भूख के आंकड़े गिन सको,
बूंद हर प्यास की चुन सको;
तब कहो तुम प्रलय के लिए,
और जीवित समय के लिए।
शब्द बोलो वही आग हो,
आग में भी नया राग हो;
राग की गूंज हर ओर हो;
और स्वर भी न कमजोर हो।
तब कहो तुम प्रतीक्षानिरत
सांस के हर विलय के लिए।
खींच दो वह अमिट रेख हो,
रेख में रंग का लेख हो;
एक नक्शा उजलने लगे,
साथ हर व्यक्ति चलने लगे।
तब कहो तुम लड़े हो यहां,
आदमी की विजय के लिए।
लोक का तंत्र गलहार हो,
तंत्र का एक व्यवहार हो;
आंख की किरकिरी दूर हो,
एक कोई न मजबूर हो।
तब कहो तुम जले आग में,
सूर्य के हर उदय के लिए।
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