एक गांव के पुनर्निर्माण की कहानी


तय कर लिया और कर दिखाया

- डा. साहिब सिंह

महासचिव व सांसद, भाजपा

किसी समस्या के समाधान के दो तरीके हो सकते हैं-एक उसके बारे में छापा जाए, बयान दिए जाएं, कहा जाए कि सरकार को यह करना चाहिए, वह करना चाहिए और कुछ दिन बाद फिर बयान दें कि सरकार कुछ नहीं कर रही, जनता संत्रस्त है, सरकार निकम्मी है, आदि-आदि। बयान भी छपेंगे, अखबार में कुछ दिन सुर्खियां आएंगी और शायद बयान देने वालों को यह लगे कि उन्होंने अपना काम पूरा कर दिया। पर एक नया तरीका है कि बयान देने की बजाए स्वयं कुछ करना शुरू किया जाए। सरकार को दोष देने की बजाए सरकार की जहां कमियां हैं वहां समाज को खड़ा किया जाए। सरकार का मुखापेक्षी होने की अपेक्षा समाज स्वयं अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सिद्ध हो। गुजरात में आए भूकम्प ने पूरे देश को हिला दिया तो दो तरह की प्रतिक्रियाएं हुईं-कुछ व्यक्तियों ने राहत कार्यों में ढिलाई पर पत्रकार वार्ताएं कीं और कुछ नेताओं ने गुजरात जाकर समाज को साथ लेकर राहत कार्य शुरू किए। हम पिछले अंकों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, गायत्री परिवार, स्वामिनारायण सम्प्रदाय, वि·श्व हिन्दू परिषद् आदि स्वयंसेवी संगठनों के प्रेरक राहत कार्यों का विस्तृत विवरण छाप चुके हैं। इस बार हम भाजपा नेता डा. साहिब सिंह की सामाजिक कार्यकर्ता के नाते सक्रियता का विवरण प्रकाशित कर रहे हैं। उनका उदाहरण उन तमाम राजनेताओं के लिए प्रेरक होगा जो केवल राजनीतिक बयानबाजी, रैलियों व प्रदर्शनों को ही राजनीति का अथ से अंत मान बैठे हैं। यहां प्रस्तुत है डा. साहिब सिंह से बातचीत और "इन्द्रप्रस्थ' की नवल कथा।-सं.

-- आलोक गोस्वामी

थ् नवी दूधई गांव के पुनर्निर्माण का विचार कब और कैसे आया? समूचे गांव को फिर से बसाने और उजड़े परिवारों की सहायता की प्रेरणा कैसे मिली?

दृ आपको पता ही है कि नवम्बर,1999 में उड़ीसा में भीषण चक्रवात आया था। उस समय हमने सोचा था कि वहां जो लोग आपदाग्रस्त हुए हैं, बेघरबार और बेसहारा हुए हैं, उनके पुनर्वसन के लिए काम करेंगे। हमने उसके लिए डेढ़ वर्ष तक प्रयास किए, पर सफलता नहीं मिली। राज्य सरकार ने हमें भूमि उपलब्ध नहीं कराई।

अब जब 26 जनवरी,2001 को गुजरात में विनाशकारी भूकम्प आया तो हमने आरम्भ से ही ठोस योजना बनाकर काम करने का प्रण किया और पुनर्वसन के लिए उपयुक्त भूमि प्राप्त करने की कोशिश की।

मैंने 29 जनवरी को प्रधानमंत्री जी के साथ वहां का दौरा किया था। उसी दिन चिकित्सकों सहित हमारे कार्यकर्ताओं का एक 46 सदस्यीय दल भी राहत कार्य के लिए वहां पहुंचा। इस दल में गुजरात कैडर के ही भारतीय पुलिस सेवा के एक अधिकारी श्री शमशेर सिंह भी थे, जो इस समय राजस्व अन्वेषण निदेशालय में उपनिदेशक हैं। चूंकि वे उस भुज जिले में पहले रह चुके थे, अत: उन्हें भुज के तबाह होने की बहुत पीड़ा थी।

आप तो राहत कार्यों की देखरेख के लिए गए थे, फिर पुनर्वसन और गांव बसाने का विचार कैसे आया?

दृ वहां की स्थिति देखकर और विनाश को देखकर विचार आया कि अपनी सामथ्र्यानुसार किसी एक गांव को फिर से बसाएं। हमने शमशेर सिंह जी से ही कहा कि आप एक ऐसा गांव चुनिए जहां सबसे अधिक विनाश हुआ हो। उन्होंने भुज जिले के नवी दूधई गांव का चयन किया। यह आस-पास के 30 गांवों का केन्द्र बिन्दु है। हमने भी सोचा कि अगर इस गांव में काम करते हैं तो उसका लाभ उन 30 गांवों को भी मिलेगा।

हमने 5 फरवरी को तय किया कि हम नवी दूधई का पुनर्निर्माण करेंगे और उसका नाम रखेंगे इन्द्रप्रस्थ। 10 फरवरी तक हमने राज्य सरकार से भूमि ले ली। अंतत: 19 फरवरी को हमने वहां निर्माण कार्य शुरू कर दिया।

आपने कितने दिन में काम पूरा करने का लक्ष्य रखा था?

दृ हमने तय किया था कि 100 दिन में हम मकानों का निर्माण पूरा कर लेंगे। उस हिसाब से 30 मई को 100 दिन पूरे होंगे। हमने प्रधानमंत्री से प्रार्थना की थी 25 से 30 मई के बीच वहां मकानों का वितरण करने के लिए समय दे दें। उन्होंने 3 जून का समय दिया। अब कार्यक्रम के अनुसार 3 जून को स्वयं प्रधानमंत्री और गृहमंत्री वहां लोगों को नवनिर्मित मकान अर्पित करेंगे। हमने जो तय किया था, वह कर दिखाया है।

भूकम्प से पूर्व नवी दूधई की क्या स्थिति थी?

दृ वहां करीब 5000 लोग थे और 800 मकान थे। भूकम्प में सभी मकान ढह गए और 172 गांववासी मारे गए थे।

आपकी इस योजना पर कितना व्यय होगा?

दृ इस योजना पर 15 करोड़ रुपए खर्च होंगे। हम इस काम को दो चक्रों में बांटकर कर रहे हैं। पहले चक्र में हम मकान, बाजार और सामुदायिक भवन बना रहे हैं। दूसरे चक्र में हम अस्पताल, विद्यालय, महाविद्यालय आदि बनाएंगे। इस दूसरे चक्र का कुछ काम तो हो चुका है। हमने इस चक्र को पूरा करने के लिए तीन महीने की समय-सीमा तय की है।

इस क्षेत्र में कृषि फिर से पनपे और लोगों को खेतीबाड़ी में मदद मिले, इसकी क्या योजना है?

दृ हम वहां 40 एकड़ जमीन को तैयार करके कृषि विज्ञान केन्द्र बना रहे हैं। यह भूमि अब तक ऊबड़-खाबड़ और बंजर थी। यहां का पानी खारा है अत: ऐसे पानी में जो कुछ उपजाया जा सकता है उसकी जानकारी देंगे। कृषि विभाग की मदद से हम यह केन्द्र स्थापित करके खेती करने वालों की सहायता करेंगे। इस विभाग के उप-महानिदेशक श्री सामरा और डा. परोदा का सहयोग हमें मिल रहा है।

थ् इस वृहत् जनकल्याणकारी योजना में आपको सरकारी स्तर पर किस-किसका सहयोग मिला है?

दृ सरकारी सहयोग की बात करें तो मुख्यत: पांच विभागों/मंत्रालयों का सहयोग हमें मिला है। संस्कृति मंत्रालय वहां सांस्कृतिक केन्द्र की स्थापना में सहयोग देगा, शहरी विकास मंत्रालय एक केन्द्र के निर्माण में सहयोग कर रहा है, श्रम मंत्रालय व्यावसायिक प्रशिक्षण केन्द्र और ई.एस.आई. चिकित्सालय बनवाने में सहयोगी है, जल मंत्रालय ने वहां दो जलकूप बनाने में मदद की है और कृषि मंत्रालय के सहयोग से कृषि विज्ञान केन्द्र बन रहा है।

थ् वहां जो मकान आप बना रहे हैं उनका खाका और योजना किसकी सलाह से बनी है?

दृ हमने "हुडको' से पूरे गांव का खाका व योजना तैयार करवाई। उसने ही मकानों का डिजाइन बनाया है। वहां की जमीन की पूरी जांच करने के बाद भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुम्बई व दिल्ली ने ढांचागत खाका बनाया। हमने मकान इस हिसाब से बनाए हैं कि वे रिक्टर पैमाने पर 10 डिग्री तक के भूकम्प के झटके झेल सकते हैं। मकानों में सीमेंट व कंक्रीट के अंदर से खोखले वर्गाकार खण्ड हम अमदाबाद से मंगा रहे हैं और लोहा किर्बी से मंगा रहे हैं। लोहे का ढांचा, जिसमें सीमेंट व कंक्रीट भरा जाता है, वह हैदराबाद से प्राप्त कर रहे हैं।

थ् गांव का निर्माण कौन सी कम्पनी कर रही है?

दृ बी.एस.ई.एस. यानी "बाम्बे सबरबन इलैक्ट्रिक सप्लाई' कम्पनी गांव का निर्माण कर रही है।

थ् 15 करोड़ रुपए कोई छोटी राशि नहीं है। निश्चित ही आप इसे विभिन्न स्रोतों से इकट्ठा कर रहे होंगे। इसके बारे में कुछ बताएं।

दृ मुख्यत: हम दिल्लीवासियों से पैसा इकट्ठा कर रहे हैं। अब तक करीब 6 करोड़ रुपए इकट्ठे हुए हैं। हमारा अनुमान है कि पहले चक्र के निर्माण में 10 करोड़ रुपए खर्च होंगे। 3 जून से पहले शायद 4 करोड़ रुपए और प्राप्त हो जाएंगे। हम लोगों से चंदा इकट्ठा कर रहे हैं। सरकारी विभागों से प्रकल्प विशेष के लिए सहायता मिली है। लघु उद्योग मंत्रालय, जिसकी मंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे हैं, वह भी हमारी बहुत मदद कर रहा है। वह हस्तशिल्प केन्द्र बनावा रहा है। प्रदेश सरकार के लोकनिर्माण, विद्युत व जल विभागों ने हमारी सहायता की है।

थ् नवी दूधई के पास एक अन्य गांव भुजपुरा का भी आप पुनर्निर्माण कर रहे हैं। उसकी जानकारी दें।

दृ भुजपुरा नवी दूधई के पास ही छोटा सा गांव है। वहां के लोगों ने कहा कि "हमारे गांव का भी निर्माण करवाएं'। उन्हीं दिनों राजमाता विजयाराजे सिंधिया जी का स्वर्गवास हुआ था। तब हमने सोचा कि उन्हीं की स्मृति में इस गांव का पुनर्निर्माण विजयाराजे पुरम नाम से कर दें। वह 200 घरों का छोटा सा गांव था, उसे ही हम नए नाम से बना रहे हैं।

थ् नवनिर्मित इंद्रप्रस्थ का स्वरूप क्या है? सुना है आप वहां के उपनगरों के नाम दिल्ली के उपनगरों पर रख रहे हैं?

दृ चूंकि वह इंद्रप्रस्थ है यानी दिल्ली, तो वहां के नगरों के नाम भी दिल्ली जैसे ही रखने का विचार किया। वहां जो 12 उपनगर बनाए हैं, उनके नाम हैं-रामकृष्ण पुरम, केशवपुरम, अशोक विहार, दयानन्द विहार, महावीर एंक्लेव, निरंकारी कालोनी, पटेल नगर, गांधी नगर आदि। वहां के मुख्य बाजार को सदर बाजार कहा जाएगा। मुख्य चौराहे के आसपास 8 दुकानें बनाई हैं-जैसे घंटेवाला, हल्दीराम आदि तथा उसका नाम चांदनी चौक रखा है। इंद्रप्रस्थ के मुख्य मार्ग का नाम नेताजी सुभाष चन्द्र बोस है। अस्पताल का नाम हिन्दू राव अस्पताल है।

थ् क्या स्थानीय निवासियों ने भी निर्माण कार्य आदि में मदद दी?

दृ उनका पूरा सहयोग मिला है। वहां बसने वाले सभी परिवारों का एक-एक व्यक्ति हमारा हाथ बंटा रहा है। उन्होंने इस कारसेवा की इच्छा स्वयं जाहिर की थी। वहां करीब 132 मुस्लिम परिवार हैं जिनके लिए हमने मकान तो बनाए ही हैं, एक मस्जिद भी बना रहे हैं। नवी दूधई में पहले करीब 15 मन्दिर व एक मस्जिद थी। हमने हर धर्मस्थल-पंथस्थल से जुड़े लोगों को उन स्थलों के पुनर्निर्माण के लिए एक-एक लाख रुपया दिया है। हरिजन समुदाय के लिए भी हम नया मंदिर बना रहे हैं।

थ् इस योजना में सबसे ज्यादा सहयोग दिल्ली से ही मिलने के पीछे क्या कारण मानते हैं?

दृ दिल्ली की जनता दिल वाली है और उसने दिल से सहयोग दिया है। यह काम अभी अधूरा है, लेकिन निश्चित रूप से दिल्लीवासियों के सहयोग से यह पूरा होगा।

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