशक, राजा भोज की राजधानी धार भी इसमें शामिल है और उनकी भोजशाला भी। जहां कभी राजा भोज की सत्ता थी, वहां अब दिग्गी राजा का शासन है। हजार साल पहले राजा भोज भोपाल में समंदर का नजारा भूमि पर रच गए। भोपाल का बड़ा तालाब। इसके अलावा, भोपाल के पड़ोस में भोजपुर भी है, जहां वह शिवालय मौजूद है, जो राजा भोज के महान व्यक्तित्व के प्रमाण पाषाणों पर पेश करता है। लेकिन हमारे वर्तमान दिग्गी राजा, भोज की महानता से कुछ भी सीखने को तैयार नहीं हैं।

क्या कोई राजा भोज जितना एक साथ इतने आयामों में सर्वश्रेष्ठ हो सकता है? वीरता में भी सर्वश्रेष्ठ और ज्ञान में भी सर्वप्रथम। कला का अद्वितीय पारखी। भोज जैसे व्यक्तित्व हमेशा नहीं होते, वर्ना उन्हें पूछता कौन?

भोज के समय बिजली नहीं थी। पानी के लिए उस समय बने बावड़ी और तालाब आज भी हमारे जल संकट को दूर करने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं। आवागमन के उपलब्ध साधनों के लिए वृक्षदार मार्ग और सराय बनवाना पुण्य का काम माना जाता था। ये चीजें जन-जरूरतों की थीं, आ·श्वासनों, वायदों और एजेंडों की नहीं। सड़क, पानी और बिजली बहस या चुनाव के मुद्दे हो सकते हैं, यह राजा भोज और भोजशाला में विराजने वाले उनके पांच सौ विद्वानों ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। लेकिन अब ये विषय उत्तरदायित्वों के निर्वहन के नहीं, राजनीति के हैं। इन पर चुनाव लड़े जाते हैं। सत्ता में उलट-फेर होती है। कुर्सी आती-जाती है।

मध्य प्रदेश में वही हो रहा है। दिग्गी सरकार को भोजशाला के रूप में एक गरम तवा मिल गया है, जिस पर राजनीतिक रोटियां सेंकी जा रही हैं। जिस भोजशाला से राजा भोज ने संस्कार, संस्कृत और संस्कृति को पोषण दिया, वह अब सत्ता के लिए एक अलग तरह की खुराक का जरिया बन गई है।

राजा भोज केवल भोजशाला में ही जीवित नहीं हैं। भोजपुर में भी उनकी सांसें शिवालय में सुनाई देती हैं। भोपाल के बड़े तालाब में भी उनके स्पर्श की लहरें किनारों को छूती हैं। वे उन सभी तीर्थों में मौजूद हैं, जहां उन्होंने श्रेष्ठतम निर्माण कराए। भोज समरांगण सूत्रधार में जीवित हैं, पारिजात मंजरी, अवनिकूर्मशतम् और सरस्वती कंठाभरण, जैसी सुंदर कृतियों में जीवित हैं। अगर केवल राजपाट ही किया होता तो कौन राजा भोज को जानता? भोज एक कला पारखी, उच्चकोटि के विद्वान और सृजनशील व्यक्तित्व के धनी थे। इसी रास्ते वे आज भी हमारे बीच स्मरणीय हैं। आज के दिग्गी राजा को आज की चिन्ता है, चुनाव की, कुर्सी की और उनके वोटों की, जिन्हें अल्पसंख्यक कहकर हमारा लोकतंत्र शेष दुलार देता आया है।

... अब राजतंत्र नहीं है, लोकतंत्र है। इस लोकतंत्र को हमने पंथ से निरपेक्ष स्वीकार किया है। लेकिन हमारी पंथनिरपेक्षता अजब है। भोजशाला में प्रवेश के लिए एक पंथ से जुड़ा होना जरूरी माना गया। हिन्दू हैं तो केवल वसंत पंचमी को आइए, मुसलमान हैं तो हर शुक्रवार को तशरीफ लाइए। राजा भोज के बनाए तालाब का पानी यह देखकर कंठ की प्यास नहीं बुझाता कि कंठ हिन्दू का है या मुसलमान का। हिन्दुओं को गालियां देने वाले तथाकथित पंथनिरपेक्षतावादी भी नहीं कहते कि यह तालाब एक काफिर का बनवाया हुआ है, कोई ईमानवाला इसका पानी न पीए। लेकिन भोजशाला में दर्शन के नाम पर यह सीमा रेखा बना दी गई है।

...हमारे तंत्र ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी हुई है। इसके लिए कोई लक्ष्मण रेखा नहीं है। तभी तो इसका भरपूर लाभ लिया जाता है। राजा भोज भी इससे नहीं बचे। कुछ समय पहले कुछ "ज्ञानियों' ने उनके बारे में इतिहास में कुछ नए पृष्ठ रच दिए। बताया गया कि अरब से आए किन्हीं अबदुल्ला चंगाल से प्रभावित होकर राजा भोज ने इस्लाम कबूल कर लिया था! तब पंथनिरपेक्षता के स्वयंभू सरदारों की ओर से उतना हंगामा नहीं मचा कि इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है। जब इतिहासकारों ने खोजा तो समकालीन ऐतिहासिक संदर्भों में इसका कहीं कोई जिक्र सामने नहीं आया कि भोज इस्लाम पर ईमान ले आए थे। क्योंकि तब न तो इस्लाम का प्रचार इतना हुआ था, न ही राजा भोज जैसे विराट व्यक्तित्व को बलपूर्वक या लालच देकर मुसलमान बनाया जा सकता था, जो कि मुस्लिम काल में मतान्तरण के तरीके थे। और यह भी तय है कि अगर राजा भोज जैसे व्यक्ति अपना धर्म परिवर्तन करते तो शायद ही कोई भारत में हिन्दू शेष होता! फिर कौन ऐसा था जो अपनी रीढ़ सीधी रख पाता और किससे प्रेरणा लेता? लेकिन हम इस अभिव्यक्ति स्वतंत्रता का क्या करें?

भोजशाला परिसर के बाहर मौलाना कमालुद्दीन का मकबरा है। संभवत: भारत में इसकी दूसरी मिसाल नहीं मिलेगी। यह मौलाना कमाल अमदाबाद में अल्लाह को प्यारे हुए। वहीं इनका मकबरा है। लेकिन इनकी मृत्यु के बाद दूसरा मकबरा मुस्लिम शासनकाल में भोजशाला के बाहर बनवा दिया गया। एक ही आदमी की दो दरगाहें! लेकिन वर्तमान राजा को उचित नहीं लगता कि एक समुदाय की इन मूर्खताओं को भी प्रकाश में लाया जाए!

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