प्राण जाए पर आन न जाए
द ओमप्रकाश त्रेहन
सन् 1923 की बात है। नवंबर का महीना था। इस पूरे महीने भर स्वामी श्रद्धानन्द काशी और उसके आस-पास के क्षेत्र में प्रवास करते रहे, तभी उन्हें सर्दी लग गई। रात भर के रखे ठंढे जल में सवेरे स्नान करने से उस सर्दी ने निमोनिया का रूप ले लिया। तब उन्हें कार से इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) लाया गया। दिल्ली में जांच करने पर पता चला कि उनके दोनों फेफड़े खराब हो चुके हैं। उनकी चिकित्सा के लिए प्रतिदिन दोपहर को डा. अंसारी आने लगे। 23 दिसंबर को स्वामीजी के सीने पर पलस्तर चढ़ाया गया। डाक्टर ने उन्हें गन्ने के रस के साथ डबलरोटी खाने को कहा। स्वामीजी का निजी सचिव धर्मपाल कई रातों जगता रहा था, इसलिए जब वह स्वामी जी के हाथ धुलाने लगा तो उसे सहसा झपकी आ गई। यह देखकर स्वामीजी ने धर्मपाल से कहा- "जाकर सो जाओ।' दिन के 2 बजे थे। पास खड़े एक सेवक धर्मसिंह से धर्मपाल ने कहा- "देखो, मैं जाता हूं, तुम द्वार पर रहना। किसी को अंदर आने की अनुमति मत देना।' कुछ ही मिनट गुजरे थे, एक मुस्लिम युवक सीढ़ियों से ऊपर आया, बोला- "मुझे स्वामीजी से मिलना है।' धर्मसिंह ने उससे कहा- "आज नहीं और किसी दिन आइये।' वह वापस गया, लेकिन थोड़ी ही देर बाद वह फिर आया और स्वामीजी ने उसे बुला लिया। उसने स्वामीजी से कहा- "मैं आपसे धर्म के बारे में बातें करना चाहता हूं।' स्वामीजी ने उससे कहा- "अभी तुम सत्यार्थ प्रकाश पढ़ो। बातें करने फिर कभी आना।' जब उसने पीने के लिए पानी मांगा तो धर्मसिंह उसे अपने साथ लेकर दूसरे कमरे में गया, जहां उसे पानी दिया गया। वास्तव में उसने पानी पीने का बहाना धर्मसिंह को वहां से हटाने के लिए किया था। अत: पानी पीकर तुरन्त वह फिर स्वामीजी के कमरे में गया। अभी धर्मसिंह पानी का लोटा पानी वाले स्थान पर रख रहा था। इसी बीच उस युवक ने 3 फुट की दूरी से स्वामीजी पर गोली चला दी। 2 गोलियां उनके शरीर में जा धंसीं, तीसरी गोली धर्मसिंह को लगी। गोलियों की आवाज सुनकर सचिव धर्मपाल अपने बिस्तर से कूदकर स्वामीजी के कमरे की तरफ भागा। धर्मसिंह ने हत्यारे को दबोचने की कोशिश की, पर पकड़ न पाया, किन्तु धर्मपाल ने उस मुस्लिम युवक को अपनी दोनों भुजाओं से दबोच लिया। उसके एक हाथ में पिस्तौल थी। धर्मपाल उसे घसीटते हुए कोने में ले गया और उसके सर को दीवार से दे मारा और उसे अपने कब्जे में ले लिया। धर्मसिंह की बाईं टांग से खून बह रहा था, वह जमीन पर पड़ा कराह रहा था। धर्मपाल ने धर्मसिंह को ढाढस बंधाते हुए कहा, "जल्दी से "शुद्धि सभा' के कार्यालय को जाकर बता दो।' वह गया तो वहां से कुछ लोग भागे आये, उनसे धर्मपाल ने डा. अंसारी को फोन करने के लिए कहा। थोड़ी ही देर में डा. अंसारी भी आ गये। उन्हें देखते ही हत्यारे ने उन्हें सलाम करते हुए कहा- "आदाब अर्ज है डाक्टर साहब!' बाद में पता चला कि इस हत्यारे अब्दुल रशीद ने कई मुल्लाओं से इस हत्या की बात पहले से ही कह रखी थी। इसी बीच एक उलेमा ने स्वामीजी की हत्या करने के लिए फतवा भी दे डाला था।
स्वामीजी की हत्या के आधे घंटे बाद कईं अफसरों सहित अंग्रेज पुलिस कप्तान मार्गन वहां आ गया। कप्तान मार्गन ने हत्यारे की गर्दन पकड़ी और उसे ऊपर उठाया, साथ ही उसके सर पर बेंत का प्रहार करते हुए पूछा- "तुमने ऐसा क्यों किया?' हत्यारे ने जवाब दिया- "क्योंकि स्वामी हमारे मजहब का दुश्मन था'। धर्मपाल का कहना था कि ऐसा कहते समय अब्दुल रशीद (हत्यारे) के चेहरे पर पछतावे या अपनी काली करतूत के लिए अफसोस का कोई भाव नहीं दिखा। उस जैसे मुस्लिम स्वामी जी को इस कारण अपना दुश्मन मानने लगे थे क्योंकि तमाम मलकाना राजपूत, जो मुस्लिम कहलाते थे, उन्हें "शुद्धि सभा' द्वारा पुन: हिन्दू धर्म में लौटाया गया। धर्मान्तरण रोकने के लिए ही दो दैनिक पत्र "अर्जुन' और "तेज' निकाले, अंग्रेजी में "लिबरेटर' जारी किया, हरिजनों के लिए दलित-उद्धार सभा कायम की। इसी कारण उनकी हत्या की गई। हिन्दू समाज के संगठन के कारण ही उनका बलिदान हुआ।
13