कविता आदमी के लिए द डा. तारादत्त "निर्विरोध'


भूख के आंकड़े गिन सको,

बूंद हर प्यास की चुन सको;

तब कहो तुम प्रलय के लिए,

और जीवित समय के लिए।

शब्द बोलो वही आग हो,

आग में भी नया राग हो;

राग की गूंज हर ओर हो;

और स्वर भी न कमजोर हो।

तब कहो तुम प्रतीक्षानिरत

सांस के हर विलय के लिए।

खींच दो वह अमिट रेख हो,

रेख में रंग का लेख हो;

एक नक्शा उजलने लगे,

साथ हर व्यक्ति चलने लगे।

तब कहो तुम लड़े हो यहां,

आदमी की विजय के लिए।

लोक का तंत्र गलहार हो,

तंत्र का एक व्यवहार हो;

आंख की किरकिरी दूर हो,

एक कोई न मजबूर हो।

तब कहो तुम जले आग में,

सूर्य के हर उदय के लिए।

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