बाल जगत जो छिपाये न छिपा


बगदाद का खलीफा अपने खजाने में धन एकत्र करने के लिए अपनी प्रजा पर बड़े जुल्म ढाता था। जनता बड़ी दु:खी थी। खलीफा शासक होने के साथ-साथ पंथ-गुरु भी माना जाता था, परन्तु उसके लोभ की कोई सीमा न थी। जनता भले भूखी-नंगी रहे, किन्तु खलीफा ने जनता को खूब लूटा और अपने खजाने में मनचाहा धन इकट्ठा कर लिया। उसे इसी में सुख मिलता था। इसी बीच एक दिन पंजाब से गुरु नानक देव बगदाद पधारे तो उन्हें खलीफा द्वारा जनता को सताकर धन-संग्रह करने की बात ज्ञात हुई। गुरु नानक ने बहुत-से कंकड़ इकट्ठे किये और जब एक दिन बगदाद में वही जालिम खलीफा गुरु नानक से मिलने आया तो उन्होंने उन्हीं कंकड़ों में से सौ कंकड़ गिने और एक तरफ रख दिये। यह देखकर खलीफा ने उनसे पूछा, "आप इन कंकड़ों का क्या करेंगे? इन्हें क्यों इकट्ठा किया है?' तब गुरु नानक ने उससे कहा- "ये कुछ कंकड़ जिनकी तादाद 100 है, तुम्हें देने के लिए मैंने संजो रखे हैं, ताकि तुम ये 100 कंकड़ मेरी अमानत के तौर पर अपने पास रखो।'

खलीफा ने पूछा- "जनाब! यह आप क्या कह रहे हैं, मैं कुछ समझा नहीं। मैं इन्हें रख तो लूंगा लेकिन फिर आप इन्हें वापस कब लेंगे?'

गुरु नानक बोले- "काफी दिनों बाद, जब कभी कयामत के रोज हम खुदा के दरबार में मिलेंगे, तभी तुम ये 100 कंकड़ मुझे लौटा देना।'

खलीफा परेशान होकर पूछने लगा, "अरे, यह आपने क्या कहा? कयामत के दिन भला इस बेकार-सी चीज को वहां ले जाने का क्या मतलब? उस रोज कहीं ये कंकड़ भी वहां ले जाये जाते हैं?' गुरु नानक की बात से वह बड़ा चकित था। तभी गुरु नानक ने कहा- "तुमने जोर-जुल्म के जरिये खजाने में इतनी दौलत जमा कर रखी है, जिसके कारण तमाम लोग भूख से तड़प रहे हैं, क्या यह दौलत तुम यहीं छोड़ जाओगे? मैंने सोचा कि उसी दौलत के साथ तुम मेरे ये सौ कंकड़ भी जरूर ले जा सकते हो! क्योंकि मुझे तो यहां से वहां खाली हाथ ही जाना होगा, हर कोई खाली हाथ ही जाता है। हां, तुम्हारी बात अलग है। और अगर तुम्हें यह दौलत-भरा खजाना यहीं छोड़ जाना है तो फिर अपनी प्रजा को सताने-तड़पाने और लूटने से क्या लाभ?' गुरु नानक की बात खलीफा के दिल में गहरे पैठ गई और उसे अपनी करनी पर न केवल बड़ा पछतावा हुआ, वरन् उसने उसी दिन से अपने खजाने का धन भूखी-गरीब जनता को बांटना शुरू कर दिया। साथ ही यह कसम खाई कि आगे वह कभी किसी को न ही सताएगा और न किसी का धन छीनेगा।

- मानस त्रिपाठी

बूझो तो जानें

प्यारे बच्चो! हमें पता है कि तुम होशियार हो, लेकिन कितने? तुम्हारे भरत भैया यह जानना चाहते हैं तो फिर देरी कैसी? झटपट इस पहेली का उत्तर तो दो। भरत भैया हर सप्ताह तुमसे ऐसी ही एक रोचक पहेली पूछेंगे। इस सप्ताह की पहेली है-

काशी में स्थापित किया हिन्दू वि·श्वविद्यालय, नाम बताओ उनका जो थे दया, धर्म के आलय।

भारत भर में घूम-घूम कर था सहयोग जुटाया, पैसा-पैसा जोड़ वि·श्वविद्यालय भव्य बनाया।।

उत्तर : (पं. मदन मोहन मालवीय)

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